Bhanumati Kaun Thi?

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Bhanumati Kaun Thi? भानुमति कौन थी?

Bhanumati Kaun Thi? भानुमति कौन थी?

Bhanumati Kaun Thi
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कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा। दोस्तों आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी। इस कहावत में जिस भानुमति का जिक्र किया गया है वह थी महाभारत के खलनायक दुर्योधन की पत्नि। इस कहावत का मतलब क्या होता है? और आखिर भानुमति ने किस तरह से कुनबे को जोड़ा था यह सब बातें आपको इस लेख के अंत पता चल जाएगी।

महाभारत के समय पर द्रोपदी के बाद धरती की सबसे सुंदर स्‍त्री थी भानुमति। ऐसा ही भानुमति का वर्णन किया जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि महाभारत के मूल ग्रंथ में केवल तीन बार ही दुर्योधन की पत्नी के बारे में उल्लेख किया गया है।

दुर्योधन की पत्नी का नाम क्या था? इसके बारे में भी मूल महाभारत ग्रंथ में कुछ नहीं बताया गया है लेकिन भानुमति के बारे में हमें जो कुछ भी पता चलता है उन सब का मुख्य स्रोत है दक्षिण भारत की प्रचलित लोक कथाएं।

महाभारत ग्रंथ में दुर्योधन की पत्नी का उल्लेख शांति पर्व शल्य पर्वत और श्री पर्व में आता है। शांति पर्व में खुद नारद मुनि जी ने और श्री पर्व में गांधारी ने दुर्योधन के पत्नी के स्वर्गीय सौंदर्य का खूब वर्णन खूब तारीफ की है।



दोस्तों भानुमति के बारे में जो प्रचलित लोक कथाएं हैं उन में कितनी सच्चाई है इस विवाद को अगर हम दूर रखें तो यह सारी जानकारी बड़ी ही रोचक और मनोरंजक आश्चर्य से भरपूर है।

कलिंग के राजा की पुत्री रही भानुमति को दुर्योधन ने कर्ण की सहायता से उसके स्वयंवर से ही अपहरण कर लिया था। वैसे तो भानुमति दुर्योधन को नकार कर वरमाला लेकर आगे जाने लगी थी और इस बात से इस अपमान से गुस्सा होकर दुर्योधन ने भानुमति का हाथ पकड़कर उसका अपहरण कर लिया था।

इस अपहरण में कर्ण ने उसकी भरपूर सहायता की थी भानुमति की एक सुप्रिया नाम की अति सुंदर सहेली भी थी जो भानुमति के साथ ही उस वक्त चली आई थी।

हस्तिनापुर में आने के बाद दुर्योधन ने भानुमति से और कर्ण, सुप्रिया के साथ एक ही विवाह मंडप में शादी कर ली थी।

कुछ लोक कथाओं के अनुसार भानुमति कि अपने मन ही मन में यह बड़ी तीव्र इच्छा थी कि उसकी शादी अर्जुन के साथ हो जाए लेकिन अर्जुन तो उसके स्वयंवर में आया ही नहीं था।



दुर्योधन ने भानुमति की मर्जी के खिलाफ उसके स्वयंवर से उसका अपहरण कर लिया था इस बात से और उसके पिता की जो बेज्जती हो गई थी इस बात से भानुमति दुर्योधन से बड़ी नाराज थी।

लेकिन बाद में उसने दुर्योधन को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था। दुर्योधन और भानुमति के दो जुड़वा बच्चे हुए थे उनमें से एक लड़का था और एक लड़की थी लड़की का नाम लक्ष्मणा रखा गया था तो लड़के का नाम लक्ष्मण कुमार ऐसा रखा गया था।

आगे चलकर उनका पुत्र लक्ष्मण कुमार अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के हाथों महाभारत के युद्ध में मारा गया था। दुर्योधन की लाडली बेटी लक्ष्मणा अति सुंदर, बुद्धिमान और दयालु स्वभाव की लड़की थी।

अपने स्वभाव के कारण लक्ष्मणा पांडव और कौरव दोनों की लाडली बेटी थी। लक्ष्मणा एक वीरांगना थी जिसे शस्त्र चलाना भी आता था। लक्ष्मणा कर्ण का पुत्र के साथ की पढ़ी हुई थी और दोनों के बीच में एक गहरी मित्रता और आकर्षण भी था।



इन दोनों की शादी करवाई जाए ऐसी कर्ण और दुर्योधन की भी इच्छा थी लेकिन फिर भी लक्ष्मणा के स्वयंवर का खेल रचा था। उस वक्त में किसी सम्राट ने अपनी लड़की को खुद का पति चुनने के लिए स्वतंत्रता और पर्याप्त पर्याय दिए थे इस बात की बड़ी प्रतिष्ठा हुआ करती थी।

लेकिन भाग्य का खेल निराला ही था लक्ष्मणा के स्वयंवर में निमंत्रित राजकुमार थे उनमें थे भगवान श्री कृष्ण और जामवंत जी के पुत्र सांब कृष्ण का पुत्र श्याम बड़ा ही नटखट पिताजी गया हुआ था।

जब सामने लक्ष्मण लक्ष्मण की सुंदरता देखकर मोहित हो गया और लक्ष्मण के पुत्र के गले में डालने जा रही है इस बात का शाम को भी पता था लेकिन लक्ष्मणा का अपहरण करने की कोशिश की तब शाम को रोकने के लिए आगे आया लेकिन सामने उसे बड़ी आसानी से हरा दिया।


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राजकुमारी लक्ष्मणा का अपहरण कर कृष्ण पुत्र वहां से स्वयं से भागने में कामयाब रहा। लेकिन उसकी पूरी दुनिया में बड़ी बेइज्जती हो रही थी।

लक्ष्मणा तो हस्तिनापुर वापस आ गई थी लेकिन उस वक्त पर कर्ण के पुत्र ने भी लक्ष्मणा से विवाह करने से इंकार कर दिया था क्योंकि साम्‍ब ने उसे लक्ष्मणा के सामने ही पराजित किया था जिसकी वजह से वह बड़ा ही लज्जित हो गया था।

इस पर भानुमति ने दुर्योधन को यह समझाने की कोशिश की थी इस समझदारी इसी बात में है कि तुम शाम को बड़े सम्मान पूर्वक कारागृह से मुक्त कर दो और बड़े ठाठ के साथ उसका लक्ष्मणा के साथ विवाह करवा दो।

उसकी हो रही बदनामी रुकने का अब यही एकमात्र उपाय है। वैसे दोस्तों कृष्ण का पुत्र शाम दिखने में और पराक्रम में भी कर्ण के पुत्र से कई गुना ज्यादा बेहतर था।



और शाम के प्रति लगाव होने का और एक कारण भानुमति के पास था खुद भानुमति को भगवान कृष्ण के प्रति अपने लगाव था वह कृष्ण की दीवानी थी।

दोस्तों एक बड़ी ही अजीब सी लोककथा भानुमति की कृष्ण के प्रति रही दीवानगी के बारे में बताई जाती है एक बार ऐसा हुआ था कि हस्तिनापुर के महल में एक निजी समारोह आयोजित किया गया था जिसमें कृष्ण भी निमंत्रित थे उस समय पर वहां पर उपस्थित सारे शाही परिवार के लोग मदिरा पी रहे थे।

उस लोक कथा के अनुसार उस समय पर श्री और पुरुष दोनों साथ बैठकर मदिरापान भी किया करते थे जब कृष्ण उस महफिल में थे तो मदिरापान थोड़ा ज्यादा ही हो गया था।

लगभग सभी लोग मदिरापान कर कर लुढ़क गए थे और इसी समय पर खूब मदिरापान कर कर भानुमति भी अपने आपे से बाहर हो गई थी। और नशे की हालत में कृष्ण के गले में पढ़ने का प्रयास भानुमति करने लगी तब कृष्ण ने उसे बड़े प्यार से समझाया था कि तुम हस्तिनापुर की महारानी हो।



ऐसा बर्ताव तुम्हें शोभा नहीं देता और खुद कृष्ण ने भानुमति को गांधारी के हाथों में सौंप दिया था। जब सुबह भानुमति को होश आया तो उसका कृष्ण के प्रति रहा आधार बहुत ही ज्यादा बढ़ गया था।

भानुमति कृष्ण की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करती थी तो फिर कृष्ण जैसा संबंधी उसे मिलेगा इस वजह से वह बड़ी ही खुश थी। उसका पति दुर्योधन तो कृष्ण को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता था।

वह अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। पांडवों का सबसे बड़ा सहारा रहे कृष्ण को अपना संबंध बनाने के ख्याल के भी वह खिलाफ था। अपनी जीत पर लक्ष्मणा का स्वयंवर रचा लेकिन अब तो यादों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था।

यादों की चारों तरफ दहशत से लक्ष्मणा के दूसरे सोमवार में कोई भी राजकुमार नहीं आया और इस वक्त कर्ण का पुत्र भी पीछे हट गया था और उसी वक्त इस बात से गुस्सा हुए बलराम अपनी गदा लेकर दुल्हन के महल में ही घुस गए थे।



जब शाम के चाचा बलराम महल में आने लगे तो उन्हें रोकने की किसी द्वारपाल की हिम्मत भी नहीं हुई थी। गदा से बलराम ने दुर्योधन की तोड़फोड़ शुरू की और उसकी अकल ठिकाने आ गई और अपनी पत्नी के कक्ष में गया।

तब बलराम अध्यक्षता में इस रिश्ते को अंजाम दे दिया गया और फिर भानुमति ने आगे बढ़कर बड़ी खुशी से मध्यस्थता की और शाम को बड़े सम्मान पूर्वक कारागार से रिहा कर दिया गया।

बड़े ही धूम धमाके के साथ उसकी शादी लक्ष्मणा के साथ अपने मर्जी के खिलाफ दुर्योधन को करवानी पड़ी थी। दोस्तों दुर्योधन की मृत्यु हुई थी तब विधवा हुई भानुमति ने दुर्योधन के चचेरे भाई अर्जुन के साथ पुनर्विवाह करने की इच्छा व्यक्त कर दी थी।

वैसे भी रावण की मृत्यु के बाद विभीषण के साथ मंदोदरी ने शादी कर ली थी। बाली के मृत्यु के बाद उसकी पत्नी तारा ने सुग्रीव से शादी की थी।



भाइयों में रहा आपसी बैर शादी के रिश्ते से खत्म हो जाए और उनकी अगली पीढ़ी में अगली संतानों में दुश्मनी कम हो इस पर अपना पूरा कुनबा इकट्ठा रहे और आपस के झगड़े कम हो इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य था।

तब अर्जुन ने भी भानुमति को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। दोस्तों दुर्योधन की पत्नी भानुमती का पुनर्विवाह अर्जुन के साथ हो गया था और भानुमति ने कुनबा जोड़ा यानी भानुमति ने ऐसे ही लोगों से रिश्ता जोड़ा था।

जिन लोगों से उसके पति दुर्योधन का बड़ा ही व्यर्थ की जानी दुश्मनी थी। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा यानी भानुमति ने यह अजीब से रिश्ते जोड़ते हुए अपने जीवन की पुरानी बातें पूर्ण कीं।

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