Machander Nath Ki Kahani Bhag 11 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 11 || Machander Nath Ki Katha Bhag 11 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 11

Please follow and like us:
0
20
Pin Share20

Machander Nath Ki Kahani Bhag 11 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 11 || Machander Nath Ki Katha Bhag 11 || मछंदर नाथ की कथा भाग 11

Machander Nath Ki Kahani Bhag 11 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 11 || Machander Nath Ki Katha Bhag 11 || मछंदर नाथ की कथा भाग 11

Machander Nath Ki Kahani


प्रिय मित्रों, अब तक आपने गोरखनाथ की अलौकिक लीला के बारे में जान लिया है। गोरखनाथ सफलतापूर्वक अपने गुरू मछंदर नाथ को त्रिया राज्‍य के भोग-विलास से मुक्‍त कराने में सफल होते हैं। किंतु भाग-9 में हमने कणिफानाथ और उनके गुरू जालन्‍धरनाथ के बारे में संक्षिप्‍त रूप से चर्चा की थी। आइये अब उनके बारे में भी कुछ जान लेते हैं।

कुरू वंश में जन्मेजय राज्‍य के सातवें राजा बृहद्रथ ने हस्तिनापुर में राज्‍य करते समय सोम यज्ञ प्रारंभ किया। उसने पहले तो शिवजी की अग्नि में मदन को जलवाया इसके बाद स्‍वयं अग्नि के अंदर जा घुसा। ऐसा करते ही अंतरिक्ष नारायण ने संचार कर अग्नि कुण्‍ड में डाला।

पूर्णाहुति के पश्‍चात यज्ञ कुण्‍ड की रक्षा हेतु ब्राह्मणों ने हाथ डाला तभी उनके हाथ वह बालक लगा। जैसे ही रोने का स्‍वर सुनाई दिया पुरोहित जी ने राजा को बच्‍चे के बारे में सूचित किया।

बच्‍चे को देखते ही राजा का अत्‍यधिक संतोष की प्राप्ति हुई। उस बच्‍चे को हाथ में लेकर राजा ने कहा कि यह बच्‍चा साक्षात मदन का अवतार है। यह कहते ही राजा उस बालक को लेकर अंत:पुर में अपनी रानी के पास ले गये।

बालक अत्‍यंत ही सुंदर था। वह बिल्‍कुल देवताओं के समान प्रतीत होता था। ऐसा मालूम होता था‍ जैसे मानो कुरू वंश को तारने के लिये स्‍वयं भगवान ने अवतार लिया हो।

Also Read –


Butterfly Jet Elite Mixer Grinder, 750W, 4 Jars 

रानी ने कुछ सोचकर राजा से पूछा कि यह बालक किसका पुत्र है? यह सुनते ही राजा बोले कि यह बालक तो अग्निदेव का प्रसाद है। यह सुनते ही रानी बहुत प्रसन्‍न हुईं और उस बालक को उन्होंने स्‍तनपान करवाया।

प्रभु की कृपा भी ऐसी हुई कि उनके स्‍तनों में दुग्‍ध आने लगा। इस सब के बाद बालक का बड़ा भारी उत्‍सव मनाया गया और फिर नामकरण संस्‍कार का समय आया।

बालक का नाम जालन्‍धर रखा गया। बड़े ही लाड़-प्‍यार से बालक को उन्‍होंने पाला और बड़ा किया। इसी प्रकार धीरे-धीरे समय गुजरता गया और सोलह संस्‍कार भी हो गये।

एक दिन राजा, रानी से सलाह मशविरा करने के बाद प्रधान जी के साथ जालन्‍धर नाथ के लिये कन्‍या ढूँढने जाते हैं। जालन्धरनाथ ने जब प्रधान जी को राजसभा में न पाया तो वे अपनी माता के पास गये।

उन्‍होंने अपनी माता से पूछा कि माताजी आजकल प्रधान जी दिखाई नहीं दे रहे हैं। यह सुनकर माता मुस्‍कुराते हुए बोली कि तुम्‍हारे पिता ने नाई, प्रधान और पुरोहित को तुम्‍हारे लिये पत्‍नी लाने के लिये भेजा है।

परंतु जालंधर तो बहुत ही सीधे और सरल थे। उन्‍होंने अपनी माता से पूछा कि ये पत्‍नी क्या होती है? तब मां ने कहा कि मेरे जैसी स्‍त्री। तब यह सभी बातें सुनकर वे अपने मित्रों के साथ खेलने चले गये।

उन्‍होंने यही सवाल अपने मित्रों से भी किया कि यह पत्‍नी क्‍या चीज होती है? मित्रों, यदि आप सभी इस प्रश्‍न का उत्‍तर जानते हो तो कृपया मुझे बताइये।

Imagimake Mapology India with State Capitals – Educational Toy and Learning Aid for Boys and Girls

Baba Machander Nath Ki Katha || Baba Machindra Nath || Machander Nath Ki Kahani || Machindranath Story In Hindi || Machander Nath Ki Kahani Bhag 11


मित्रों की जालन्‍धरनाथ की बातों और सरल स्‍वभाव पर बड़ा ही आश्‍चर्य हुआ और यह समझकर उन्‍होंने अपने मित्र जालन्‍धरनाथ को सब कुछ विस्‍तार से समझाया। मित्रों ने सब कुछ खुलकर समझा दिया।

यह सब सुनकर जालन्‍धरनाथ सोचने लगे कि यह संसार कितना गया गुजरा है। जो उत्‍पन्‍न होने का स्‍थान है उसी को भोगने में मुझे प्रवृत्‍त नहीं होना चाहिये। इस प्रकार सोचकर वे जंगल की ओर चल दिये।

जैसे गांव के सीमा रक्षकों ने राजकुमार को जाते देखा तो उन्‍होंने यह सूचना जाकर राजा को दे दी। राजा ने अपने पुत्र की बहुत तलाश की पर वह उन्‍हें न ढूँढ सके। राजा बहुत दुखी हुए।

उधर वन में जब जालन्‍धर ना‍थ जा रहे थे तभी अग्नि उनके पास चलकर आयी क्योंकि वे अग्नि के भी पुत्र थे। अग्नि ने अपने पुत्र को पहचान कर एक सुरक्षित स्‍थान पर लाकर रखा।

अग्नि ने पूछा कि बेटा तुम किस कारण से इस वन में घूम रहे हो? इस प्रकार अग्नि ने अपने आप को प्रकट कर बालक को अपने सीने से लगाया और गोद में बिठाकर पूछा बेटा यहां आने का क्या कारण है?

यह देख जालन्‍धरनाथ ने पूछा कि मेरा भेद जानने वाली आप कौन हो? पहले अपना परिचय तो दीजिये। तब अग्नि ने कहा कि बेटा मैं तुम्‍हारी माता हूँ और मुझे अग्नि कहते हैं। यह सुन जालन्‍धरनाथ ने पूछा कि आप मेरी माता कैसे हुई?

अग्नि ने जालन्‍धरनाथ को उनके जन्‍म की सारी कथा सुनाई। यह कहकर अग्नि ने पूछा कि अब तेरे मन में क्‍या चल रहा है पुत्र? यह सुन जालन्‍धर नाथ ने कहा कि माता आपसे भला क्‍या छुपा है, आप तो सब जानती ही हैं। फिर भी मैं आपको बताये देता हूँ।

Also Read –


Boldfit Skipping Rope for Men, Women & Children – Jump Rope for Exercise Workout & Weight Loss

मुझे यह दुर्लभ मानव शरीर मिला है। कुछ ऐसा उपाय होना चाहिये कि इससे कल्‍याण हो अन्‍यथा जन्‍म धारण करने से कोई लाभ नहीं। मैं चाहता हूँ कि मेरा यश त्रिभुवन में फैले और मैं अमर हो जाऊं।

अपने बेटे की अपूर्व इच्‍छा देख अग्नि को बड़ा आनन्‍द आया। अग्नि ने खुद उसकी प्रशंसा की और सबसे अधिक प्रबल होने के लिये उन्‍हें भगवान दतात्रेय के पास ले गयीं।

 दोनों की भेंट बड़े सत्कार से हुई। भगवान दतात्रेय ने अग्नि से पूछा आप का यहां आने का कारण क्‍या है? और यह बालक कौन है? यह सुन अग्नि ने सारी कथा दतात्रेय जी को सुनाई।

वह बोलीं कि मैंने शंकर जी के शरीर से कामदेव को भस्‍म किया था उसे मैंने अब तक पेट में रक्षण कर रखा है और बृहश्रवा राजा के यज्ञ कुण्‍ड से इस जालन्‍धर की उत्‍पत्ति हुई है।

अग्निदेव बोले कि अब इसे मैं आपके चरणों में अर्पण करने के वास्ते आया हूँ। अब से आप इसकी रक्षा करें और इसे चिरंजीवी होने का वरदान दें। सब कुछ सुनकर दतात्रेय जी बोले कि मैं आपकी मनोकामना अवश्‍य पूर्ण करूँगा परन्‍तु इस बालक को यहां बारह वर्षों तक रहना होगा।

जब अग्नि देव ने प्रस्‍थान किया तो दतात्रेय भगवान ने बालक जालन्‍धरनाथ के सिर पर हाथ रखा और गोद में बिठाकर अज्ञान को दूर किया।

इस प्रकार बालक जालन्‍धरनाथ की अज्ञानता दूर हुई। दतात्रेय भगवान बालक को अपने साथ भागीरथी नदी पर स्‍नान करवाने के लिये ले गये। यहां स्‍नान ध्‍यान करने के बाद विश्‍वनाथ दर्शन कोल्‍हापुर और पांचालेश्‍वर में भोजन किया करते थे।

Also Read –


इस प्रकार बालक जालन्‍धर बारह वर्षों तक दतात्रेय जी के साथ रहकर शास्‍त्र विद्या में पारंगत हो गये। पूर्ण रूप से पारंगत होने के बाद दतात्रेय जी ने देवताओं की आराधना करवाई। इस प्रकार सभी देवता गण बालक को आशीर्वाद देने धरती पर उतर आये।

अग्नि देव भी आये थे और अपने पुत्र को सभी विद्याओं में निपुण देखकर उनका हृदय आनन्‍द से भर गया।

अब सभी देवताओं को प्रसन्‍न कर और भुजा भेंट कर प्रार्थना की कि इसे वरदान देकर कृतार्थ करो। यह सुनते ही अग्निदेव ने अपने पुत्र को कंधे पर बैठाया और सभी देवताओं के बारी-बारी दर्शन करवाए।

सभी देवताओं ने जालन्‍धरनाथ को भी वरदान दिये। जालन्‍धर नाथ ने बारह वर्षों तक बद्रिकाश्रम जाकर तपस्‍या की। जब वे कसौटी पर खरे उतरे तो सभी देवताओं ने उनकी प्रशंसा की और उचित वरदान दिये।

बद्रीकाश्रम में बद्रीनाथ ने अग्नि व जालन्‍धरनाथ को तीन रात्रि तक अपने पास ही रखा। उसी समय एक घटना घटी जो शिवजी ने सुनाई थी जो कि इस प्रकार है।

ब्रह्माजी की पुत्री सरस्वती जब बारह वर्षों की हुई तो उसका रंग रूप देखकर वे कामवश विहल उठे और भ्रष्‍टाचार करने पर उतारू हो गये। वे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगे।

उनके पीछे भागने से वीर्यपात हो गया और फिर तेज हवा चलने के कारण वीर्य बिन्दु हिमालय के वन में एक हाथी के कान में पड़ा जिससे प्रबुद्ध नारायण ने संचार किया।

Guru Machander Nath Ki Katha || गुरू मछंदर नाथ की कथा || Baba Machander Nath Ki Kahani || Machander Nath Ki Kahani Bhag 11


स बात को अधिक समय बीत जाने पर वह हाथी भी जीवित रहा और उसके कान से प्रबुद्ध नारायण का अवतार हुआ जिसे जालन्‍धर नाथ ने अपना शिष्‍य बनाया।

यह सुन अग्नि देव बोले कि आपकी बात तो बड़े ही आश्‍चर्य की है परंतु यह भी तो बताइये कि उस हाथी का क्‍या हुआ? यदि वह जिन्‍दा है तो हम उसके दर्शन भी करवाइये। अग्नि देव के कहने पर दोनों को शिवजी हिमालय के वन में ले गए। वहां उन्‍हें एक पर्वत पर खड़ा बड़ा हाथी दिखाई दिया।

उस हाथी को देख उन्होंने सोचा कि जब यह हाथी उधम करेगा तो किस प्रकार वश में किया जायेगा? यह सुनकर जालन्‍धर नाथ ने हिम्‍मत करके कहा कि मेरे सिर पर भगवान दतात्रेय जी का हाथ है अत: मैं अभी आपको इसका चमत्‍कार दिखाता हूँ।

जालन्‍धरनाथ ने ऐसा कह हाथ में भस्मी ली और मोहनी अस्‍त्र का मंत्र पढ़कर स्‍पर्शास्‍त्र की भस्‍म का प्रयोग किया और  वह हाथी शान्‍त हो गया।

इसके बाद जालन्‍धर नाथ अकेले ही कणिफानाथ को लाने के लिये उस हाथी के समीप गये और हाथी को कहा कि तेरे जैसा धैर्यवान होना अति दुर्लभ है। तेरे कान में दिव्‍य रत्‍नों का निर्माण हुआ है।

इतना कह कणिफानाथ से बोले हे सामर्थ्‍यवान प्रबृद्ध नारायण, तेरा हाथी के कान से निर्माण हुआ है। यही कारण है कि मैंने तेरा नाम कणिफानाथ रखा है। अब तुम शीघ्र अतिशीघ्र बाहर आ जाओ।

Also Read –


इतना सुन हाथी के कान से पास आकर कणिफानाथ बोले –

हे गुरूदेव, आपको नमस्‍कार है। अब जालन्‍धर नाथ ने हाथी के कान के पास जाकर वह सोलह साल की संजीव मूर्ति अपने तेजस्‍वी हाथों से हाथी के कान से बाहर निकली।

उसे अपने कंधे पर बिठाकर अग्नि व शंकर को नमस्‍कार किया। अब जालन्‍धर नाथ ने शिवजी से प्रार्थना की कि आपके उपदेश दिये बिना इसकी अज्ञानता दूर नहीं हो सकती।

यह सुनकर शिवजी ने कणिफाना‍थ के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। जालन्‍धरनाथ ने भी एक गुरू होने के दर्जे से कणिफानाथ के कान में मन्‍त्र फूँका। इससे कणिफानाथ का अज्ञान दूर हुआ।

अब चारों (अग्निदेव, शिवजी, जालन्‍धरनाथ और कणिफानाथ) बद्रिकाश्रम गये। वहां पहुंचकर चारों ने भगवान दतात्रेय जी को नमस्‍कार किया। दतात्रेय जी ने जालन्‍धरनाथ से कहा कि अब जो ज्ञान तुम्‍हें तुम्हारे गुरूओं से प्राप्‍त हुआ है उसी प्रकार तुम भी अब एक गुरू होने के नाते वह ज्ञान अपने शिष्‍य कणिफानाथ को दो।

अग्निदेव ने कहा कि बात तो एकदम सही है। और इतना कह वे लुप्‍त हो गये। अगले 6 महीने तक शंकर जी समय-समय पर उनसे मिलते रहे और इस दौरान कणिफानाथ काफी विद्याएं सीख गया था।

परंतु वाताकर्षण और संजीवनी विद्या किसी कारणवश नहीं सिखाई गयी तो शिवजी ने जालन्‍धरनाथ से कहा कि कणिफानाथ से देवताओं से विद्याओं की सिद्धि का वरदान दिलवाओ।


यह सुन जालन्‍धरनाथ ने कहा कि कणिफानाथ विद्याऐं सीख चुका है। अब आप इसे वरदान देने की कृपा करें। यह सुन देवता बोले –

तुम्‍हें दतात्रेय जी ने विद्याएं सिखाईं और अग्निदेव ने प्रार्थना की इसी कारणवश हमने तुम्हें वरदान दिये हैं। बार-बार हर किसी को वरदान नहीं दिये जाते हैं। यह कहते ही देवता अपने-अपने विमानों में बैठकर वापस जाने लगे।

यह देखते ही जालंधरनाथ को बहुत गुस्‍सा आया और वे बोले-

आप मेरा अनादर करके जाना चाहते हैं। अभी आपने मेरे प्रताप को जाना नहीं है। मैं अभी आप सभी को दिखाता हूँ। इतना कह उन्‍होंने वातास्‍त्र की योजना बनाई।

ऐसा करते ही बड़ा भारी तूफान आया और देवताओं के विमान उलट-पुलट होने लगे। देवताओं ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अपने-अपने अस्‍त्र–शस्‍त्र छोड़े परंतु जालंधरनाथ ने सभी को असफल कर दिया।

विष्‍णु भगवान और महादेव जी दूर खड़े होकर बस देख ही रहे थे। देवताओं का हाल अब ऐसा हो चुका था कि वे जो भी उपाय करते वह व्‍यर्थ ही जाता। देवता क्रोधित होकर नीचे उतरने लगे।

अवसर देखते ही जालन्‍धरनाथ ने कामनी अस्‍त्र छोड़ा जिसके प्रभाव से अनेकों सुन्‍दर कामनियों का निर्माण हो गया। उन सभी कामनियों के कटाक्ष बाणों से देवता घायल होने लगे।

देवताओं की मानसिक स्थिति ऐसी हो चली कि वे कामनियों के पीछे-पीछे भागते जाते और प्रार्थना करते जाते। वे सुन्‍दरियां बैरों के जंगलों की ओर भागने लगीं और पेड़ों पर चढ़ने लगीं। देवता भी यही करने लगे और उनके पीछे-पीछे पेड़ों पर चढ़ने लगे।

Also Read –


अब योगी जालंधरनाथ ने स्पर्शास्‍त्र मंत्र बोल कर भस्‍मी को फेंका जिससे देवता पेड़ों से चिपक गये। इधर यह सब दृश्‍य देखकर भगवान नारायण विष्‍णु और महादेव जी हँसने लगे।

उन सभी कामनियों ने देवताओं के वस्‍त्र फाड़ डाले और उन्हें नग्‍न कर दिया। यह सब देखकर जालन्‍धरनाथ ने कणिफानाथ को कुछ इशारा किया और कणिफानाथ को यह इशारा समझने में जरा भी देर नहीं लगी।

कणिफानाथ ने सभी देवताओं को वस्‍त्र पहनाये। सभी देवता अपनी हालत पर पश्‍चाताप करने लगे और तभी कणिफानाथ ने उन देवताओं से कहा कि मैं आप सभी देवताओं को अपने गुरू की बिना आज्ञा के वस्‍त्र पहना रहा हूँ।

अत: आशा करता हूँ कि आप गुरू जी से यह बात नहीं कहेंगे। सभी देवताओं को वस्‍त्र पहनाकर उन्‍होंने देवताओं को प्रणाम किया।

अब देवताओं ने उन्हें वरदान दिया और साथ ही साथ यह वचन भी दिया कि हम सभी देव तुम्‍हारे साथ ही रहेंगे। इस सब घटना के बाद जालन्‍धरनाथ ने विभक्‍त अस्‍त्र छोड़ा जिसके प्रभाव से सभी चिपके हुए देवताओं को उस बंधन से मुक्ति मिल सकी।

इस प्रकार कणिफानाथ को देवताओं से वरदान प्राप्‍त हुए। जब जालन्‍धरनाथ ने कहा कि आगे चलकर मैं सावरी मंत्र विद्या रचूँगा तो आप सभी देवगण मेरी सहायता करेंगे तो सभी देवताओं ने उन्‍हें इस कार्यसिद्धि के लिये वचन दिया और अंत में देवता विदा हो सके।

भगवान विष्णु और महादेव जी, जालन्‍धरनाथ और कणिफानाथ को ले‍कर बद्रिकाश्रम चले गये और वहां पर तीन दिनों तक ठहरे।


Tags:

Machander Nath Ki Kahani Bhag 11

Baba Machander Nath Ki Katha

Baba Machindra Nath

Machander Nath Ki Kahani

Machindranath Story In Hindi


आपको यह कहानी कैैैैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेेेेेेेेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

इस कहानी को ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयर करें बाबा के सभी भक्‍तों के साथ।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

Please follow and like us:
0
20
Pin Share20

Add a Comment

Your email address will not be published.