मरने के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ते ? || Garud Puran Ke Anusar Rahasya

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मरने के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ते ? || Garud Puran Ke Anusar Rahasya

मरने के बाद शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ते ? || Garud Puran Ke Anusar Rahasya

मरने के बाद शव को
मरने के बाद शव को

दोस्‍तों हर किसी की मृत्‍यु निश्चित होती है। यही इस संसार का नियम है। पर क्‍या कभी आपने यह सोचा कि किसी मरे हुए इंसान के शव को कभी भी अकेला नहीं छोड़ा जाता खासकर रात में।

तो डेड बॉडी को एक समय के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जाता इसके पीछे के कारण जानकर आप दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे। शव को अकेला ना छोड़ने का कारण जितना ज्यादा डरावना है उतना वैज्ञानिक भी।

दोस्तों जो इस दुनिया में जन्म लेता है उसकी उम्र पूरी हो जाने पर उसकी मृत्यु निश्चित है। जीवन में किए गए कर्मों के अनुसार मनुष्य की आत्मा को मृत्यु के बाद मोक्ष या किसी दूसरी योनि में जन्म नरक की यातनाएं या स्वर्ग का सुख मिलता है।

जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा शरीर में मौजूद 10 में से किसी एक छेद से बाहर निकल जाती है और मृत शरीर खाली हो जाता है।

उसकी पूरी ऊर्जा नष्ट हो जाती है। मनुष्य के मरते ही आत्मा शरीर से बाहर निकल जाती है और शरीर पूरी तरह से खाली हो जाता है और सड़ने लगता है। इसलिए मृत्यु के कुछ समय बाद ही अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कर दी जाती है।

लेकिन गरुड़ पुराण के अनुसार कभी-कभी अंतिम संस्कार कुछ समय के लिए टाल दिया जाता है। जिसमें सबसे पहला कारण है कि


अंतिम संस्‍कार टालने के कुछ कारण


सूर्यास्‍त के बाद मृत्‍यु

अगर सूर्यास्त के बाद हुई है तो सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार नहीं किया जाता। ऐसे में रात भर शव को रखा जाता है और उस शव के पास कोई ना कोई रात भर रहता है।

शव को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ते क्योंकि माना जाता है कि मनुष्य के खाली शरीर में कोई बुरी आत्मा प्रवेश कर सकती है और उस शरीर से कोई भी बुरा काम करवा सकती है।

ऐसी ही एक सत्य घटना हो चुकी है जहां एक मृत आदमी के शव को अकेला छोड़ दिया गया था तो दूसरे दिन गांव में हाहाकार मच गया था।

बहुत से लोगों के अनाज के भंडार जला दिए गए थे और लोगों ने मरे हुए आदमी के शव को आग लगाते देखा। असल में होता यह है कि कोई दुष्ट तांत्रिक, प्रेतात्मा घुसा कर अपने मनचाहे काम करवा लेता है।

यह नीच तंत्र है इसलिए इसमें प्रेत ज्यादा देर तक नहीं रह सकता फिर भी उतने समय में भी बहुत सी अनहोनी घटना को अंजाम दे सकता है। रात बीत जाने के बाद दूसरे दिन सूर्योदय होने के बाद शव का अंतिम संस्कार किया जाता है।

यदि रात में ही शव को जला दिया जाता है तो इससे व्यक्ति को अधोगति प्राप्त होती है और उसे मु‍क्ति नहीं मिलती है। ऐसी आत्मा असुर, दानव या पिशाच की योनि में जन्म लेती है।



पंचक काल में मृत्‍यु

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पंचक काल में हुई है तो तत्काल में शव को नहीं जलाया जाता है। जब तक काल समाप्त नहीं हो जाता तब तक शव को घर में ही रखा जाता है और किसी ना किसी को शव के पास रहना होता है।

गरुड़ पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि यदि पंचक काल में किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके साथ उसी के कुल खानदान में पांच अन्य लोगों की मौत भी हो जाती है। इसी डर के कारण पंचक काल के खत्म होने का इंतजार किया जाता है।

परंतु इसका समाधान है मृतक के साथ आटे बेसन या कुछ सूखी घास से बने पांच पुतले अर्थी पर रखकर इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया जाता है। ऐसा करने से पंचक दोष समाप्त हो जाता है।



किसी परिजन का साथ में ना होना

नंबर तीन यदि कोई मर गया है परंतु उसका दाह संस्कार करने के लिए उसका बेटा या उसकी बेटी पास नहीं होकर कहीं दूर है तो उनके आने का इंतजार किया जाता है।

तब तक शव को घर में ही रखा जाता है और किसी ना किसी को शव के पास रहना होता है। कहते हैं कि पुत्र या पुत्री के हाथों ही दाह संस्कार होने पर मृतक को शांति मिलती है वरना वह भटकता रहता है।

दोस्तों शव को अकेला ना छोड़ा जाने का सबसे डरावना कारण यही है कि उसके खाली शरीर में कोई भी बुरी आत्मा प्रवेश कर सकती है या कोई दुष्ट तांत्रिक मरे हुए खाली शरीर में किसी भी आत्मा को घुसा कर उस शरीर से कोई गलत काम करवा सकता है।

असल में तंत्र में ऐसी विद्या है जिससे तांत्रिक भी प्रेत आत्मा को किसी मृत शरीर में घुसा कर अपना मनचाहा काम करवा सकते हैं।

यदि शव को अकेला छोड़ दिया जाए तो उसके आसपास लाल चीटियां या अन्य कोई नरभक्षी रहने वाले प्राणी या पशु आ कर शव को खा सकता है इसीलिए वहां कोई ना कोई व्यक्ति बैठ कर शव की रखवाली करता है।


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जब स्‍वर्ग लोक में से आत्मा का पतन होता है तो वह वहां से पतन होने के बाद वह फिर से मनुष्य वर्ग में गिर जाता है। यदि आपने अपने कर्मों से मनुष्य की चेतना के स्तर से खुद को नीचे गिरा लिया है तो आप फिर से किसी पक्षी या पशु की योनि में चले जाएंगे।

यह क्रम चलता रहता है अर्थात व्यक्ति नीचे गिरता है या कर्मों से ऊपर उठता चला जाता है। शव के आसपास जगह को साफ सुथरा किया जाता है और धूप के साथ ही दीपक भी जलाया जाता है ताकि वहां दूर तक उजाला फैला रहे इसका भी यह कारण है कि मृतक कहीं अधोगति में नहीं चले जाए।

क्योंकि रात्रि के अंधकार में अधोगति वाले कीट पतंगे, रेंगने वाले जीव जंतु और निशाचर प्राणी ज्यादा सक्रिय रहते हैं। उस दौरान आत्मा की अधोगति में जाने की संभावना बढ़ जाती है।

भीष्म पितामह ने अधोगति से बचने के लिए ही सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था। उत्तरायण में प्रकृति और चेतना की गति ऊपर की ओर होने लगती है।

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