आखिर क्यों सुकरात ने मृत्यु को चुना?

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आखिर क्यों सुकरात ने मृत्यु को चुना इस बात का उत्तर आपको देने से पहले यह जान लेना भी अति  आवश्यक हो जाता है कि वह थे कौन और क्या था उनका अपराध?

दरअसल सुकरात, 469 ईसा पूर्व जन्में एक बेहद ही महान यूनानी दार्शनिक थे। उन्हें पाश्चात्य दर्शन का प्रणेता भी माना जाता है।

पश्चिमी दर्शन के विकास में उनकी विशेष और अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने पुरातन रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार किया। उनके अनुसार ‘यदि ईश्वर है तो वह एक ही हो सकता है।’

सूफ़ियों की भाँति वह केवल मौलिक शिक्षा देते थे। उन्होंने कोई ग्रंथ नहीं लिखे। वह सुबह सवेरे घर से निकल पड़ते और युवक युवतियों को इकट्ठा कर सुकरात उन्हें ईमानदार, सच्चे और दृढ़ संकल्प रहने का उपदेश देते थे।

उनकी बातें तर्कसम्मत होती थीं। और बातों में दम होता था।युवक युवतियाँ उनकी बातों के दीवाने थे और उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनते थे। इससे यूनानी समाज को इस बात का भय हुआ कि सुकरात सब पुरानी परम्पराओं को तोड़ देगा। 



इसमें राजतंत्र के चँद प्रभावशाली लोग भी शामिल थे। वह सब सुकरात के विरुद्ध एकजुट हो गये। उन सब ने मिलकर सुकरात पर तरुणों को बिगाड़ने, ईश्वर की निंदा करने, नास्तिक होने इत्यादि के झूठे आरोप लगा कर मुक़दमा चलाया और विष पीकर मरने की सजा सुनाकर उन्हें कोठरी में बंद कर दिया।

सुकरात के प्रिय शिष्य प्लैटो ने अपने अन्य साथियों से मिलकर सुकरात को जेल से भगाने की योजना बनाई। वह जज और जेलर को घूँस दे कर अंंदर सुकरात की कोठरी तक जा पहुँचे।

प्लैटो ने अपने गुरु से कहा- “युनानी समाज आपके उच्चकोटि के विचारों के लायक नहीं है अतः आप यहाँ से भाग निकलिए। हम आपको लेने आये हैं।” यदि सुकरात चाहते तो आसानी से भाग सकते थे परन्तु उनका उत्तर था कि

“यदि मैं भाग गया तो मेरा शरीर तो बच जायेगा परन्तु मेरे विचार मर जायेंगे। और यदि मैं मर गया तो मेरे विचार जीवित रहेंगे। और मैं अपने विचारों का जीवित रहना अधिक पसंद करूँगा। यह कह कर उन्होंने स्वयं ज़हर का प्याला उठाकर पी लिया।


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स्वयं को सभ्य मानने वाले उस समय के मनुष्यों का यह एक कटु सत्य है भी था कि पूर्णतः निर्दोष होने पर भी सुकरात जैसे महान दार्शनिक को विष का प्याला पीना पड़ा। उस समय वह 71 वर्ष के थे। 

परन्तु उनकी बात पूर्णतः सच साबित हुई। उनके विचार उनके शिष्य प्लैटो और फिर अरस्तू द्वारा आगे बढ़े। जिनका प्रभाव रोम और फिर पूरे पाश्चात्य जगत पर पड़ा।

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