GogaJi Ki Katha Kahani Bhag 1-2 || गोगाजी की कथा कहानी भाग 1-2 || Jaharveer Ki Katha || Jaharveer Goga Ji Ki Kahani || Gogaji Maharaj Ki Katha

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GogaJi Ki Katha Kahani Bhag 1-2 || गोगाजी की कथा कहानी भाग 1-2 || Jaharveer Ki Katha || जाहरवीर की कथा || Jaharveer Goga Ji Ki Kahani || जाहरवीर गोगाजी की कहानी || Gogaji Maharaj Ki Katha || गाेेेेेेगाजी महाराज की कथा

GogaJi Ki Katha Kahani Bhag 1-2 || गोगाजी की कथा कहानी भाग 1-2

Bhag 1 || भाग 1

बहुत समय पहले जाहरवती का जन्‍म राजगढ़ जो कि अब चुरू में स्‍थित है, में चौहान वंश के राजा उमरावसिंह उर्फ राजा उम्‍मरसिंह के घर हुआ जो जाहरवीर के दादा थे। उनके बडे लड़के का नाम जोरवरसिंह उर्फ जेवरसिंह और छोटे बेटे का नाम नेवरसिंह व बेटी का नाम छबीली था। ये शान्ति के भगत वीर थे।

इनका नाम सदा अमर रहेगा क्‍योंकि इन्‍होंने राजा होते हुए भी ऐसे ऐसे दुख उठाये, पर फिर भी अडिग होकर अपने धर्म पर डटे रहे। न जाने कितनी परेशानियों के बाद जाहरवीर का जन्‍म हुआ। कुछ समय बाद सिरसा पाटन के राजा कुवरपाल की दो लडकियों बाछल और काछल का विवाह हुआ। दोनों ही लड़कियां अब रानियां बन गईं थी।

एक दिन की बात है, मन उदास होने के कारण राजकुमार जेवरसिंह खड़े थे। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जो अत्‍यंत कटु तथा मन को झकझोरने वाला था। मेहतरानी ने झाड़ू देते समय राजा को डियोढी पर खड़ा देख कर कहा भगवान खैर करना आज निरवंशी का मुख देख लिया है। पता नहीं आज सारा दिन भोजन भी नसीब होगा या नहीं।

मेहतरानी के ये शब्‍द राजा जेवरसिंह ने सुन लिये। मेहतरानी की बात सुनकर वे बहुत दु:खी हुए। जेवर सिंह को मेहतरानी के कटु वचन विष से भी बुरे लग रहे थे। वे सोचने लगे कि यदि इस मेहतरानी ने यही शब्‍द किसी और राजा के समक्ष कहे होते तो वो राजा उसको जिन्‍दा जमीन में गड़वा देता। पर राजा जेवरसिंह एक सत्‍यशील, न्‍यायप्रिय और न्‍यायाधीश राजा थे इसलिये वे ऐसा नहीं कर सकते थे।

 राजा जेवरसिंह ने उस मेहतरानी के कटु वचनों और बातों को अपने मन से निकाल दिया और फिर सोचने लगे कि इस बेचारी का भला क्‍या कसूर है? यह तो हमारे ही पूर्व जन्‍म के पापों का परिणाम है जो कि इस मेहतरानी जैसे नीच लोग भी हमारी बेइज्‍जती करने पर उतारू हैं।

राजा ने मन ही मन कुछ सोचा और कहा कि हे प्रभु मेरे पापों को क्षमा करें और एक बेटा देकर मुझ जैसे दुखियारे का दु:ख दूर करो आपके दरबार में किस प्रकार की कमी है?

जेवरसिंह को दुखी देख राजा उम्‍मेरसिंह ने जेवरविंह का राजतिलक करके उन्‍हें राजगद्दी पर बैठा दिया और जेवरसिं‍ह को शीशमढ़ी का राजा बना दिया। नेवरसिंह को सामंर का इलाका देकर बंटवारा करके आप रामभजन करने लगे।

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जेवरसिंह और नेवरसिंह और इनकी पत्नियां बड़े प्‍यार से रहती थी। लेकिन मुख्‍य कारण नि:सन्‍तान का था। इसी प्रकार रोते-रोते उस परिवार के दिन बीतते जा रहे थे।

एक दिन की बात है, राज पुरोहित दरबार में पधारे और राजा को बोला कि धर्म कर्म करो क्‍योंकि धर्म की जड़ हरि हैं और कोई न कोई सन्‍त महात्‍मा आयेगा और उसके आशीर्वाद से रानियों की गोद भी भर जायेगी।

राजा जेवरसिंह को राजपुरोहित की बातें पसन्‍द आयीं और उन्‍होंने धर्म कर्म करना शुरू कर दिये। जब ऐसा करते-करते कई वर्ष बीत गए तो स्‍वर्ग लोक में भगदड़ मच गयी।

देवराज इंद्र ने एक दिन नारद मुनि और शनिदेव को बुलाकर प्रार्थना की कि मृत्‍यु लोक में जो राजस्‍थान प्रान्‍त में बांगड प्रान्‍त है वहां का राजा बड़े-बड़े यज्ञ कर रहा है। हमें उसे चलकर रोकना चाहिये।

यदि वह इसी तरह यज्ञ करता रहा तो सौ यज्ञ पूरे हो जायेंगे और वह मेरे इन्‍द्रासन पर कब्‍जा कर लेगा। इन्‍द्र की विनती सुनकर नारद मुनि व शनिदेव दोनों राजा जेवर सिंह के दरबार में आ पहुँचे।

इन्‍द्रदेव की विनती सुनकर हुये बहुत बेचैन

अपना रूप छिपाय के चले दोऊ दिन-रैन

चले दोऊ दिन रैन भेष पण्डित काकीना

पोथी पत्रा दबा बगल में बजाये दोनों वीणा

दोनों ददरेड़ा नगर जा पहुँचे जहा राजा जेवर सिंह बगले में हो रही यज्ञ बज रहा बाजा। पण्डित वेद पढ़ रहे हैं जिसकी मधुर ध्‍वनि हो रही है। दोनों ने हैरान होकर मुँह से बात कही। शनिदेव हिम्‍मत करके आगे बढ़े। राजा की पगडंडी में गये विराजमान में बलधारी ये गत देखकर बोले नारद मुनि वैना।

नारद मुनि के वचन सुनकर राजा जेवरसिंह ने सिंहासन से उठकर दोनों महात्‍माओं को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। राजा ने मुनि से कहा कि आज आप दोनों के दर्शन प्राप्‍त करने की मेरी आशा पूर्ण हो गयी।

राजा ने कहा हे ब्रह्मज्ञानी देव मेरी इच्‍छा पूरी होने का वचन देने की कृपा करें और मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताने का कष्‍ट करें। यह सुनकर नारद मुनि ने कहा कि हे राजा तुम मेरे बताये मार्ग पर चलोगे तो तुम्‍हे अवश्‍य ही पुत्र की प्राप्ति होगी।

इतने शब्‍द नारद मुनि के मुखारबिन्‍दु से सुनकर राजा ने अपना शीश झुका दिया और यज्ञ बन्‍द करवा दिये। खूब दान-दक्षिणा दी। जिसके लायक जो पण्डित था उसको उसी प्रकार की दक्षिणा देकर प्रसन्न मन से भेजा गया। और शनिदेव जो न करें सो कम ही है। उन्‍होंने राजा जेवरसिंह की मति हर ली। राजा इन्‍द्र का सदमा दूर कर दिया। लेकिन पुत्र प्राप्ति के उपाय राजा जेवरसिंह को बताकर उनका कष्‍ट हल्‍का कर दिया।

राजा जेवरसिंह ने उन दोनों देवताओं के चरण पकड़कर खूब खातिरदारी की। नारद मुनि व शनिदेव दोनों ने राजा को आर्शीवाद दिया कि आपकी मनोकामना भगवान अवश्‍य पूरी करेंगे। इतना कहकर दोनों देवता स्‍वर्ग लोक में चले गये।

देवराज इन्‍द्र से यज्ञ को बन्‍द करवाने की बात कही फिर दरबार बन्‍द होने के बाद बड़ी खुशी से महल में पहुँचे। रानी बाछल बहुत मुद्दत के बात अपने पति के चेहरे पर खुशी देख रही थी। वे बड़ी प्रसन्‍न हुई हाथ जोड़कर राजा को पलंग बिछाकर पान का बीड़ा देकर बिठलाया।

मुँह पर मधुर मुस्‍कान देख रानी बाछल कहने लगीं, प्‍यारे आज मैं तुम्‍हारे चेहरे पर खुशी देख बहुत प्रसन्‍न हूँ। क्या यह दासी खुशी का कारण जान सकती है?

रानी के मुँह से ऐसे वचन सुनकर राजा जेवर सिंह को और ज्‍यादा खुशी हुयी और कहने लगे कि रानी आज दो सन्‍यासी दरबार में आये थे उनके चेहरे पर तेज देवताओं जैसा था। मेरी आंखें उनसे नजरें न मिला सकीं।

जो जो उन्‍होंने उपदेश दिये वे सब अपनी भलाई के लिये थे। उन्‍होंने आज्ञा दी है कि गुरू गोरखनाथ प्रसन्‍न होने पर हम सबको दशर्न देकर हमारी मनोकामना पूर्ण करेंगे। वे यह भी कह रहे थे कि गुरु गोरखनाथ भगवान शिव के अवतार हैं। उन्‍होंने भक्‍तों के कष्‍ट सहे हैं।

इसीलिये रानी, गुरू गोरखनाथ महाराज की जोत जलाने की जिम्‍मेदारी तुम अपने ऊपर ले लो। मैं तो वैसे ही राजकाज के झंझटों में घिरा रहता हूँ। फिर यह काम तुम्‍हारा भी तो है। राजकुमार होने का वरदान भी तो तुम्‍हें ही मिलेगा और माता भी तुम ही बनोगी।

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GogaJi Ki Katha Kahani Bhag 1-2 || गोगाजी की कथा कहानी भाग 1-2

राजा की बातें सुनकर रानी मन ही मन फूली न समायी और रानी ने दोनों समय गुरू गोरखनाथ की जोत जलाना शुरू कर दी और प्रार्थना की-

हाथ जोड़कर विनती करूँ धर चरनन पर माथ

मुझ अनाथ को दर्शन दे कीजै नाथ सनाथ

इस प्रकार जोत जलाकर दोनों समय प्रार्थना करती थीं रानी। रानी को जोत जलाते-जलाते काफी समय बीत गया था।

वहीं कहीं गौड़ बंगाल में गुरू गोरखनाथ की समाधि टूट जाती है। नारायण का ध्‍यान भंग होने पर सृष्टि पर नजर घुमाते हैं। क्‍या कोई भक्त नर दु:खी तो नहीं। चारों तरफ नजर घुमाने पर पता चलता है कि राजस्‍थान में ददरेड़ा प्रान्‍त में भक्‍त राजा व रानी महादु:खी हैं।

इस प्रकार देख कर गुरू गोरखनाथ ने सोचा कि वहां जल्दी से जल्‍दी पहुँचना चाहिये। तो गुरू गोरखनाथ ने अपने शिष्‍य औघढ़नाथ को आज्ञा दी हमें बागड़ प्रान्‍त चलना है। सभी को तैयार कर दो। इतनी सी बात सुनकर गोरखनाथ से औघड़नाथ ने कहा क्‍या हम सभी के पाप उदय हो रहे हैं?

अब आप इस गर्मी के मौसम में जंगल में ले जाकर क्‍या मरोगे?

अपने चेले के मुख से ऐसी वाणी सुनकर गोरखनाथ बोले कि शिष्‍य चिंता न कर। वहां रत्‍ती भर तकलीफ न होगी। राजा और रानी बड़े भक्‍त हैं। खूब बढि़या बाग है। वहां फल व मिठाईयां खाने को मिलेंगी। अब हमें नौलखे बाग का हाल भी देखना भी तो जरूरी है। नहीं तो संत, महन्‍त और गोरखनाथ सहित चौदहसौ चेले कहां ठहरेंगे?

काफी समय पहले राजा जेवरसिंह ने ठेकेदारों व माली को नौलखा बाग लगवाकर उसमें धर्मशाला, मन्दिर और कुंए तथा प्‍याऊ भी बनवायी। कुछ समय बाद पेड़ों से फल पककर लटकने लगे।

तब बाग के माली ने सोचा कि पहली भेंट फलों की राजदरबार में पहुंचाने से काफी इनाम मिलेगा। गरीबी खत्‍म हो जाएगी। ऐसा मन में विचार कर एक खूब बढि़या डाली सजाकर राजदरबार में पहुँच कर हाथ जोड़ कर प्रणाम कर शीश झुकाकर खड़ा हो गया।

राजा जेवरसिंह ने जब माली के सिर पर डल्‍ला देखा जिसकी महक सारे रादरबार में फैल रही थी तब राजा ने माली से पूछा कि इसमें क्‍या है?

माली हाथ जोड़कर बोला, महाराज, आपके बाग फल मेओं की डाली हैं। सबसे पहले राजा को देने का कायदा है। माली के मुख से ऐसे वचन सुनकर राजा फूलकर कुप्‍पा हो गया। खुशी के मारे मुख से बात न निकली।

राजा ने अपने गले के कीमती मोतियों की माला माली को पहना दी। राजा ने इसके साथ ही खजानची को आज्ञा दी कि माली को एक सौ एक सोने की मोहर इनाम में दे दी जाएं। राजा ने माली को आज्ञा दी कि तुम इस डाली को महल के अन्‍दर पहुँचाओ और रानी से भी इनाम पाओ।

राजा को शीश झुका डाली के साथ लेकर महल में गये। डाली लेकर माली राजमहल में पहुँच गया और हाथ जोड़कर कहने लगा- सुनो बाछल राजकुमारी मैं नौलखे बाग का माली हूँ।

पहले गया दरबार तो राजा जी ने हुक्‍म सुनाया

महलों में पहुचाओ तो रानी से मिले इनाम सवाया

जाकर करो प्रणाम सुनो महारानी

महक रही फूलों की डलिया रात-दिन दिया पानी

बड़ी मेहनत से बाग लगाया किया प्रभु से

मनचाहा वचन ये मेरे सच्‍चे प्रभु दिन आगे भी लावेंगे

अच्‍छे उनके अंधेरे न रानी भर भंडार पूरे

समझे सभी ज्ञानी ध्‍यानी

एक दिन न रहे सदा यह चलती फिरती

छाया सभी ने जानी

फिर रानी ने माली से डलिया उतारने को कहा और माली से बोली-

हे मालिन के लाडले वचन तेरे अमोल

कौन बाग की डलिया लाया महक उठी बेतोल

महक उठी बेतोल कि सारे घर में खुशबू फैली

किसके बेटा क्‍या नाम पिता का माता तेरी दुहेली

माली का जवाब-

माली ने रानी से कहा कि हे महारानी आपने नौलख लगवा दिया। उसी नये बाग की डाली लाया महल रहा महका आ रही है। अजब बहार रानी जी, फल फूलों मेवों से लद रही डाली चाहे सारी बस्‍ती खाये मैंने ईश्‍वर का गुणगान गाया।

माली के ये शब्‍द सुनकर कि उसके माता-पिता उसे छोड़कर मर गये थे और यह हमारे नौलखे बाग का माली है आंखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। वह प्रभु का ध्‍यान कर कहने लगी कि भगवान तुम्‍हारी अजब माया है, कोई एक लाल को तरसे और और कोई अपने लाल को बिना सहारे ही छोड़कर स्‍वर्ग लोक चला गया।

फिर रानी ने आंसू पोंछकर कहा कि अच्‍छा ये हमारे नौलखे बाग की डाली है। तब मुझे बताओ धर्मशाला कैसे बनी है? शिवजी का मन्दिर कैसा बना है? कुंए का पानी तो खूब मीठा होगा? प्‍याऊ पर कहार उपस्थित है या पण्डित? मुझे सारा हाल सुनाओ।

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इतनी सुनकर माली बोला-

महारानी जी, शिव का मंदिर व धर्मशाला किस मुंह से कहूँ कि आपके महल से भी खूबसूरत बने हैं। शिव मंदिर में जगह-जगह जवाहरात जड़ी हैं। धर्मशाला का काम भी देखने लायक है। साधु, संत और महात्‍मा कोई न कोई रूका हुआ ही रहता है। आप चलकर तो देखें आपका मन प्रसन्‍न हो जाएगा।

माली के वचन सुनकर रानी बड़ी प्रसन्‍न हुई और बोली-

हां, किसी दिन देखूँगी। इस मामले में हम बड़े घर की नारियां आजाद नहीं हैं। पंडित जी को बुलवाकर मुहूर्त निकलवाकर भगवान शंकर के दर्शन भी कर आऊँगी। यदि भगवान ने चाहा तो जग जौन्‍यार भी होगी। भण्‍डारा भी होगा।

अब तुम अपना इनाम लेकर बाग में जाओ। इनाम देकर रानी बाछल कहती है कि जिस दिन बाग नौलखे का मुहूर्त करने आवेंगे तब भी तुम्‍हें इसी प्रकार का इनाम मिलेगा।

दे आशीष माली गया‍ जिसको खुशी अपार

दूधों नहाओ पूतो फलो रोज होय जय जयकार

रोज होय जय जयकार रानी जी बात कहूँ मैं सच्‍ची, राजकुमार जब महलों में जन्‍म लेंगे, इनामी अच्‍छी वक्‍त प्रभु जल्‍दी लावें, मनचाहा फल हम पावें, क्‍या मैं करूं बयान ईश्‍वर से लौ ही लगायी जावें।

इतना कह माली इनाम ले बाग में जा पहुँचा और अपनी मालिन को इनाम दिखाया और कहा उसका लहंगा दुपट्टा उसको दे दिया। बाकी का सामान अपने पास रख‍ लिया। माली की यह हरकत देखकर मालिन झगड़ा करने लगी।

वह कहने लगी कि जब मेरी और तुम्‍हारी शादी हो गई है तो उसी समय से मैं तुम्‍हारे कमाये माल की आधी हकदार हूँ। तो आप सीधी तरह से अपना आधा माल मेरे को दे दो वरना मैं अभी दरबार में जाकर तुम्‍हारी फजीहत करूँगी।

राजा व रानी को कहकर इनाम के सारे माल पर कब्‍जा करूँगी। अभी तो आधे में ही मान जाऊँगी। अब तो अच्‍छाई इसी में है कि सारा जाता दीखता है तो आधा बांट दो कहीं ऐसा न हो कि कहीं सारा ही देना पड़ जाए। राजा के यहां भी रानी की चलती है।

मुझे पूरी उम्‍मीद है कि रान बाछल मेरे ही हक में फैसला देंगी। अपनी मालिन के मुख से ऐसे वचन सुनकर माली बोला-

भाग्‍यवान पहले हमने तुमसे कब बेईमानी की थी जो आज अपने को ईमानदार बता रही हो। इस पर मालिन तड़ाक से बोली जब हमारी शादी हुई थी तब मेरे बाप ने जो दौलत दी थी वह तो तुमने जुए खेल खेलकर लुटा दी। और अब तुम वही हालत इन पैसों की करोगे।

इस पर माली बोला- क्‍या रानी मालिन जेवरसिंह से यो सारी बातें कहोगी? इस पर मालिन बोली कि कहूँगी नहीं तो क्‍या छोड़ दूँगी? वे तभी तुमसे सारा सामान दिलवाएंगे।

अपनी मालिन की बातें सुनकर माली घबरा गया और खुश होकर सारा का सारा माल मालिन को सौंप दिया। माली कहने लगा कि मैं तो तुमसे मजाक कर रहा था। तुम्‍हारी बात ठीक है। घर की मालिक तुम ही हो। मैंने बचपन की नासमझी में जो गलत कार्य किये ये उन पर तो मुझे भी अब पश्‍चाताप आ रहा है।

इस पर मालिन बोली-

अगर उस समय मैं बड़ी होती तो क्‍या तुम घर की बरबादी कर सकते थे? चलो अब हमारे दिन फिर गये। काफी माल आ गया। अब प्‍यार से रहेंगे।

इस पर माली ने मन ही मन सोचा-

बड़ी चालाक है। इनाम का सारा का सारा माल छीनकर अब मीठी बातें बना रही है। लेकिन गलती मेरी ही है कि सारा माल इसे दिखा दिया।

उधर माली को विदा करके बाछल रानी को खुशी हुई अपार

नन्‍द छबीली को बुलाकर सतिये रखे चार

सतिये रखे चार महलों में बाजी बधायी

ढोलक मन्‍जीरे बजायी खुशी का पार न आवे

जैसे लड़का पैदा होने की खुशी मनावें

महल में मिठाईयां बँट रही हैं। स्त्रियां गीत गा रही हैं।

भर सिसकारी बजा हथेली छबील दे हरबायी दान दिये रानी बाछल नन्‍द लिया पल्‍ला फैलाय, क्‍या छवि वरनू महलन की मुझ से नहीं होये बड़ाई।

रानी बाछल आज बहुत प्रसन्‍न हैं और गरीबों में मिठाईयां और पकवान बटवा रहीं हैं। वह राजा का इन्‍तेजार कर रही हैं कि कब राजा के साथ बाग देखने जाऊँगी। दिन छिपे शाम के वक्‍त दरबारर की समाप्ति पर राजा महल में पधारते हैं। वे रानी बाछल से कहते हैं कि रानी जी आज हमारे नौलखे बाग में फूल आये थे, क्‍या हमें खाने को नहीं मिलेंगे? आज हमारी खुशी का दिन है।

जैसे बाग में फल आये हैं ऐसे ही एक दिन भगवान हमारे घर में एक पुत्र रूपी फल जरूर भेजेंगे। रानी के कहने से राजा जेवर सिंह ने फल हाथ से टोकरी में रख दिया मगर उनकी इच्‍छा फल खाने की बनी रही।

राजा रानी बाछल से कहने लगे रानी जी, फिर पंडित को बुलवाकर ब्‍याह सुझवाना चाहिये। हमें धन की चिन्‍ता नहीं है। चाहे कितना भी खर्च हो तुम्‍हारे सुख में हम भी सुखी हैं। धन का सदुपयोग होना कोई बुरी बात नहीं है।

इतना सुनते ही रानी ने अपनी दासी को राजज्‍योतिषी के पास बुलवाने के वास्‍ते भेजा। बांदी रानी का हुक्‍म सुन पण्डित जी को बुलाने चल पड़ी। पण्डित ने भी बांदी के वचन सुनकर पल भर की भी देर नहीं की।

झटपट स्‍नान और पूजा-पाठ कर माथे पर चन्‍दन का तिलक लगाया और अपना राम नाम नामी दुपट्टा कंधे पर धर पोथी पत्रा बगल में दबाया। शिव शंकर का ध्‍यान रखकर खड़ाऊं पहनी और बांदी के पीछे चल दिये।

राजा और रानी ने जब डियोढ़ी में बांदी व पण्डित की आवाज सुनी तो झटपट दोनों में पण्डित जी को प्रणाम कर शीश नवाया। पण्डित ने खुशी रहो का वरदान दिया। बांदी ने रानी के इशारे से पण्डित को मुढे पर बैठाया।

तब पण्डित जी बोले कि सेवक को कैसे याद किया?

इतनी बात सुनकर राजा जेवरसिंह कहने लगे। पुरोहित जी महाराज, हमारे नौलखे बाग में बड़े-बड़े मीठे फल लदे पड़े हैं। आज हमारे बाग का माली फल फूल और मेवा की डाली लाया था। जब हमने फल खाने को हाथ उठाया तो हमारी रानी ने अड़चन पैदा कर दी कि पहले बाग की शादी करो तब फल खाना। इससे पहले फल खाना क्षत्रिय धर्म में निषेध है।

अत: आप कृपा कर बतायें कि क्‍या यह ठीक है? यह सब बातें बुढि़या पुराण की हैं। मेरी शंका का निवारण करें।

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इतनी बात राजा जेवरसिंह की सुनकर पण्डित जी ने कहा-

राजन, रानी की बात सर्वथा उचित है। बुढि़या पुराण कुछ नहीं होता है। लेकिन पुराण तो अठारह ही होते हैं। यह उन्‍नीसवां बुढि़या पुराण कहां से कूद पड़ा? अब रही बाग के मुहूर्त की बात सो पत्रा देखकर ज्‍योतिष विद्या के द्वारा सब बतलाये देता हूँ।

गौरी सुत को ध्‍यान धर पण्डित चतुर सुजान

स्‍वर गिने पोखे हैं उंगली के स्‍वर नथुनों का कर ज्ञान

न‍थुओं का ज्ञान कर अपने पंचांग को खोला

राहु चन्‍द्रमा का कर विचार ब्रहस्‍पति जी को तोला

राजा सुनो बात हमारी ग्रह नहीं अनुकूल

जो तुम जाओ बाग में सूखे मेवे और फल भूल

तुम मानो बात हमारी जो न मानोगे तो पछताओगे। पण्डित जी की बातें सुन राजा व रानी दोनों बड़े बेचैन हो गये और पण्डित जी से बोले –

इसका कोई मतलब भी तो आपके वेद में लिखा होगा। इतनी बात सुनकर पण्डित  भयभीत हो गया। और अपने मन ही मन कहने लगा कि यह राजा का महल है। इसकी रीति रिवाज उल्‍टी होती है।

राजा जोगी अगन जल न होय किसी के मीत इनसे बचकर चलिए थोड़ी पाले प्रीत।

ऐसा मन में सोचकर पण्डित बोला कि उपाय क्‍यों नहीं है, राजा और रानी अपनी आंखों पर पट्टी बाँधकर जावें। बाकी शादी का इन्‍तजाम, भोजन, भण्‍डारे, ज्यौनार और गाने व बजाने का इन्‍तेजाम दूसरे लोग करें।

आपको मेरी प्रार्थना स्‍वीकार हो तो बेशक ब्‍याह करवा सकते हैं। आपको यह शादी देखनी निषेध है। यह बात कहने पर राजा-रानी दोनों उनकी बातों पर खुश हो गये। भादवा बड़ी नवमी का शुभ दिन रख लिया गया और शादी बड़ी धूमधाम से होने लगी।

राजा देखा आवता नीली घोड़ी पर असवार

दौड़ा माली बाग का खोला फाटक छविदार


Bhag 2 || भाग 2

फाटक खुलने पर राजा और रानी दोनों बाग में जा पहुँचे। राजा और रानी की आंखों पर रूमाल बांधने का क्‍या कारण हो सकता है? यह जानने के लिये लोग व्‍याकुल थे। क्‍या दोनों की आंखें इसी समय उखने को आती थी? सारी प्रजा को मलाल था लेकिन किसी ने कुछ अन्‍दाज लगाया तो किसी ने कुछ और अन्‍दाजा लगाया। पर बोलने की हिम्‍मत किसी की भी नहीं हुई।

ब्‍याह बाग का हो रहा नृप जेवर दे रहे मान

मोती भूगा हीरा पन्‍ना खुला कर रहे दान

लुट रहे मेहमान सबके खजाने भारी

दोनों हाथ लुटाय धन को भारी खुशी भिखारी

प्‍यारे जी भरी खुशी भिखारी लूट रहे हीरा मोती

आंखों पर पट्टी बंधी राव को कैसे देखे बिन ज्‍योति।

राजा जेवरसिंह को गुस्सा आया

पट्टी आंखों से खोलो रानी को वचन सुनाया

रानी जी तुमसे क्‍या कहूँ मुझसे रहा न जाय

दुनियां लूटे बाग सुख मेरा कौन पाप रहा छाय

रानी जी मैं तो किसी की बात नहीं मानूँ

घोड़े पर चढ़कर सैर करूँगा करु मैं अपने जी की कहूँ मैं तुमसे रानी

फल मेवे तो दूर रहे हमने नहीं पिया कुएं का पानी

अपने स्‍वामी के मुख से ऐसी वाणी सुनकर रानी बाछल हैरान रह गयीं लेकिन पत्‍नी का यह धर्म होता है कि वह अपने पति की आज्ञा का पालन करे।

रानी राजा से कहने लगीं-

हां स्‍वामी आपकी बात बिल्‍कुल ठीक है। मेरा भी मन बाग की सैर करने को कर रहा है। मैं भी आपके साथ चलकर बाग की सैर करूँगी। फिर राजा घोड़े पर सवार हो जाते हैं। रानी झुले में बैठ जाती हैं। आगे बाजे वाले हैं।

उनके बांए और दांए चोभदार वजीर तथा उमरावों लोग हैं। राजा-रानी ने अपने आंखों से पट्टी खोल दीं और पेड़ पौधों पर नजर घुमायी। राजा और रानी की नजर पड़ते ही बाग के सारे पेड़ मुरझा जाते हैं और सूख जाते हैं। कुँए का जल खारा हो जाता है।

जब राजा रानी ने देखा न हमारे बेटा बेटी है और हमने चाव से खूब धन खर्च कर बाग लगवाया। बाग को अपना बेटी बेटा समझते हुए पेड़-पौधों का ब्‍याह रचाया तो ये भी हमारे कर्म से सूख गये। अब हमारे बाग में कौन आयेगा? कौन धर्मशाला में ठहरेगा? कौन बिना पानी शिवालय में पूजा करने आयेगा?

प्रभु दया करो। राजा जेवरसिंह ने सोचा कि इस जिन्‍दगी से तो मर जाना ही अच्‍छा है। राजा तलवार निकालकर अपनी गर्दन पर मारना चाहते हैं। रानी तलवार वाला हाथ पकड़कर कहती हैं कि आप पहले मुझे मारो बाद में खुद को मारना। विपदा सदा न रहती है।

अच्‍छे और बुरे दिन धूप और छाया की तरह आते जाते रहते हैं। आज हमारा बुरा वक्‍त है तो कल अच्‍छा भी आयेगा। किसी कवि ने कहा है कि रात को सपना दिखायी दिया है कि सूखा बाग हरा हो जाएगा, कुँए का जल मीठा हो जाएगा।

अब महलों की ओर चलो क्‍योंकि मेरी भी जोत जलाने का समय होने वाला है। इसलिये यहां पर देर करना अब ठीक नहीं। रानी अपने राजा को समझा बुझा कर महल ले आयीं। पंचरंग महल में पलंग बिछा कर आराम करने को कहा।

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रानी गुरू गोरखनाथ जी की जोत जलाने लगी। रानी बाछल राजा को समझा बुझा कर धीरज बँधा कर महलों में ले तो गयीं पर राजा का मन खट्टा हो चुका था। उनको यह दुनिया अच्‍छी नहीं लग रही थी। वे सोचते थे क्‍या इसी का नाम दुनिया है?

क्‍या इसी का नाम राजसुख है? मेरी आंखें चिन्ता के कारण मगज में धंस गयी। गाल चिपक गये। खाना-पीना सोना सब हराम है। अक्‍सर रात को नींद आती ही नहीं है।

मेरे को घर को छोड़कर साधु बनने की धुन सवार हो गयी है। फिर सोचने लगे कि फिर रानी पर क्‍या बीतेगी? अगर अपने भाई को राज्‍य सौंपता हूँ तो रानी बाछल रो-रोकर मर जाएगी। और इसका रानीपन मिट्टी में मिल जाएगा।

बांदी से बुरी इसकी दशा हो जाएगी क्‍योंकि मेरे भाई की स्‍त्री इसकी बहन का छल बड़ी ही चालाक है। वह अपनी बड़ी बहन का सा बर्ताव रानी बाछल के साथ बिल्‍कुल नहीं करेगी। उससे अच्‍छा बर्ताव होने की जरा भी आशा नहीं है। इसलिये रानी बाछल के शीश पर ही ताज रखना मुनासिब है।

मेरी पतिव्र‍ता नारी का स्‍वभाव दयालु और नरम हिसाब का है। वह राजकाज को समझने लायक पढ़ी लिखी और तीर, तमन्‍चा व तलवार चलाने में भी काफी निपुण है। इसके अलावा उसके चेहरे पर तेज भी है। रानी बाछल अपने दुश्‍मनों का मुकाबला करने में भी काफी चतुर है। यह सभी ठीक है।

नीच न छोड़ नीचता कोटिन करो उपाय

नाग जहर ही उगलता चाहे देखो दूध पिलाय

राजा जेवर सिंह उस रात पलंग पर सोते-सोते इसी प्रकार के विचार करते हैं। उन्‍हें नींद नहीं आयी। सुबह हो गयी। राम का नाम लेकर शय्या त्‍याग दी। रानी भी नहा धोकर नित्‍य कर्म कर गुरू गोरखनाथ की जोत जलाकर आ गयी और हाथ जोड़कर पति के चरणों को नमस्‍कार किया।

वे राजा जेवर सिं‍ह से बोली कि आपका चेहरा उदास क्‍यों है? क्‍या रात को नींद आयी या नहीं? रानी के मुख से हमदर्दी के वचन सुनकर राजा बोले रानी जी तुमसे अपने मन की बात कहना चाहता हूँ। आशा है कि आप मेरे कार्य में विघ्‍न न डालेंगी। पतिव्रता नारी को कष्‍ट सहकर भी अपने पति के वचन मानना चाहिये।

प्रभु कृपा के अधीन रानी जी अगर ध्रुव वन में नहीं जाते तो कितने दुखी होते। सौत चुन की भी बुरी होती है। दूसरी शादी से कोई सुख नहीं हुआ। मुझे ऐसा संतान सुख नहीं चाहिये। मेरा तो पक्‍का विचार साधु बनकर वन में भजन करने का है।

तुम्‍हारे शीश पर ताज रखने की मुझे पूरी आशा है कि बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा जैसों से निश्‍छल व्‍यवहार करोगी। सलाह के लिये मेरे पिताजी और भाई नेवरेसिंह व बहन छबीली हैं। परन्‍तु अपनी बहन से सावधान रहना।

वह तन की उजली और मन की काली है। यह लो खजाने की चाबी और अंगूठी उठाओ। यह इकरारनामा है। इन पर पंचों, मंत्रियों और खजानची फौजदारों के दस्‍तखत होना बाकी हैं। अभी बुलवाकर करवा देता हूँ।

अपने पति के मुख से इस प्रकार के प्रेम वचन सुनकर रानी बाछल घबरा गयीं और हाथ जोड़कर कहने लगीं-

क्‍या इस प्रकार से किसी और ने भी घर छोड़ा है जो आप घर बार छोड़कर मुझ अकेली नारी पर राज का कार्यभार छोड़कर जाना चाहते हो। क्‍या घर पर रहकर भी राम भजन नहीं हो सकता? अगर घर में एक लाल भी होता तो भी मैं सब्र कर लेती।

शहर के लोग मुझे ही बेकार कहेंगे। मेरा जीना ही भारी हो जाएगा इसीलिये महल के एक हिस्‍से में ही सन्यासियों का सामान रख लो और खूब अच्‍छी तरह से पूजा पाठ करिये जैसे कि आपके पिताजी करते हैं। रानी बाछल ने रो-रोकर राजा के पैर पकड़कर काफी प्रार्थना की मगर राजा जेवरसिंह को वैराग्‍य हो गया था।

फिर राजा जेवरसिंह रानी से कहने लगे-

रानी जी तुम कैसी बात करती हो? अपने मन को पक्‍का करके धीरज धरो। मोह का त्‍याग करो। एक मैं ही क्‍या न जाने कितनों ने इसी प्रकार दुखी होकर घर त्‍यागे। इस मोह के कारण अनगिनत भक्तों को घर त्‍यागना पड़ता है।

अगर घर में इन लोगों को शांति मिलती तो ये लोग वन में ही क्‍यों जाते? इन सभी महात्‍माओं की तरह मुझे भी यह घर काटने दौड़ता है। यहां मैं बहुत जल्‍दी मर जाऊँगा और तब भी तुम्‍हें राजकाज संभालना पड़ेगा। मुझे मेरे मन की करने आज्ञा दो।

मन की शांति में रुकावट न डालो। राजा जेवरसिंह की बात सुनकर रानी बाछल ने अपने मन में अच्‍छी तरह से समझ लिया कि अब यह नहीं मानने वाले हैं। इन्हें सच में वैराग्‍य हो गया है।

इनके मन को यहां शांति नहीं मिलेगी। जब इनका मन शांत हो जाएगा तो अपने आप घर वापस लौट आयेंगे। इसीलिये मन शांत होने पर घर वापस आने का वचन ले लेना चाहिये।

इस प्रकार रानी बाछल हाथ जोड़कर बोली-

पतिदेव मुझे एक वचन आप भी देवें कि जब आपका मन शांत हो जावे तब घर आकर सीधे मुझ अभागन को दर्शन देना। कारण यह है कि मुझे गोरखनाथ की जोत जलाते हुए काफी समय हो गया है। अब वे मुझे शीघ्र ही दर्शन देने वाले हैं। ऐसे में आपका होना अति आवश्‍यक है।

परंतु गोरखनाथ के वरदान का क्‍या बनेगा आशा है कि आप खूब समझ गये होंगे। इस प्रकार रानी के वचन सुनकर राजा जेवरसिंह को बड़ी शांति मिली। राजा ने यह सब कर वन में जाने में ही अपनी भलाई समझी। उन्‍होंने वन जाने की तैयारियां शुरू कर दीं। बस्‍ती के सेठ साहूकारों, दरबारियों व फौजदारों आदि को बुलाकर राजमुकुट रानी बाछल के शीश पर रखा और वसीयतनामे पर जिम्‍मेदार लोगों के हस्‍ताक्षर करवा दिये।

उन्‍होंने हुक्‍म दिया कि आज से आप सभी रानी बाछल की आज्ञा का पालन करें। यही आपकी मालिक हैं। अब से इनके नाम की ही मोहर चलेगी व सिक्‍का ढलेगा। इतना कह कर राजा चिमटा झोली उठा भगवा वस्‍त्र धारण कर राजा जेवरसिंह शिव शिव रटते-रटते नगरी से बाहर हो गये।

राजा, रानी व शहरी जनता व सभी दरबारियों को रोता छोड़कर वन को सिधारे। पीछे-पीछे शहर की सारी जनता चल दी‍ जिनको राजा ने हाथ जोड़कर वापस भेजा। सारी जनता अपने आंसुओं को पोंछती हुई वापस शहर को आ गयी।

और अब अपने विचार कर्मों की हारी रानी बाछल अपने पति के जाने का दुख न झेल सकी और मूर्छित होकर गिर पड़ी। महल की सभी दासियां तथा बांदियां दौड़ पड़ीं ये कहते हुए कि रानी को क्‍या हुआ? रानी तो बेहोश हो गयीं। दौड़कर कोई लखलखा लायीं।

अलग-अलग उपचार करने पर रानी ने आंखें खोलीं। फिर हिम्‍मत कर कामकाज में लग गयीं। दिन में राज करतीं व रात को रोया करतीं। परंतु इस विपरीत समय में भी गुरू गोरखनाथ की जोत दोनों समय याद करके जलाती थीं।

फिर गुरू गोरखनाथ को अपनी भक्तिन की परीक्षा भी तो लेनी थी कि वह सुबह शाम उनकी जोत जलाती है या नहीं।

फिर राजा जेवरसिंह वन में जाकर तप करते हैं व राम नाम जपते हैं। रानी बाछल, राजा जेवरसिंह के गम में मन ही मन खूब रोती हैं। दरबार का काम भी संभालती हैं और घर का भी। रानी रो-रोकर प्रभु से प्रार्थना करती हैं कि हे भगवान अब नहीं सहा जाता या तो मेरे स्‍वामी को भेजो या मुझे भी धरती से उठा लो। रानी पागल हो गयी थी। 

उनकी अक्‍ल ही काम नहीं देती थी कि क्‍या करना है और क्‍या नहीं करना है। एक दिन सुबह होने से पहले ही अपनी नीली घोड़ी पर सवार हो अकेली रोती हुई राजा जेवरसिंह की तलाश में वन में घुस गयी। वे रो-रोकर भगवान से अपनी मौत मांगने लगीं।

रोजाना की तरह कहने लगीं कि भगवान मुझ पापन को धरती से उठा लो मैं बहुत दुखी हूँ। या तो मुझ दुखिया के कष्‍ट हरो अन्‍यथा मैं अपना सिर फोड़कर जान दे दूँगी।

विष्‍णुलोक में भगवान रानी बाछल को रोता देख बड़े बेचैन हुए। भला सृष्टि के पालनकर्ता अपने भक्‍त को दुखी कैसे देख सकते हैं? विष्‍णु ने नारद को बुलाकर आज्ञा दी कि तुम जल्‍दी से मृत्‍युलोक में जाकर कजली वन में पहुँचो।

वहां गुरू गोरखनाथ के चेले की 1400 जमात ठहरी हुई हैं। वे भांग घोंट-घोंटकर पर रहे हैं और अपनी झांझ खन्‍जरी बजा बजा कर कीर्तन कर रहे हैं। आप गुरू गोरखनाथ से कहना कि आप जल्‍द से जल्‍द ददरेड़ा नगर पहुँचो अन्‍यथा रानी बाछल को जिन्‍दा न पा सकेंगे।

उसका पति राजा जेवरसिंह भी साधू बनकर घर छोड़कर चला गया है। उनसे कहना कि अगर देर करोगे तो रानी बाछल की हत्‍या का बड़ा भारी पाप हम सभी को लगेगा। उसकी अकाल मृत्‍यु हत्‍या ही मानी जाएगी। वह क्षत्रिय वंश की नारी है।

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भगवान विष्‍णु की आज्ञा लेकर नारद मुनि बंसरी बजाते हुए मिनटों में कजली वन जा पहुँचे और गुरू गोरखनाथ को शीश झुकाकर प्रणाम किया।

गुरू गोरखनाथ मुनि को अपने सामने खड़ा देखकर उनकी बात तुरंत जान गये। उन्‍होंने हँसकर नारद मुनि से पूछा कि ऋषिराज कैसे तकलीफ की? दास की आज्ञा है मैं आपके दर्शन करके निहाल हो गया। आप इस समय कहां से पधारे हैं?

योगीराज गुरू गोरखनाथ के वचन सुनकर देवऋषि नारद कहने लगे योगीराज जी आपसे भला क्‍या छिपा है? मैं विष्‍णुलोक से भगवान विष्‍णु का भेजा आ रहा हूँ। आपकी ददरेड़ा की भक्तिन रानी बाछल बड़ी दुखी है।

अत: आप तुरंत ही ददरेड़ा नगर पहुँचकर उसका दुख हरो। वह एक वीर क्षत्राणी है कहीं ऐसा ना हो कि ज्‍यादा दुखी होकर वह अपनी जान दे दे। ऐसा होने पर हम सब पर रानी बाछल की अकाल मृत्‍यु का पाप चढ़े। उसका पति साधु बनकर वन में चला गया है। इसीलिये वह बड़ी अधीर है।

नारद मुनि की वाणी सुनकर सिद्ध गुरू गोरखनाथ ने अपने चेले औघड़ानाथ को आज्ञा दी कि तुरंत अपने डेरे ददरेड़ा नगर में लगाओ। फिर सभी ने रानी के नौलखे बाग के पेड़ों के नीचे जाकर आसन बिछाया और अपनी-अपनी धूनी के आगे लकड़ी सुलगा दी।

धूनियों का धुआं आसमान में छा गया। एक ऊँचे टीले पर खुद गुरू गोरखनाथ ने अपना धुआं चेताया जो अब तक कायम है। फिर गुरू गोरखनाथ के सभी चेले घोर निंद्रा में ऐसे सोये कि उन्‍हें अपने तन बदन का होश न रहा और सुबह धूप निकलने तक सोते रहे। जब सूर्य भगवान अपनी तेजी पर आनकर अग्नि वर्षा करने लगे तब चेले खड़े हुए।

फिर सभी उठकर नित्‍य कार्यों से फारिग होकर पानी की जरूरत के लिये कुंए की तरफ दौड़ पड़े। परन्‍तु कुँआ सूखा हुआ मिला। उसमें पानी की एक भी बूँद न थी। वे सभी पानी के लिये परेशान हो गये।

वे सब गुरू गोरखनाथ के धूनी के सामने पहुँचे और हाथ जोड़कर कतार बांधकर उनके सामने खड़े हो गये। गुरू गोरखनाथ ने जब अपने दुखी चेलों पर नजर घुमायी तो सभी को उदास देखा। सबको उदास देख अपने चेले औघड़नाथ से कहा कि क्‍या परेशानी है?

अपने गुरू की बात सुनकर औघड़नाथ बोले-

गुरूदेव हम लोगों को किस पाप के कारण सजा मिल रही है? ऐसे हम बिना पानी के सूर्य की गर्मी में झुलसकर बिना मौत मर जायेंगे। और तो और चौदह सौ मुर्दों को उठाकर फेंकने वाला भी यहां नहीं मिलेगा।

मैंने आपसे बंगाल में ही कहा था कि बागड़ राज्य बड़ी खराब जगह है। परंतु आपने यह कहा था कि यहां बड़े बड़े और बढि़या भोजन मिलेंगे। अपने चेले औघड़नाथ के मुख से ऐसी बातें सुनकर गुरू गोरखनाथ को ग‍स्‍सा आ गया।

आंखे लाल करते हुए गुरू गोरखनाथ ने औघड़नाथ से कहा-

औघड़नाथ तू पूरा ही औघड़ रहा। जरा तू यह तो बता कि मैंने तुझसे कभी झूठ बोला है? मनुष्‍य जो पाप करता है तो उसे दण्‍ड तो मिलता ही है। चाहे वह पाप घड़ी भर का हो या मिनट भर का। फिर गुरू गोरखनाथ ने अपने धुंए से भस्‍मी उठाकर चेलों को पकड़ा दी और कहा कि यह भभूति थोड़ी-थोड़ी पौधों के नीचे उड़ा दो।

एक चुटकी औघड़नाथ को देकर कहा कि यह भस्मी अलख निरंजन कहकर कुँए में डाल दो। भभूति लेकर सभी पेड़ों में उड़ा दी। भस्मी के प्रभाव से पेड़-पौधे वापस से हरे-भरे हो गये। फल-फूल आने लगे। तब सभी सन्‍त खुश होकर अपने गुरू की जय-जयकार करने लगे। उनकी जय जयकार के जयकारों की आवाज कोसों दूर तक जा पहुँची।

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इस तरह गुरू गोरखनाथ की जमात के सभी सन्‍त महन्‍त पूजा पाठ कर रहे थे। उधर रानी बाछल की प्रमुख बांदी जिसका नाम मूंगोद था, जो छम-छम करती हुई बाग की ओर जा पहुँची। वह अपनी दोनों आंखें मल-मलकर कभी बाग को देखती थी तो कभी साधु-सन्‍तों को। उसकी आंखों को विश्‍वास नहीं हो रहा था कि क्‍या यह रानी बाछल का वही सूखा हुआ बाग है या कोई दूसरा। कहीं मैं गलती पर तो नहीं हूँ।

इतनी मेवा इतने फल इतने पत्‍ते किसी बिना सूखे बाग में ही नहीं देखे। और तो और ये सन्‍डे मुसटन्‍डे सन्‍त महन्‍त अरी मइया मीलों तक हजारों की संख्‍या में कहां से आ गये? अरे अब तो ये कुँए में पानी भी भर गया है।

अब साधू और महात्‍मा लोग स्‍नान भी कर रहे हैं। इतने में औघड़नाथ की दृष्टि बांदी पर पड़ी जो बड़ी सजी हुई और मुँह में पान चबाये साधू संतों को घूर कर देख रही थी।

औघड़नाथ ने कहा-

भाई क्या बात है? कैसी खड़ी है? किसी से कुछ पूछना है? तुम कौन हो और यहां क्‍यों आयी हो? इतने प्रश्‍न सुनकर बांदी घबरा गई।

बांदी हाथ जोड़कर बोली-

महाराज मैं यह पूँछना चाहती हूँ कि क्‍या यह रानी बाछल का वही सूखा हुआ बाग है या मैं गलत जगह आ गयी हूँ?

बांदी मुगादी के वचन सुनकर बाबा औघड़नाथ बोले कि ये योगीराज गुरू गोरखनाथ की जमात है। और हम सब उनके चौदह सौ चेले गौड़ बंगाल से चलकर शाम के वक्‍त ही यहां पधारे हैं।

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