Machander Nath Ki Kahani Bhag 10 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 10 || Machander Nath Ki Katha Bhag 10 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 10

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 10 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 10 || Machander Nath Ki Katha Bhag 10 || मछंदर नाथ की कथा भाग 10

Machander Nath Ki Kahani Bhag 10 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 10 || Machander Nath Ki Katha Bhag 10 || मछंदर नाथ की कथा भाग 10

Machander Nath Ki Kahani


जिस समय गोरखनाथ जी ने हनुमान जी को त्रिया राज्‍य में प्रवेश करने से रोकने की योजना बनाई उस समय हनुमान जी का निवास सेतुबन्‍ध रामेश्‍वरम में था। वे सुबह के समय सिर्फ भगवान श्रीराम की सेवा में लगे रहते थे और रात के समय त्रिया राज्‍य में जाते थे।

आधी रात को जब हनुमान जी का त्रिया राज्‍य में आने का समय हुआ तो गोरखनाथ के मंत्रों से उन्‍हें रोकने की व्‍यवस्था हो चुकी थी। जैसे ही उन्‍होंने त्रिया राज्‍य में कदम रखा तो उनके शरीर पर वज्रास्‍त्र का आघात लगा।

अब हनुमान जी मूर्छित होकर जमीन पर आ गिरे। अब स्पास्‍त्र का प्रभाव दिखना शुरू हुआ और अब वे भूमि के आकर्षण में बंध गये थे। उनका सारा मनोबल एकदम शांत हो चुका था।

अब बारी थी नागास्‍त्र की। नागास्‍त्र ने हनुमान जी को बांध कर त्रिया राज्‍य की सीमा से दूर फेंक दिया। कुछ समय बाद उन्‍हें होश आया और वे सोचने लगे कि आखिर यह सब कैसे संभव हो सकता है? संकट की इस घड़ी में उन्होंने भगवान श्रीराम को याद किया और वे प्रकट हो गए।


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उन्‍होंने श्रीराम को सब कुछ विस्‍तार से बताया। श्रीराम को हनुमान जी के संकट को समझने में देर न लगी। अब रामजी ने सभी अस्‍त्रों को खोलकर हनुमान जी के बंधन खोले।

उनको विपत्ति से छुटकारा तो मिल गया था पर अब वे स्वयं को अपमानित समझने लगे। यह सोच उन्‍होंने राम से पूछा कि मेरी ऐसी दशा करने वाला कोई दानव है क्या? एक साधारण मनुष्‍य में तो इतनी शक्ति हो ही नहीं सकती।

यह सब सुनकर श्रीराम ने कहा कि देवताओं और मनुष्‍यों में तो इतना बलवान कोई भी नहीं है। इस प्रकार का साहस दिखाने वाला केवल एक ही मनुष्‍य इस धरती पर है। अब हनुमान जी ने कहा कि जो भी कार्य किया जाये वह सोच विचार कर ही करना चाहिये। क्‍योंकि

बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय।

काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय।।

विरोधी का  बल देखे बिना नादानी नहीं करनी चाहिये। हे पवन सुत, इस समय धरती पर केवल नाथ संप्रदाय के लोग ही ऐसा करने की क्षमता रखते हैं। योगी मछंदर नाथ की भस्‍मी से भगवान हरिहर ने अवतार लिया है।

उनका नाम गोरखनाथ है। इस समय वे मछेन्द्रनाथ के चेले हैं जो कि त्रिया राज्‍य के भोग-विलास में लीन हैं। फिर भगवान श्रीराम ने कहा कि गोरखनाथ का उद्देश्‍य आपका अपमान करने का नहीं है। वे तो बस अपने गुरू को त्रिया राज्‍य के कींचड़ से दूर करना चाहते हैं।



इसी कारण से उन्‍होंने आपको यह सब दिखाया है। यह सुन हनुमान जी बोले कि मछंदर नाथ तो मेरी ही आज्ञा से त्रिया राज्‍य में रह रहा है।

मैंने ही रानी मैनाकिनी को उसकी सेवा करने का निर्देश दिया है। अगर गोरखनाथ, त्रिया राज्‍य से अपने गुरू मछंदर नाथ को निकालने में सफल हो गया तो बहुत बड़ा संकट उत्‍पन्‍न हो जायेगा। राम जी बोले कि वह बस अपने गुरू को निकालने के लिये आये हैं।

यह सुन हनुमान जी ने भगवान श्रीराम से कहा कि प्रभु आप तो उन्‍हें समझा ही सकते हैं। शायद वे आपकी बात मान जायें और मेरी भी बात खराब न हो।

राम जी ने उनकी बात मान ली और दोनों लोग ब्राह्मण का वेश धारण कर त्रिया राज्‍य की तरफ प्रस्थान किया। यह वही स्थान था जहां कलिंगा सुंदरी अपनी सखी-सहेलियों के साथ ठहरी हुई थीं और उस समय निद्रा में थीं।

आधी रात से अधिक समय हो जाने पर गुरू गोरखनाथ ने अपने पास दो ब्राह्मणों को आते देखा। वे सोच ही रहे थे कि तब तक दोनों उनके पास आ गये।

गोरखनाथ ने पहले तो उठ उन दोनों का सम्‍मान किया और फिर पूछा कि ब्राह्मण देवता आप दोनों कौन हैं और किस उद्देश्‍य से मेरे पास आते जा रहे हैं?



तो ब्राह्मण वेश धारी भगवान श्रीराम जी ने कहा कि हम आपके पास एक विशेष कार्य के लिये आये हैं। यदि हमारा वचन पूरा करोगे तो हम अपना परिचय देंगे।

पर गोरखनाथ भी कम तेज नहीं थे। उन्होंने सोचा कि इन दोनों को वचन देने से हानि तो हो सकती है और लाभ की गुंजाइश भी कम ही है। फिर गोरखनाथ ने कहा कि देव, बिना परिचय कराये मैं आपको वचन देने में असमर्थ हूँ।  इसीलिये पहले आप लोग अपना परिचय दीजिये।

यह सुन उन्‍होंने कहा कि मेरा नाम राम है और इनका हनुमान। मुझे मेरे भक्‍त हनुमान के कारण आपके पास आना पड़ रहा है। यह सुन गोरखनाथ ने उन दोनों के चरण छुए और कहा कि पहले आपकी आज्ञा का विषय भी जानना चाहूँगा।

तो राम ने हनुमान जी से कहा। तब हनुमान जी ने अपना विषय बताया कि योगीराज जी मुझे पता चला है कि आप मछंदर नाथ जी के शिष्‍य हैं और आप उन्‍हें त्रिया राज्‍य से निकालने का प्रयास कर रहे हैं।

यह सुन गोरखनाथ ने तपाक से जवाब दिया कि तो क्‍या उन्‍हें इस नरक कुण्‍ड में जाने दूँ? नहीं यह मैं हरगिज नहीं होने दे सकता। क्‍या यहां रहने से उनकी योग साधना में अंतर नहीं आया है? अत: यह सब जानकर तो आपको मेरी सहायता ही करनी चाहिये।



यह जवाब सुनकर हनुमान जी सोच में पड़ गये और बोले कि जब आपके गुरू मेरी इच्‍छा से ही त्रिया राज्‍य में रह रहे हैं तो मैं आपकी सहायता किस प्रकार करूँ?

यह सुन गोरखनाथ बोले –

यदि आप मेरी सहायता नहीं करोगे तो मैं भी अपने गुरू को यहां रहने नहीं दूँगा। हनुमान जी ने कुछ नाराज होकर कहा कि मेरे होते तो तुम उन्‍हें यहां से नहीं ले जा सकते। यह सुन गोरखनाथ ने कहा कि संसार की कोई भी शक्ति मेरे इस कार्य में बाधा नहीं डाल सकती।

यह सुन हनुमान जी ने गुस्‍से में आकर अपनी गदा उठायी। यह देख राम जी ने उन्‍हें समझाया कि गुस्‍से से कोई कार्य संपूर्ण नहीं हो सकता। राम जी ने कहा कि आपने रानी मैनाकिनी को जीवन भर पुरूष सुख भोगने का वचन दिया है? तो हनुमान जी ने कहा कि नहीं दिया।

तो क्‍या आपने मछंदर नाथ से जीवन भर सुख भोगने का वचन लिया है? इस पर हनुमान जी ने इंकार कर दिया। तो प्रभु श्रीराम ने कहा कि मछेन्द्रनाथ काफी समय से तुम्‍हारी आज्ञा का पालन कर रहे हैं। आप बस उन्‍हें उनकी इच्‍छा पर छोड़ दीजिये।

वे जो चाहें जायें या नहीं जायें। अगर मछंदर नाथ, गोरखनाथ के कहने पर चले भी जाते हैं तो भी आपको कोई भी हानि नहीं होने वाली है। अब आपका कर्तव्‍य केवल रानी मैनाकिनी और मछेन्द्रनाथ को सचेत करना भर ही है।



इस पर रामजी के कहे अनुसार हनुमान जी त्रिया राज्‍य के महल में जा पहुँचे। आधी रात बीत जाने के बाद महल में शान्ति का वातावरण था।

उस समय हनुमान जी ने रानी मैनाकिनी को जगाना चाहा पर रानी नहीं जाग सकीं। तो हनुमान जी ने आखिरकार उन्‍हें जगा ही लिया। हनुमान जी को देखकर रानी हड़बड़ा कर उठ बैठीं।

रानी ने हनुमान जी को आसन दिया कहा-

प्रभु, इस समय आने का कोई कारण? तो हनुमान जी ने कहा कि जिसका भक्‍त संकट में हो भला उसे कैसे चैन पड़ सकता है। तो रानी मैनाकिनी ने कहा कि प्रभु भला मुझ पर कौनसा संकट आने वाला है? तो हनुमान जी ने कहा कि मानसिक संकट आने वाला है।

इस पर रानी मैनाकिनी बोलीं-

आपकी सेवा होते हुए भी संकट आना बड़े ही ताज्जुब की बात है। हनुमान जी बोले कि तुम्‍हारे कहे अनुसार मैंने मछंदर नाथ को आपकी सेवा में लगा दिया और इसी कारण से आपको पुत्र की प्राप्ति हुई है।

परंतु स्‍मरण रहे कि मछंदर नाथ का शिष्‍य गोरखनाथ अत्‍यंत तेज और शक्ति संपन्‍न है। वह अपने गुरू को यहां से ले जाने के लिये आया है और अपने गुरू को साथ लेकर जाएगा।

यह बातें सुनकर रानी मैनाकिनी उदास हो गयी। वह बोली कि सच में? तो हनुमान जी ने कहा वह मानने वाला नहीं है।

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उसका तो एक ही उपाय हो सकता है और वह यह कि तुम मछंदर नाथ को त्रिया जाल में फंसाये रखो जिससे वह इस जाल से मुक्ति न पा सके। अगर तुम्‍हारा जाल ढीला रह गया तो गोरखनाथ अपने गुरू मछंदर नाथ को यहां से ले जाने में कामयाब हो जायेगा।

उधर ब्रह्ममुहूर्त आने पर कलिंगा सुंदरी और उनकी सखियों की निद्रा भंग हो गई। सुबह उठकर उन्‍होंने जब गोरखनाथ को देखा तो वे पद्मासन लगाये बैठे थे।

वे सभी जल्‍दी ही अपने नित्‍य कार्यों से फारिग हुईं और गोरखनाथ भी तैयार ही थे। सभी के रथ में सवार होने पर वे रथ को हांकने लगे। चिन्‍नापहन से चलकर रथ त्रिया राज्‍य के प्रथम द्वार पर आ गया था।

त्रिया राज्‍य पहुँचते ही कलिंगा सुंदरी ने रथ को रुकवा दिया और गोरखनाथ से कहा कि अब आप भी स्‍त्री रूप धारण कर लीजिये। इतने में सभी सुंदरियां रथ से उतर गईं और गोरखनाथ ने भी अपनी योग साधना से अपने आप को स्त्री रूप में ढाल दिया।

उनका नारी रूप देखकर सभी नारियां चकित रह गईं। कलिंगा सुंदरी ने कहा कि बाबाजी आपमें तो सुन्‍दर ताई दिखाई देती हैं। मेरे हिसाब से इस त्रिया राज्‍य की सुंदरी आपके जैसी नहीं है।



उधर राजदरबार में कलिंगा की बाते सुनकर मछंदर नाथ मुस्‍कुरा दिये। कलिंगा ने एक-एक कर अपनी सुंदरियों को रानी मैनाकिनी के दरबार में भेजा। जिन्‍होंने मछेन्द्रनाथ के पास बैठी रानी को नमस्‍कार किया। और कहा कि आपके दरबार में मेरी स्‍वामिनी कलिंगा आपको संगीत कला दिखाना चाहती हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो यहां आकर आपको कला दिखाकर आपका मनोरंजन करें।

रानी ने मन बहलाव का साधन समझ स्‍वीकृति दे दी। यह जानकर कि मनोरंजन करने पर काफी पुरूस्‍कार मिलने की संभावना है तो कलिंगा शीघ्र ही स्‍त्री वेशधारी गोरखनाथ को साथ लेकर दरबार में पहुँची और महारानी का अभिवादन किया। रानी मैनाकिनी मछंदर नाथ के साथ रत्‍नजडि़त सिंहासन की शोभा बढ़ा रहीं थीं।

कलिंगा की सखियों ने साज बजाय और गोरखनाथ ने अपना मृदंग बजाना आरंभ किया। कलिंगा ने अपने मधुर कंठ से गाना शुरू किया जिससे सभी स्‍त्री सभा मोहित हो गई। फिर अपना गाना बंद कर नाचना प्रारंभ किया तो सभी स्त्रियों ने प्रशंसा की।

उसी समय कुछ महिलाओं का मृदंग की थाप की तरफ ध्‍यान गया जो बड़ा ही अद्भुत था। उस मृदंग की आवाज सुन महारानी भी बौरानी सी हो गई।


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परंतु मछंदर नाथ (मच्छिंद्रनाथ) बेचैन होने लगे। मृदंग की ध्‍वनि से उन्‍हें विशेष बोध मिल रहा था कि – चेत मछेन्द्र गोरखनाथ आया। धीरे-धीरे यही शब्‍द और साफ होने लगे।

अब योगी की व्‍याकुलता और बढ़ने लगी और उनका सिंहासन पर बैठना मुश्किल होने लगा। उन्‍हें अधिक बेचैन देखकर महारानी ने पूछा कि मुझे ऐसा लगता है कि आपको नृत्‍य में रूचि नहीं है।

इस पर मछंदर नाथ बोले कि मुझे सचेत किया जा रहा है। रानी ने पूछा कि वह कैसे? तो योगीराज ने कहा कि नहीं समझीं?

तो अब समझने का प्रयत्‍न करो। जरा गौर से सुनो कि इस मृदंग से क्‍या आवाज आ रही है? आगे मछेन्द्रनाथ कहते हैं कि इस मृदंग की ध्‍वनि यह कह रही है कि देख मछेन्द्र गोरख आया।

अगर चित लगाकर सोचोगे तो समझ में आ जाएगा। गोरखनाथ ने ध्‍वनि को और साफ बजाया तो रानी मैनाकिनी भी बोल उठीं कि शब्‍द तो कुछ इसी प्रकार के हैं।



मछंदर नाथ (मच्छिंद्रनाथ) ने कहा कि गोरखनाथ आ गया है यहां और अब मुझे उसके साथ ही जाना होगा। इसके बारे में मैं हनुमान जी द्वारा पहले की सचेत कर दी गई थी। अब सब कुछ स्‍पष्‍ट हो चुका था। गोरखनाथ को हटाकर दूसरी स्‍त्री ने जब मृदंग बजाया तो वैसा न बजा पायी जैसा कि गोरखनाथ बजा रहे थे।

पक्का करने के लिये रानी ने फिर से गुरू गोरखनाथ को मृदंग बजाने को कहा और फिर से वही ध्‍वनि आने लगी। अब रानी को पक्‍का यकीन हो गया था कि यह गोरखनाथ ही है।

रानी ने यह भांप कर तुरंत ही सभा को समाप्‍त कर दिया। कलिंगा को पुरूस्‍कार देकर विदा कर दिया गया तथा गोरखनाथ को वहीं रुकने का आदेश दिया।

यह सुन कलिंगा ने कहा कि हे महारानी मैनाकिनी, इसे न रोकिये। इसके बिना हमारा व्‍यापार और धन्‍धा ही बन्‍द हो जाएगा।

यह सुन रानी मैनाकिनी ने कहा कि राज्‍य के नियमों को तो तू अच्‍छे से जानती ही है। राज्य के नियमों के अनुसार तो तुझे दण्‍ड ही मिलना चाहिये। फिर भी हम तुझे सकुशल छोड़ रहे हैं। लेकिन यह बात जान ले कि यह योगी यहां से नहीं जा सकता।



महारानी की बातें सुनकर कलिंगा अपनी सखियों सहित वहां से चल पड़ी। कलिंगा सोचने लगी कि ऐसा दुर्लभ व्‍यक्ति मिलना बहुत कठिन है।

संसार में भला कौन ऐसा व्‍यक्ति होगा जो बस दो रोटियों में ही दिनभर काम कर सके। पर कलिंगा ने सोचा कि ईश्‍वर की इच्‍छा के आगे मनुष्‍य कुछ नहीं कर सकता। इस प्रकार उसने परमात्‍मा को धन्‍यवाद दिया और वहां से विदा हो गई।

गोरखनाथ पकड़े गये। रानी मैनाकिनी अपने निजी कक्ष में चलीं गयीं। रानी ने अपनी सेविकाओं को आदेश दिया कि उस स्‍त्री वेशधारी पुरूष को मेरे सामने लाओ।

गोरखनाथ के उस कक्ष में पहुँचने के बाद रानी ने उन्‍हें आसन दिया और कहा कि मैं आपका परिचय जानना चाहती हूँ। यह सुन गोरखनाथ ने अपनी योगवि़द्या से काया को पुन: पुरूष वेश में ढाल दिया और कहा कि मेरा नाम गोरखना‍थ है। मछंदर नाथ जी मेरे गुरू हैं।

इतना सुन रानी ने कहा कि चलो बेटा मैं तुम्‍हें तुम्‍हारे गुरू से तुम्‍हें मिला देती हूँ। अब रानी गोरखनाथ को अपने साथ लेकर मछंदर नाथ के कक्ष में ले गयीं।

Machander Nath Ki Kahani Bhag 10 || Baba Machander Nath Ki Katha


गोरखनाथ ने अपने गुरू को शीश नवाया और आदर सहित चरण स्‍पर्श किये। गोरखनाथ ने कहा कि आपका शिष्‍य गोरखनाथ आपको नमस्‍कार करता है।

गुरू मछेन्द्रनाथ ने अपने शिष्‍य को गले से लगाया और गोरखनाथ ने बारह वर्ष पूर्व सारा वृतान्‍त अपने गुरू मछंदर नाथ को सुनाया। तो यह सब सुनकर गोरखनाथ के गौरव की मछंदर नाथ ने प्रशंसा की।

अपने गुरू द्वारा प्रशंसा सुनकर गोरखनाथ कहते हैं कि गुरूजी मुझे जो भी विद्याएं मिली हैं वह सब आपके ही आशीर्वाद का फल है। यही मेरी हर जगह विजय मिलने का कारण है।

मछंदर नाथ चुपचाप अपने शिष्‍य की बातें सुन रहे थे। गुरू मछंदर नाथ (मच्छिंद्रनाथ) जी को चुप देखकर गोरखनाथ जी बोले कि गुरूजी आप भी तो एक अर्छारती योगी हैं। आपके इस त्रिया राज्‍य की स्त्रियों के साथ भोग-विलास करने से हमारे नाथ संप्रदाय का पतन हो रहा है।

गोरखनाथ की बातें सुन मछंदर नाथ जी बोले कि गोरखनाथ तुम उचित ही कहते हो। परंतु मेरी भी यहां रहने की विवशता है। तो यह सुन गोरखनाथ ने पूछा कि ऐसी कौनसी विवशता है गुरूजी? कृपया मुझे भी बताने का कष्‍ट करें।

इस पर मछेन्द्रनाथ जी बोले कि जब मैं तुम्‍हें आदेश देकर बद्रीनाथ की तीर्थ यात्रा को चल पड़ा तो रामेश्‍वर में मेरी मुलाकात पवन सुत हनुमान जी से हुई। उन्‍होंने मुझे यहां आने पर विवश कर दिया। उनकी आज्ञा से मुझे यहां पर रहते हुए बारह वर्ष बीत गए।

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यह सब सुन गोरखनाथ जी ने तुरंत कहा कि गुरूजी अब आप मेरे साथ चलिये। इस पर मछंदर नाथ जी बोले कि बेटा मुझे तुम्‍हारे साथ जाने में कोई भी आपत्ति नहीं है परंतु अपनी माता मैनाकिनी से तो आज्ञा ले लो।

इधर मैनाकिनी सोच में पड़ गयी कि यदि गोरखनाथ अपने गुरू को यहां से ले जाने में सफल हो गया तो मुझे बड़ी परेशानी होगी। कितना अच्‍छा हो यदि मैं भी इसे इन सुंदरियों के जाल में फंसा दूँ?

यही सब मन में सोच कर रानी मैनाकिनी ने गोरखनाथ को स्‍त्री जाल में फांसने के भरसक प्रयत्‍न किये पर वह सफल न हो सकीं।

मछेन्द्रनाथ के साथ रहने से रानी मैनाकिनी को एक पुत्र भी हुआ था जिसका नाम मौनीनाथ था। एक दिन मछंदर नाथ ने अपने पुत्र मौनीनाथ को स्‍नान करा लाने के लिये कहा तो उसने उसको अच्‍छी तरह धोबी की तरह सिला पर पीटना शुरू कर दिया और उसके लगभग पूरे शरीर को लगभग समाप्‍त ही कर दिया था। उसके शरीर का नक्‍शा लाकर छत पर सुखाने डाल दिया।

जैसे ही रानी और मछंदर नाथ Baba Machander Nath को यह बात पता चली तो उन्हें अपार दु:ख पहुँचा औरर रानी अत्‍यंत कष्‍ट में गोरखनाथ से बोलीं कि मुझे मेरा मौनीनाथ वापस चाहिये।



गोरखनाथ ने देखते ही देखते संजीवनी मंत्र की भस्‍मी को अभिमंत्रित कर मौनीनाथ की खाल पर छिड़क दिया जिससे देखते ही देखते एक जैसे 108 मौनीनाथ प्रकट हो गये। अब मैनाकिनी रानी बड़े ही असमंजस में पड़ गईं कि मेरा मौनीनाथ कौनसा है?

यह स्थिति भांपकर गोरखनाथ बोले कि माता जब आप अपनी ही चीज को पहचान पाने में असमर्थ हैं तो उसे अपनापन देने में क्‍या लाभ? यह कहकर गोरखनाथ ने अपनी माया को वापस बुला लिया और असली मौनीनाथ को रानी मैनाकिनी को सौंप दिया।

इस घटना के बाद से रानी, गोरखनाथ को सम्‍मान की दृष्टि से देखने लगीं और वे गोरखनाथ से बहुत प्रसन्‍न भी हुईं।

इस सब के बाद गोरखनाथ, रानी मैनाकिनी से बोले-

हे माता अब आप इतनी कृपा करें कि मुझे मेरे गुरू को वापिस ले जाने दें। उनके यहां रहने धर्म प्रचार में बहुत बड़ी बाधा आन पड़ी है। अब रानी की भी यह समझ में आ चुका था कि यह योगी अपने गुरू को साथ ले जाये बिना मानने वाला नहीं है।  

अब रानी ने सोच विचारकर कहा कि बेटा गोरखनाथ तुम एक वर्ष यहां रह जाओ फिर मैं तुम्‍हारे गुरू को हंसी-खुशी होकर विदा कर दूँगी। पर गोरखनाथ जी भी कहां मानने वाले थे।

उन्‍होंने कहा कि माताजी इस समय हमारे यहां रहने से हमारी सारी योजनायें धरी की धरी रह जायेंगी। परंतु एक बात यह भी है कि मैं आपको भी नाराज और दु:खी नहीं कर सकता। इसीलिये मैं 6 महीने तक यहां रूक जाऊँगा।

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अब गोरखनाथ की बातें सुन रानी मैनाकिनी संतुष्‍ट होकर अपने कमरे में चली गयीं। इधर गोरखनाथ ने अपने गुरू मछंदर नाथ को बताया कि गुरूजी अब यहां से चलने में कोई भी समस्या नहीं है।

मछेनद्रनाथ बोले कि बेटा तुमने जो कुछ भी किया वह सब मेरी इच्‍छा के अनुसार ही किया इसीलिये तुम मेरी प्रशंसा के पात्र हो।

एक-एक दिन करते-करते  वह दिन भी आ गया जब मछंदर नाथ Baba Machander Nath अपने शिष्‍य के साथ जा सकते थे। रानी की व्‍याकुलता बढ़ती जा रही थी।

वे बिचारी रोती जातीं और साथ के साथ उनकी विदाई का प्रबन्ध भी करती जाती थीं। रानी ने मछेन्द्रनाथ से पूँछा‍ कि मौनीनाथ आपके साथ जायेगा या यहीं रहेगा?

रानी ने कहा कि मेरे पिता उपरिक्ष बसु द्वारा आपकी अवधि में 6 महीने की देरी है। इसके बाद तो स्‍वर्गलोक जाना ही होगा। गोरखनाथ से एक वर्ष का समय मांगा था किन्‍तु 6 महीने का समय ही मिल पाया। ऐसी अवस्था में तो मौनीनाथ अकेला ही रह जायेगा।

आपकी मौजूदगी में तो इस पर हनुमान जी का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है किंतु यह अकेला उस प्रभाव को रोक नहीं पायेगा। अत: यही बेहतर होगा कि आप मौनीनाथ को अपने साथ ले जायें।

यह सुन मछंदर नाथ Baba Machander Nath ने कहा कि ठीक है मौनी, तुम अब हमारे साथ ही चलो। चलते समय रानी ने मछेन्द्रनाथ की झोली में एक सोने की ईंट रख दी। ईंट के अलावा वस्‍त्रादि रखकर उन्‍हें अच्‍छे से समझा दिया।


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जब वे जाने को तैयार हुए तो रानी मैनाकिनी ने अपने पुत्र मौनीनाथ को गोद में बैठाकर, पुचकारकर खूब प्‍यार किया। रानी की आंखों से आंसू की धारा बह निकली। बहती हुई आंखों से रानी ने पिता और पुत्र को विदाई दी।

तीनों नाथ (गोरखनाथ, मछंदर नाथ और मौनीनाथ) साधू रूप में महल से बाहर निकले और तभी त्रिया राज्‍य की सभी अभूतपूर्व सुंदरियों ने उन्हें विदाई दी। जैसे ही वे तीनों आंखों से ओझल होने लगे तभी वे सुंदरियां अपने अपने महल की ओर लौट चलीं।

तीनों सन्‍त यज्ञ और भण्‍डारे करते हुए महेन्‍द्रगिरि पर्वत पर तपस्‍या करने लगे। गोरखना अपने गुरू मछंदर नाथ (मछंदर नाथ) से आज्ञा लेकर गिरनार पर्वत पर जा पहुँचे थे।

यह परम योगी दतात्रेय जी का स्‍थान था। इस प्रकार 6 महीने बीत जाने के बाद उपरिक्ष बसु मैनाकिनी को लेने आये और उसे बोध करवाया कि इस संसार में जो भी तुम्‍हें दिखाई देता है वह सब नाशवान है।

तुम जहां से निकाली गईं थी अब वहीं चलकर सुख भोगो। अब मैं तुम्‍हें बारह वर्ष पश्‍चात मछंदर नाथ (मछंदर नाथ) से मिलवाऊँगा जिनके साथ गोरखनाथ और तुम्‍हारा पुत्र मौनीनाथ भी होंगे। यदि तुम यह सोच रही हो कि यह कैसे संभव होगा तो तुम्‍हारी समस्‍या का निवारण करता हूँ।

स्‍वर्ग का राजा इन्‍द्र, संगल द्वीप पर एक बड़ा यज्ञ करेगा। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश भगवान के साथ-साथ नौ नाथ भी पधारेंगे। अब तुम अपना पिछला दु:ख भूलो और स्‍वर्ग लोक को चलो रानी।

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इस पर रानी ने कहा कि चाहे स्‍वर्ग लोक के राजा इंद्र का यज्ञ हो या न हो, आप मुझे एक बार मछंदर नाथ (मछंदर नाथ) से मिलवाने का वायदा करें।

ऐसा करने पर ही मेरा मन शान्‍त होगा। तब रानी के सिर पर हाथ रखकर वचन दिया और रानी मैनाकिनी ने सन्‍तोष कर अपनी दासी दर्भासा को राजभार सौंप कर उसे राजगद्दी पर बैठाया और स्वयं विमान में बैठकर स्‍वर्ग जाने को तैयार हो गईं।

रानी के चले जाने से त्रिया राज्‍य की सभी सुंदरियों को गहरा दु:ख पहुँचा। रानी ने सभी को धीरज रखने को कहा कि आज से दुर्भासा तुम्‍हारी महारानी होगी और यही अब से तुम्‍हारी रक्षा करेगी।

तुम सब इसको पूर्ण सहयोग देना। यह सब समझा कर महारानी मैनाकिनी का विमान चल पड़ा और वह शाप से मुक्‍त होकर स्‍वर्ग का सुख भोगने को चल दीं।


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