Gogaji Ka Vivah || गोगाजी का विवाह || Jaharveer ka vivah || जाहरवीर का विवाह

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गोगाजी का विवाह || gogaji ka vivah || jaharveer ka vivah || जाहरवीर का विवाह

गोगाजी का विवाह || gogaji ka vivah || jaharveer ka vivah || जाहरवीर का विवाह

gogaji ka vivah

गोगाजी का परिचय – Gogaji Ka Vivah

प्रथम कराऊँ परिचय तुमको श्री गोगाजी नाम बताय।

जा‍हरवीर भी कहते उसको फर्क कछु दोनों में नाय।।

जेवरसिंह है नाम पिता का बाछल मां का नाम बताय।

उम्‍मरसिंह हैं दादा उसके जिनको गया बुढ़ापा छाय।।

वीर भेष क्षत्रिय का बेटा गले में नाग लपेटा खाय।

संग में रहते नरसिंह भज्‍जू जो मरने से डरते नाय।।

हाथ में भाला कमर कटारी नीले घोड़े पे है सवार।

अरजन सरजन हैं दो भाई हरदम करें खेत तलवार।।

कथा सुनाऊँ गोगा ब्‍याह की भक्‍तों सुनना ध्‍यान लगाय।

एक रात की बात बताऊँ अब आगे की कथा बढ़ाय।।


श्री जाहर वीर को सपना आना – Gogaji Ka Vivah


एक रात सोये थे गोगाए महलों पर वो पलंग लगाय।

गहरी निंद्रा आयी उनको, तन का होश रहा कुछ नाय।।

रात बीत गई सारी पलसम, ब्रह्म समय पहुँचा है आय।

देखा सपना गोगा जी ने जिसका हाल कहूँ समझाय।।

 

सपने में देखा गोगा जी ने, पहुँचा एक बाग के मांय,

ऐसा सुंदर उपवन था जो, देखा कभी अभी तक नाय।

तरह तरह के फूल खिले थे, जिनकी खुशबू मन को भाय,

बड़े बड़े थे पेड़ वहां पर, जिनपे रही लता बल खाय।

 

देख रहे शोभा उपवन की, घोड़ा आगे दिया बढाय,

चला अश्‍व फिर पल में पहुँचा, उस सुंदर उपवन के मांय।

एन बीच में बना सरोवर, जिसकी शोभा बतायी न जाय,

जा बैठे एक पेड़ के नीचे, ठंडी हवा वहां पर आय।

 

उतने में वहां आयी सुंदरी, ज्‍यों बसंत गया हो आय,

ऐसा सुंदर रूप था उसका, जिसका हाल कहा न जाय।

नैन नक्‍श उसके सुंदर थे, रंग गुलाबी रहा समाय,

इतना सुंदर रूप था उसका, चंद्र देव भी जा शरमाय।

 

सैर बाग की करने आयी, सब सखियों को संग लिबाय,

रूप देखकर दंग रह गये, गोगा मन ही मन के मांय।

मोहित हो गये गोगा जी, फिर एक सखी से पता लगाय,

धूपागढ की राजकुमारी, सिरियल देवी नाम बताय।

 

स्‍वप्‍न टूटा आंखें खुल गयीं, बाछल माता रही जगाय,

यों सोये बेफिकर हो कर, राज काज की चिंता नाय।

कितना सूरज चढ़ गया ऊपर, फिर भी आंख ही खुली नाय,

जल्‍दी उठ कर कुल्‍ला कर लो, नरसिंह, भज्‍जू रहे बुलाय।

 

झटपट उठ गोगा ने अपनी माता के चरणों में शीश नवाय,

आशीर्वाद दिया माता ने, दिन-दिन उम्र बढ़ती जाय।

गोगा अपनी माता से यूं बोला, सुनियो माता ध्‍यान लगाय,

आज रात को हे माता मोहे, सपना पड़ा एक दिखलाय।

 

जो भी सपना देखा मैंने, जिसका हाल कहूँ समझाय,

सपने में हे मैय्या मेरी, पहुंचा धूपा नगरी जाय।

देखा सुंदर बाग अनोखा, ज्‍यों स्वर्ग उतरा है आय,

पहुंचा एक पेड़ के नीचे, लीलै को मैं संग लिवाय।

 

इतने में वहां आयी सुंदरी, सब सखियों को संग लिवाय,

उसका ऐसा रूप अनोखा, जिसका हाल कहा ना जाय।

रूप  देखकर दंग रह गया, मन में गया सनाका खाय,

देखी नहीं रूपसी ऐसी, इंद्र परी भी जा शरमाय।

 

सिरियल मेरे मन में बस गयी, माता तुमको दूँ बतलाय,

जब तक उससे मिलूँ न मैय्या, मन में चैन पड़ेगी नाय।

धूपागढ़ को मां मैं जाऊँ, लीलै पर होके असवार,

आज्ञा दे दो माता मुझको, आज्ञा का हूँ पालनहार।

 

माता मुझसे कुछ नहीं बोलें, सुन रहीं बातें ध्‍यान लगाय,

सुन-सुन बातें गोगा की वो, मन में गईं अचम्‍भा खाय।

रे जाहर तू रह गया भोला, सच्‍ची बात स्‍वप्‍न की नाय,

छोड़ स्‍वप्‍न की बातों को तू, रहा है इसमें क्‍यों भरियाय।

 

स्‍वप्‍न में सब कुछ हो सकता है, मरकर भी जीवित हो जाय,

राजा रंक बने है पल में, पल में घटा घोंप हो जाय।

झूठी माया है स्‍वप्‍न की, मैं तुझको देऊँ समझाय,

जाहर बोला सुन लो माता, मेरी बातें ध्‍यान लगाय।

 

सपना झूठा न तुम जानो, इसमें बात खास हो जाय,

कई कई सपने होवें सच्‍चे, इसमें झूठ जरा भी नाय।

सपने सच्‍चे हुए बहुत से, तुमको मैं देऊँ बतलाय,

त्रिजटा को जो आया सपना, जो सीता से कहा सुनाय।

 

घुस गये बंदर लंका मांही, सुन लो सीता कान लगाय,

हुई जीत फिर रामचंद्र की, सीता को छुड़वाया जाय।

आज्ञा दे दो माता मुझको, क्‍यों घबराय मन के मांय,

जल्‍दी लौट के आऊँ वापिस, इसके फिकर करो कछु नाय।

 

इतनी सुनकर बाछल बोली, तुमको मैं जाने दूँ नाय,

बहुत दूर है धूपानगरी, तू वहां पर पहुँचेगा नाय।

क्‍यों नहीं जाने देगी मैय्या, मुझको तू सारी समझाय,

मोहे भरोसा खुद में भारी, तुमको क्‍या इतना भी ना भाय।

 

बाछल बोली सुनले जाहर, तुमको मैं देऊँ समझाय,

सिंझासिंह है शत्रु अपना, डोला तुमको मिलेगा नाय।

तंवर और चौहान वंशीय, दोनों में पटती है नाय,

हुआ युद्ध दोनों में भारी, जिसका हाल कहा ना जाय।

 

हुआ बैर दोनों वंशों में, तू क्‍यूँ जाहर रहा बढ़ाय,

अगर पता सिंझा को लग गया, वापिस तू आवेगा नाय।

इतना सुनकर बोला जाहर, गुस्‍सा गया बदन में छाय,

मैं बेटा चौहान वंश का, झूठे मुझें डरावें नाय।

 

सिंझासिंह की हस्‍ती क्‍या है, आये ब्रह्मा ले तलवार,

लड़ता लड़ता पर जाऊँगा, हटे ना पीछे राजकुमार।

चाहे गंगा लौटे वापिस, चाहे घटा घोप हो जाय,

पश्चिम में सूर्य उग सकता, पर यह क्षत्रिय लौटे नाय।

 

देख जोश अपने जाहर का, मां बाछल गईं मन हरसाय,

जाहर जाहर प्रेम से कह कर, निज ह्रदय से लिया चिपाय।

अवश्‍य ब्‍याहेगा तू सिरियल को, ये मेरे मन गयी समाय,

आज्ञा देती हूँ मैं तेरे को, धूपानगरी पहुँचो जाय।

 

आज्ञा पाकर मां बांछल की, नीला अश्‍व किया तैयार,

अस्‍त्र शस्त्र सारे बांधे, धरती मैया ली चुचकार।

कुमकुम तिलक किया बांछल ने, चंदन चौक दी बिछवाय,

किया आरती बाछल मां ने, मन में खुशी समावे नाय।

 

करी तैयारी चलने की, माता के चरणों में शीश नवाय,

जा बैठे लीलै के ऊपर, गुरू गोरख को लिया मनाय।

औघड़नाथ का ध्‍यान किया है, दुर्गे मैय्या करो सहाय,

प्रणाम किया मैय्या को आखिर, दी घोड़े को ऐड़ लगाय।

 

सर सर करके उठा बछेरा, पवन वेग से उड़ता जाय,

ऐसे लगता उड़न खटोला, स्‍वर्ग लोक से उतरा आय।

पल में पहुँचे सागर के तट, उतरा लीला पंख पसार,

जाहर बोले लीलै भैय्या, अब सागर पर भरो उड़ान।

 

बहुत दूर है धूपानगरी, करना है यह सागर पार,

कैसे पार करोगे लीले,हमको भी बतलाओ यार।

क्‍यों तू फिकर करे है गोगा,तुमको कौन पड़ी परवाय,

गुरू गोरख का ध्‍यान लगाओ, वो ही हमको पार लगाय।

 

जिसका रक्षक हो गुरू गोरख, उसका क्‍या कोई करे बिगार,

करो तैयारी अब चलने की, छोड़ो अपनी ये तकरार।


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जाहरवीर का धूपानगरी पहुँचना – Gogaji Ka Vivah


जाहर लीलै ऊपर बैठा, दी घोड़े को ऐड़ लगाय,

पवन वेग से उड़े है लीलै, अम्‍बर में वह पहुँचा जाय।

 सिंघल द्वीप पहुँचना हमको, जो है इस सागर के पार,

छोटा ना समझो यह सागर, इसका बहुत बड़ा विस्‍तार।

 

इतनी सुनकर बोला लीलै, तुम क्‍यों फिकर करे हो वीर,

पल में पहुँचेंगे धूपानगरी, उड़ता ऐसे जैसे  तीर।

इस सागर की बात ही क्‍या है, सौ सागर कुछ समझूं नाय,

नाहक घबरावै क्‍यों भैय्या, मन में फिकर करो कछु नाय।

 

इतनी बात सुनी लीलै की, जाहर अति मगन हो जाय,

भैया भैया कह लीलै को, गले से गया लपेटा खाय।

जाहर मन में सोच रहे हैं, आगे अब क्‍या होगा जाय,

कैसी होगी सिरियल रानी, या फिर बात झूठ हो जाय।

 

जाहर यूं ही सोच रहे थे, धूपानगरी पड़ी दिखाय,

ऊँचे ऊँचे भवन वहां पर, देख देख कर मन हरषाय।

लीले से यूं बोले जाहर, सुुन ले भैया ध्‍यान लगाय,

पहले देखें धूपानगरी, चक्‍कर देवो एक लगाय।

 

लीला उड़ा गगन के अंदर, नीचेे नगरी परे दिखाय,

ऐसा गढ़ देखा नहीं पहले, ददरेवा को मात कराय।

घूम रहे थे धूपानगरी, देख उपवन एक विशाल,

हरियाली थी उसमें भारी, एन बीच में सुंदर ताल।

 

चहक रहे थे पंक्षी उसमें, कूूक रही कोयलिया गाय,

ऊँचे ऊँचे पेड़ वहां पर, जिनपे रही लता बल खाय।

जाहर लीले से यूं बोला, तुुमको मैं देऊँ बतलाय,

यही बाग देखा है मैंने, स्‍वप्‍न अंदर ध्‍यान लगाय।

 

यही मिली थी सिरियल रानी, जो मेरे मन गयी समाय,

देखा उसका रूप निराला, कामदेव भी जा शरमाय।

यहीं ठहरजा लीलै भैया, उतरो इस सरवर के तीर,

हरियाली यहां बहुत घनेरी सरवर का है ठण्‍डा नीर।

 

जब यह बात सुनी लीलै ने, जाहर से यह कहा सुनाय,

उतरूँगा इस बाग से बाहर, भीतर मैं उतरूँगा नाय।

यह तो बाग जनाना लगता, पुरूष नहीं जा सकता मांय,

हम दोनो परदेशी भैया, कोई बात का पता है नाय।

 

लग रहा यहां पहरा भारी, पहरेदार खड़े तैयार,

अगर पकड़ ले जावेंगे तो, मारेंगे कोड़े की मार।

कान खींच कर बोला जाहर, ज्‍यादा बात बनावे नाय,

घुसो बाग के अंदर जल्‍दी, नहीं तो दूँगा मार लगाय।

 

चला वहां से लीला घोड़ा, गुरू गोरख को लिया मनाय,

जा पहुँचा वह बाग के अंदर, पल की देर लगाई नाय।

पुरूष देख कर बाग के अंदर, आया वहां पहरेदार,

कौन है क्‍यों घुसा है बाग में, बुलावो कोड़ा फटकार।

 

रे लड़के तू निकल यहां से, तेरी मौत क्‍यों गयी है आय,

ऐसी मार लगाउँ तेरी, जाे जीवन भर भूले नाय।

पहरेदार होकर गुस्‍से में, बोला आकर के कुछ पास,

पुरूष नहीं आ सकता इसमें, यह तो बाग जनाना खास।

 

इतनी बात सुनी जाहर ने, हाथ हवा में दिया उठाय,

पहरेदार गिरा धरती पर, तन का होश रहा कुछ नाय।

पहरेदार को छोड़ वहीं पर, सैर बाग की कीन्‍हींं जाय,

ऐसा सुंदर बाग था सज्‍जनों, जिसका हाल कहा ना जाय।

 

ठंडा पानी पी कर उसका, जा बैठे अंबुवा की छांय,

जाहर लीले से यह बोला, मुझको निंद्रा रही सताय,

थक कर चूर हुआ मैं भैया, निंद्रा अब रुकती है नाय।

सैर करो तुम अब खूब बाग की, और क्षुुधा को लेओ मिटाय,

गर इच्‍छा हो स्‍नान करो तुम, मन मे भय कुछ मानो नाय।

 

बन्‍धन खोल दिये लीले के, बोला जाहर बात बनाय,

कहीं दूर जाना मत भैया, रहना सिर्फ बाग के मांय।

इतनी बात सुनी जाहर की, लीला अति मगन हो जाय,

लगा कूदने क्‍यारी क्‍यारी, सारी भूख फिर लयी मिटाय।

 

रौंद दयी टापों से क्‍यारी, सारी बगिया देई उजार,

केशर क्‍यारी मिली धूल में, हालत बिल्‍कुल देई बिगार।

उतना खाया जितना भाया, पहुँचा फिर सरवर के तीर,

किया स्‍नान वहां बड़े प्रेम से, अति सुहाया ठण्‍डा नीर।

 

कूद कूद कर लगा नहाने, कीचड़ वहां पर दिया फैलाय,

ऐसी हालत कर डारी है, जिसका हाल कहा ना जाय।

लीलै ने है एक दौड़ लगायी, फिर पहुँचा बगिया के दरम्‍यान,

लता पेड़ सब तोड़ दिये हैं, काफी पहुँचाया है नुकसान।

 

छोड़ों बातें यहां की यहां पर, आगे का हाल कहूँ समझाय,

मन में धीरज धर कर सुनना, एक एक बातें देऊँ बताय।


सिरियल रानी का जन्‍म – Gogaji Ka Vivah

राजा सिंझासिंह द्वारा गुरू गोरख व जालंधर की तपस्‍या करना


वहां की बातें वहां पर छोड़ो, पहुँचो धूपानगरी आय,

तुन्‍दल नगरी, बूँदागढ़ भी सज्‍जनों, उसका नाम बताय।

वहां के राजा सिंझासिंह थे, न्‍याय धर्म के वो अवतार,

जो भी आते द्वारे उनके, सेवा में रहते तैयार।

 

गौ, ब्राह्मण का करते आदर, अतिथि का करते सत्‍कार,

प्रजा सारी रहती सुख से, कभी ना होती थी तकरार।

नाम सिरौंजा पत्‍नी का था, वो भी थी पतिव्रता नारि,

पति सेवा में रहती हाजिर, प्रजा से करती थी प्‍यार।

 

दया भाव की मूर्ति थी वो, करूणा का थी वो भण्‍डार,

दीन जनों की करती सेवा, कभी ना सहती अत्‍याचार।

खुशहाली थी चौतरफा वहां, सुन लो भक्‍तों ध्‍यान लगाय,

एक कमी थी राजमहल में, जिसका हाल कहूँ समझाय।

 

राजा रानी रहैं फिकर में, हुई न थी अब तक सन्‍तान,

चिन्‍ता रहती उनको भारी, इसका ही बस रहता ध्‍यान।

राजा रानी दोनों मिलकर, करते हरदम प्रभु का ध्‍यान,

सेवा करते साधु सन्त की, बस मिल जावे एक सन्‍तान।

 

कुदरत की है माया रानी, इसके आगे कौन बिसाय,

कर्म लेख मिटे ना रानी, होनी टाले टलती नाय।

राजा रानी बातें कर रहै, दासी ने बतलाया आय,

टोली आई सन्‍तों की एक, खुद योगी रहै बताय।

 

राजा छोड़ महल को आया, पहुँचा सन्‍तों के दरमयान,

हाथ जोड़कर दंडवत कीन्‍हीं, और किया उनको प्रणाम।

धन्‍य भाग हो आप पधारे, दर्शन दीन्‍हां हमको आय,

रहो यहां तुम मौज खुशी से, धूनी यहां पर लेओ रमाय।

 

प्रसन्‍न होकर बोले जोगी, तुमको राजन दूँ बतलाय,

खुश होकर तेरी सेवा से, मन का हाल कहें समझाय।

पावोगे संतान अवश्‍य तुम, सुन लो राजा ध्‍यान लगाय,

करो तपस्‍या गुरू गोरख की, भक्‍तों की वो करे सहाय।

 

परम प्रिय वो भक्‍त स्‍नेही, समझों उनको शिव अवतार,

विनती सुनकर अवश्‍य पधारें, यह तुम पक्की लेवों धार।

खिल गया चेहरा सिंझासिंह का, हाथ जोड़कर बोला राय,

धन्‍यभाग तुम दर्शन दीन्‍हा, इतना यतन दिया बतलाय।

 

करूँ मैं इतनी कठिन तपस्‍या, गुुरू गोरख को लेऊँ बुलाय,

आना होगा इस धरती पर, इसमें फर्क रहे कछु नाय।

योगी बोले हे राजन अब, हम तो डेरा रहे उठाय,

मिले सफलता राजन तुमको, इसमें फिकर करो तुम नाय।

 

राजा तब महलों को आया, और रानी से कहा सुनाय,

करो तपस्‍या गुरू गोरख की, उनसे ही अब ध्‍यान लगाय।

पूरी करें अभिलाषा मन की, वो हैं भक्‍तों के आधार,

जो कोई जाता गुुरू शरण में, सबका बेड़ा करते पार।

 

राजा रानी करें तपस्‍या, गुरू गोरख को लिया मनाय,

तन मन धन कर गुरू को अर्पण, दोनों ने लिया ध्‍यान लगाय।

आस लगाये बैठे थे दोनों, आवेंगे गुरू गोरख राय,

मन की इच्‍छा करेंगे वो पूूर्ण, इसमें फर्क कछु नाय।

 

पूरी हुई कामना मन की, एक दिन गौरख पहुँचे आय,

सीधे आय राजमहल में, राजन से यूँ कहा सुनाय।

प्रसन्‍न हो तेरी सेवा से, धूपानगरी पहुँचा आय,

समय नहीं है मेरे पास में, ज्‍यादा यहां ठहरूँगा नाय।

 

खोज रहा मैं गुरू मछंदर, उनको मैं लाऊँ छुड़वाय।

जय जयकार करी राजा ने, चरणों में जाऊँ बलिहार,

धन्‍य भाग तुम दर्शन दीन्‍हां, धन्‍य धन्‍य शिव के अवतार।

इतना कह कर राजा रानी, चरणों में हो गये लिपटाय,

प्रसन्‍न होकर गुरू गोरख ने, निज हाथों से लिया उठाय।

 

जुग जुग जियो हे राजा तुम, अमर रहेगी तेरी शान,

सिंझा राज करो वर्षों तक, दुनिया माने तुम्‍हें महान।

हाथ जोड़कर दोनों बोले, दया करो हे क्रपानिधान,

ना चाहिये हमें सोना चांदी, ना मांगे हम धन और धान।

 

एक फिकर है हमको भारी, हुई न अब तक भी संतान,

चिन्‍ता रहती दिन और रैना, सूखे जाते हमारे प्राण।

ध्‍यान लगाके बोले गोरख, सुन लो सिंझा ध्‍यान लगाय,

कान खोलकर सुन लो दोनों, इसका यतन देऊँ बतलाय।

 

मैं तो जाऊँ त्रिया नगरी, मेरे पास समय है नाय,

जालन्‍धर की करो तपस्‍या, उनको राजा लेवो मनाय।

प्रसन्‍न करके गुरू भाई को धूपानगरी लवो बुलाय,

पल में  संकट दूर करेंगे, भक्‍तों की वो करे सहाय।

 

इतनी कह कर गुरू गोरख ने, हाथ कमण्‍डल लिया उठाय,

चले वहां से गोरखनाथ जो, त्रिया नगरी पहुँचे जाय।

राजा रानी करे तपस्‍या, जालन्‍धर का ध्‍यान लगाय,

हाथ जोड़कर बैठे दोनों, गुरू गोरख को लिया मनाय।

 

एक पैर से करी तपस्‍या, सुन लो भक्‍तों ध्‍यान लगाय,

वर्षों तक वो करी तपस्‍या, तब गुरू आसन डोला जाय।


गुरू जालंधर का धूपानगरी पहुँचना – Gogaji Ka Vivah


जालन्‍धर का ध्‍यान डिगा तो, कनिफा से कहा सुनाय,

चलना होगा धूपा नगरी, सिंझा सिंह हैं रहे बुलाय।

राजा रानी करैं तपस्‍या, मेरा आसन डोला जाय,

निश्‍चय करके बैठे दोनों, मेरे बिन वो उठे हैं नाय।

 

चलना होगा चेलो हमको, यहां पर देर लगावो नाय,

शीघ्र करो तैयारी चेले, दंड कमण्‍डल लेवो उठाय।

चले वहां से गुरू जालन्‍धर, कानीफा को संग लिवाय,

धूपागढ़ को पहुँचे दोनों, अपना आसन लिया जमाय।

 

पता लगा जब सिंझासिंह को, रानी से बतलाया जाय,

मिली सफलता रानी हमको, गुरू जालन्‍धर पहुँचा आय।

क्‍या तुम सोच रही हो रानी, चलने को हो लो तैयार,

मन इच्‍छा सब करेंगे पूर्ण, सबके हैं वो पालन हार।

 

भोजन थाल सजा रानी ने, किया वहीं से गुरू का ध्‍यान,

चले वहां से राजा रानी, जाय गुरू को किया प्रणाम।

लेट गये चरणों में दोनों, शीष प्रेम से दिया झुकाय,

हाथ जोड़ कर करी वन्‍दना, जय जय जय जालन्‍धर राय।

 

भुजा पकड़ कर सिंझासिंह की, जालन्‍धर ने लिया उठाय,

सिर पर हाथ रखा राजा के, और ह्रदय से लिया लगाय।

धन्‍य धन्‍य है भाग्य हमारे, गुरू ने दर्शन दिया दिखाय,

धन्‍य धन्‍य है धूपानगरी, जालन्‍धर वहां पहुँचा जाय।

 

दर्शन करके जालन्‍धर के, राजा प्रेम विह्वल हो जाय,

भक्ति भाव से निकले आंसू, जो रोके से रूकते नाय।

भक्ति देखकर सिंझासिंह की, गुरू ने गले से लिया लगाय,

खुश हूँ मैं तेरी भक्ति से, धन्य धन्‍य हैं सिंझाराम।

 

आशीर्वाद दिया दोनों को, जुग जुग जियो सिंझा राय,

राज करोगे वर्षों तक तुम, इसमें फर्क पड़े कछु नाय।

याद किया क्यों तूने राजा, इतना मुझको देओ बताय,

क्‍या विपदा सिर आन पड़ी है, उसका हाल कहो समझाय।

 

जल्‍द बताओ हे राजन तुम, किस कारण है लिया बुलाय,

सच्‍ची बात बतावो हमको, क्या दुख तो पर पड़ा है आय।

खाली हुआ खजाना तेरा, या दुश्‍मन चढ़ आया है आय,

क्‍या क्‍या तुझ पर पड़ी मुसीबत, एक एक करके देओ गिनाय।

 

हाथ जोड़कर बोले राजा, ना कोई पड़ी मुसीबत आय,

ना दुश्‍मन कोई चढ़कर आया, और खजाना खाली नाय।

एक कमी है राजमहल में, उसका देता हाल बताय,

हुई नहीं संतान अभी तक, उसका यतन देवो समझाय।

 

राजमहल लगता सब सूना, मन में चैन पड़े है नाय,

चिंता रहती दिन और रैना, बदन सूखता मेरा जाय।

इसकी फिकर करो क्‍यों राजा, ये तो बांये हाथ का काम,

इतनी कहकर ध्‍यान लगाया, ओंकार का रटते नाम।

 

राजा रानी बैठे दोनों, गुरू चरणों में ध्‍यान लगाय,

देख रहे गुरूवर मुखमण्‍डल, जामे तेज अति रहा समाय।

कानीफा राजा से बोला, प्रभु से गुरू ने लाया ध्‍यान,

कृपा दृष्टि है तुम पर राजा, निश्‍चय मिल जाय संतान।

 

इतनी बात सुनी राजा ने, मन में अति मगन हो गया,

धन्‍य धन्‍य हे भक्‍त स्‍नेही, धन्‍य धन्‍य हे जालन्‍धर राय।

जालन्‍धर ने पलके खोलीं, भस्‍मी लीन्‍ही हाथ उठाय,

राजा से यूँ बोले गुरूवर, सुन लो दोनों ध्‍यान लगाय।

 

अभिमन्त्रित कर भस्‍मी को, राजा के हाथों देई बढ़ाय,

ईश्‍वर कृपा करेंगे राजन, पुत्री तुझे एक मिल जाय।

ब्रह्म मुहूर्त में हे राजन, रानी को भस्‍मी देओ खिलाय,

कन्‍या उत्‍पन्‍न होगी उससे, फर्क पड़े उसमें कछु नाय।

 

इतनी बातें सुनकर संतों की, राजा अति मगन हो जाय,

ले भस्‍मी दोनों हाथों से, बोला उनसे शीष नवाय।

दर्शन देते रहना हरदम, गलती सारी देओ भुलाय,

मैं तो सेवक हूँ चरणों का, चरणों में लेना अपनाय।

 

देकर आशीर्वाद राय को, बोले फिर जालन्‍धर राय,

प्रस्‍थान करेंगे धूपागढ़ से, यहां पर बात बने कछु नाय।

चले वहां से गुरू जालन्‍धर, कानीफा को संग लिवाय,

नगरी नगरी द्वारे द्वारे, अलख निरंजन नाम लिवाय।

 

राजा रानी गये महल में, खुशियां मन में नहीं समाय,

मन इच्‍छा होगी अब पूर्ण, कृपा करी जालन्‍धर आय।

ध्‍यान लगाया गुरू जालन्‍धर का, भस्‍मी रानी लीन्हीं खाय,

अभिमंत्रित थी भस्‍मी सज्‍जनों, वचन कभी खाली ना जाय।

 

समय बीत गया धीरे धीरे, कुछ भी पता लगे है नाय,

गर्भ ठहर गया रानी के, रंग भस्‍म ने दिया दिखाय।

शुभ वार शुभ घड़ी में सज्‍जनों, जन्‍म लिया कन्‍या ने आय,

सिंझासिंह को मपता लगा तो, पहुँचा वो महलों मे जाय।

 

राजकोष खोला सिंझा ने, धन प्रजा में दिया बंटाय,

मुंह मांगे धन मिलता सबको, खाली लौटने ना कोई पाय।

इतनी खुशी हुई राजा के, पांव जमीं पर टिकते नाय,

महिमा अपरंपार नाथ की, बंजर भूमि देई उपजाय।

 

घर घर खुशियां हो रहीं भारी, सखियां गा रहीं मंगलाचार,

तभी पधारे गुरू जालन्‍धर, महलों में कीन्‍हीं ओंकार।

सिंझासिंह ने सुनी ये वाणी, पहुँचा गुरू चरणों में जाय,

हाथ जोड़कर करी बन्‍दगी, खुशियां मन में नहीं समाय।

 

आशीर्वाद दिया राजा को, जुग जुग जियो सिंझा राय,

करो राज वर्षों तक राजा, धन दौलत की कमी हो नाय।

दर्शन देकर धन्‍य किया है, पहुँचे जो महलों में आय,

पावन हो गया कण कण सारा, चरण स्‍पर्श लिया है पाय।

 

हाथ जोड़कर बोले सिंझा, सुन लो गुरूवर ध्‍यान लगाय,

जन्‍म लिया सुंदर कन्‍या ने, नामकरण तुझको देवी कराय।

आशीर्वाद दिया कन्‍या को, सिरियल देवी नाम रखाय,

राजा से बोले जालन्‍धर, सुन लो राजा ध्‍यान लगाय।

 

पाणिग्रहण सिरियल देवी का, करना बागड़ भूमि जाय,

जेवरसिंह चौहान का बेटा, जिसका जाहर नाम बताय।

करी प्रेरणा गोरख ने यह, तुमको राजन दी बतलाय,

गुरू गोरख का है वो चेला, ददरेवा नगरी का राय।

 

गोरखनाथ का नाम सुना तो, कानीफा का मन जलता जाय,

बाकी रहा कछु ना उसमें, मन मे उथल पुथल हो जाय।

कानीफा गुरूवर से बोला, ऐसा नहीं होने को पाय,

पाणिग्रहण ना हो जाहर से, ये तुमको देता बतलाय।

 

गोरख शिष्‍य सिरियल को ब्याहे, ये मेरे मन नहीं समाय,

और बहुत से राजकुँवर हैं, जिनको सिरियल दे परिणाय।

हाथ जोड़कर बोला सिंझा, गुरूवर चरणो में शीष नवाय,

ब्‍याहूँ ना चौहान वंश में, उससे बात बनेगी नाय।

 

सात पुश्‍तों का बैर हमारा, जो मेटे से मिटे नाय,

हरगिज ना ब्‍याहूँ सिरियल को, चाहे जान बदन से जाय।

नयन बन्‍द कर जालन्‍धर, बोले मुख से वचन उचार,

वाणी झूठी हो सकती ना, चाहे ब्रह्मा लें अवतार।


रानी सिरियल देवी का सपना Gogaji Ka Vivah


धीरे धीरे दिन बीते हैं, तरूण अवस्‍था पहुँची आय,

सखियों के संग खेलें कूदें, मौज खुशी मन रही समाय।

मात पिता अति लाड लडाते, देख देख कर मन हरषाय,

रूप सलोना इतना सुंदर, इन्‍द्र परी भी जा शरमाय।

 

चढ़ी जवानी आया यौवन, वर्ष सोलवां गया है आय,

रूप देखकर सिरियल का, सब सखियां बातें रहीं बनाय।

एक रात की बात बताऊँ, सुनियो सज्‍जनों ध्‍यान लगाय,

सोय रही थी सिरियल रानी, महलों ऊपर पलंग बिछाय।

 

रात बीत गयी धीरे धीरे, ब्रह्म समय है पहुँचा आय,

सपना आया एक अनोखा, जिसका हाल कहूँ समझाय।

उड़न खटोले पर बैठी थी, सिरियल रानी पांव पसार,

देखा सुन्‍दर नीला घोड़ा, अम्‍बर में वो भरे उड़ान।

 

घोड़ा उड़ता उड़ता सज्‍जनों, पहुँचा है सिरियल के तीर,

राज कुँवर बैठा था उस पर, नाम बताया जाहरवीर।

रूप देखकर दंग रह गयी, सिरियल मन ही के मांय,

ऐसा सुन्‍दर रूप निराला, जिसका हाल कहा ना जाय।

 

मुड़ मुड़ देख रही सिरियल को, राज कुँवर का ध्‍यान लगाय,

लाली छा गयी मुंह के ऊपर, सिरियल देवी गयी शरमाय।

हाथ थामकर वह सिरियल का, पहुँचा उड़न खटोला मांय,

नाम पूछ सिरियल रानी से, बोला मीठी बात बनाय।

 

चलो चलें इस बाग के अंदर, ये मेरे मन गया है भाय,

उतरे दोनों बाग के अंदर, खुशियों से तन बहका जाय।

लगे खेलने चौपड़ दोनों, बड़ बड़ कर वो दांव लगाय,

सुध बुध भूल गये वो दोनों, बुद्धि गयी भरम में आय।

 

हार गयी है सिरियल सब कुछ, आखिर तन मन धन सब दिया हार,

प्राण पति माना जाहर को, और माना सोलह सिंगार।

छूने लगी चरण जाहर के, झुकी है चरण कमलों की ओर,

सुनी आवाज कान में मां की, उठ जा बेटी हो गयी भोर।

 

सपना टूट गया सिरियल का, चौंक उठी सिंझा सुकुमार,

सपना घूम रहा आंखों में, तन मन धन सब कुछ दिया था हार।

प्रेम से मात सिरौंजा बोलीं, हाथ शीष पर रहीं फिराय,

जल्‍दी उठकर कुल्‍ला कर लो, सखियां तुम को रहीं बुलाय।


सिरियल व सखियों का वार्तालाप – Gogaji Ka Vivah


कर स्‍नान सिरियल रानी झट, पहुँची सखियों के दरम्‍यान,

ताना मार रहीं सब सखियां, तरह तरह के चलते बाण।

गुमसुम बैठ गयी जा सिरियल, सखियन संग में बोले नाय,

घूम रहा आंखों में सपना, बार बार वह पड़े दिखाय।

 

कितना सुंदर राजकुँवर था, मन में सोच सोच रह जाय,

पति उसी को मानूँगी मैं, पर को अब परिणाऊँ नाय।

सखियां बोली सुन लो सिरियल, क्‍या तू सोच रही मन माय,

क्‍या तेरी तबियत ठीक नहीं है, सुस्‍त हमें तू पड़े दिखाय।

 

इसमें क्‍या तू रही छिपाय, सच्‍ची बात बताती नाय,

खास बात कुछ अवश्‍य हुई है, आंखें तेरी रही बताय।

घेर लिया सखियों ने मिलकर, अब छुपने को छुपती नाय,

बात बतानी होगी तुम को, ऐसे बात बनेगी नाय।

 

सिरियल बोली प्‍यारी सखियों, मैं तुम सबको देऊँ बताय,

अब तो बतानी पड़ेगी तुमको, ऐसे तुम मानोगी नाय।

सपने में देखा एक युवक, ददरेवा का राजकुमार,

रूप देखकर मोहित हो गयी, उसको मान लिया भरतार।

 

सारा हाल बताया उनको, एक एक बातें दी समझाय,

वो ही सपना घूम रहा है, चैन मुझे अब पड़ता नाय।

सिरियल से यूँ बोलीं सखियां, सुन लो रानी ध्‍यान लगाय,

झूठी माया है स्‍वप्न की, इसमें रही तू क्‍यों भरमाय।

 

स्‍वप्‍न में कुछ भी हो सकता, अनहोनी पल में हो जाय,

मुर्दा हो सकता जीवित, आंख खुली तो कुछ नहीं पाय।

छोड़ स्‍वप्‍न की बातों को तू, सच्‍ची बात स्‍वप्‍न की नाय,

भूल जा अब वो बीता सपना, कल को और नया आ जाय।

 

कैसे भूलूँ हे सखी वो मूरत, दिल में मेरे गयी समाय,

मन की बात नहीं मेरे बस की, इसके आगे कौन बिसाय।

चलो बाग की सैर करेंगे, धीमी धीमी पड़े फुहार,

ठण्‍डी ठण्‍डी हवा में बहिना, भूल जावोगी राजकुमार।


सिरियल का सखियों संग बाग में जाना – Gogaji Ka Vivah


चली वहां से सिरियल रानी, सब सखियों को संग लिवाय,

बाग जनाने में जा पहुँची, सुन लो सज्‍जनों ध्‍यान लगाय।

देखी जब बाग की हालत, गुस्‍सा गया बदन में छाय,

नष्‍ट भ्रष्‍ट थी सारी बगिया, हाल वहां का कहा ना जाय।

 

ताल कटोरे पर जब पहुँची, आंखें सुर्ख लाल हो जाय,

किसने गत ये कर डारी है, मन में गयी सनाका खाय।

ताल कटोरा किया था गन्‍दा, बगिया सारी देई उजार,

देख देख कर वहां की हालत, गुस्‍से का कछु नहीं शुमार।

 

देखी जा जब केशर क्‍यारी, गुस्‍सा रोके रुकता नाय,

हुआ अचम्‍भा और भी भारी, घोड़े के सुम पड़े दिखाय।

कौन दुष्‍ट जो घुसा बाग में, उसको दण्‍ड दिलाऊँ जाय,

जाकर मेरे पिता पास में, सारी हालत दूँ समझाय।

 

इतनी हिम्‍मत है किसमें, जो मन में जरा भय नहीं खाय,

बेधड़क हो घुसा बाग में, मरते से भी डरता नाय।

गुस्‍से में भर चली है सिरियल, बात स्‍वप्‍न की भूल जाय,

तन की सुध बुध सब भूल गयी, गुस्‍सा रहा बदन में छाय।

 

पहरेदार को जाय जगाया, जो सोया था ठण्‍डी छाय,

कर्म कर्तव्य भूला अपना, तन की सुध भी देई गवाय।

जब सिरियल ने जाय जगाया, उठ बैठा वह पहरेदार,

हक्‍का बक्‍का रह गया बिल्‍कुल, देखी जब सिंझा सुकुमार।

 

पत्‍थर वत वह रहा देखता, तन की सुध कछु रही है नाय,

थूक बन्द हुआ है मुंह का, बोली कछु निकलती नाय।

नजर उठा जब बाग को देखा, मन में गया अति घबराय,

सजा मिलेगी मुझको भारी, रोनी सूरत लेई बनाय।

 

हाथ जोड़कर बोला झट से, शीष जमीं पर दिया झुकाय,

माफ कसूर करो सब मेरा, बिगड़ी बात बने कछु नाय।

आंख लाल कर बोली सिरियल, क्‍यों तू बातें रहा बनाय,

अभी मैं जाऊँ पिता पास में, दंड तुझे दूँगी दिलवाय।

 

सारी बातें सुन रहा लीला, छुप करके वो कान लगाय,

पहरेदार की दशा देखकर, मन में सोच सोच रह जाय।

चला वहां से लीला घोड़ा, सिरियल पास में पहुँचा आय,

बोला असली मैं हूँ दोषी, इसको नाहक रही सताय।

 

ध्‍यान से देखा जब घोड़े को, सिरियल गयी अचम्‍भा खाय,

यही अश्‍व देखा है पहले, सिरियल सोच सोच रह जाय।

ये तो वैसा ही घोड़ा है, जो स्‍वप्‍न के देखा मांय,

उसका रंग भी था ऐसा ही, फर्क कछु लगता है नाय।

 

आयी याद वापिस स्‍वप्‍न की, सखियों से फिर कहा सुनाय,

सपना निश्‍चय होगा सच्‍चा, सुन लो सखियों ध्‍यान लगाय।

पास पहुँच कर लीले के, बोली यूँ सिरियल बात बनाय,

कहां से आया कहां को जायेगा, क्‍यों तू घुसा बाग में आय।

 

उजाड़ देई है बगिया सारी, क्‍या ये दिल में गयी समाय,

ठहर जरा तू ठहर यहीं पर, तुझ पर कोड़े दूँ लगवाय।

कहां तेरा असवार छुपा है, जल्‍दी मुझको दे बतलाय,

जो नुकसान किया है तूने, हरजान सब लेऊँ भरवाय।

 

हँसकर बोला लीला घोड़ा, क्‍या हरजाना लेवे भरवाय,

प्रियतम तेरा है वो रानी, जो तुझको ब्‍याह कर ले जाय।

सवार मेरा और आशिक तेरा, सोया जा वो ठण्‍डी छांय,

जाय जगाओ उसको भाभी, मैं कुछ भी बतलाऊँ नाय।

 

इतनी बात सुनी सिरियल ने, मन में अति मगन हो जाय,

सुध बुध भूल गयी है तन की, सखियों से कहा सुनाय।

देखो सपना सच हुआ है, प्रियतम मेरे पहुँचे आय,

सिरियल रानी चली वहां से, गुरू जालन्‍धर लिया मनाय।


जाहरवीर व सिरियल का मिलन व अर्द्धविवाह – Gogaji Ka Vivah


To be continued……

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