Machander Nath Ki Kahani Bhag 12 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 12 || Machander Nath Ki Katha Bhag 12 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 12

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 12 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 12 || Machander Nath Ki Katha Bhag 12 || मछंदर नाथ की कथा भाग 12

Machander Nath Ki Kahani Bhag 12 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 12 || Machander Nath Ki Katha Bhag 12 || मछंदर नाथ की कथा भाग 12

Machander Nath Ki Kahani


भगवान विष्‍णु और महादेव जी ने जालन्‍धरनाथ की शक्ति की सराहना की। शिवजी ने जालन्‍धर नाथ से कहा कि अब आप नागपत्र अश्‍वरथामा की जगह जाकर यज्ञ करो। वहीं पर तुम्‍हें देवताओं द्वारा सावर मंत्र विद्या का वरदान मिलेगा।

वेद विद्या में तादाद मंत्र उपस्थित हैं अत: कविता सिद्ध करवा दो और सारी विद्या कणिफानाथ को सिखा दो। यह आपका शिष्‍य भले ही अहंकारी प्रवृत्ति का है परंतु यह अपने हजारों शिष्‍य बनायेगा और इसीलिये आपकी विद्याएं इसके काम आयेंगी।

चूँकि संसार को समझने में बड़ी कठिनाई आयी है इसीलिये नौ नाथों ने मिलकर करोड़ों मंत्रों की कविता में रचना की है ताकि जनता का कुछ भला हो सके। सभी को इसके सद्उपयोग का मौका मिलेगा। यह कार्य आपका सामान्य जनता के लिये अत्‍यंत हितकारी होगा।

आप सर्वज्ञ हो। आपको समझाना आवश्‍यक नहीं है। जीवन-मरण, उच्‍चाट आदि पर भी आप कविता रचें और कणिफानाथ को तप करने के लिये भेज दें। ऐसा करने से आपका शिष्‍य सामर्थ्‍यवान बनेगा।

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महादेव के उपदेशों को जालन्‍धरनाथ ने अपनाया और अपने शिष्‍य के साथ मिलकर बीस लाख श्‍लोकों की कविता तैयार की। इस कविता को सुनकर शिवजी बहुत प्रसन्‍न हुए।

शिवजी ने उन्‍हें भाग्‍याखत्‍य पेड़ के नीचे प्रयोग सिद्ध करने को कहा। तब वे दोनों वहां आ गये और यज्ञों द्वारा प्रयोग सिद्ध किया।

सूर्य कुण्‍ड में जल लाकर 52 वीरों पर छिड़क दिया और उन्‍हें अपने अनुकूल बनाया। इसके उपरान्‍त दोनों बद्रिकाश्रम वापस आ गये और जालन्‍धरनाथ ने कणिफानाथ को तप करने की आज्ञा दे दी। जालन्‍धरनाथ भी किसी अन्‍य स्‍थान पर तप करने को चले गये।

उसी स्‍थान पर गोरखनाथ बाबा भी तप कर रहे थे पर दोनों ही एक-दूसरे की स्थिति से अनजान थे। जालन्‍धर नाथ यात्रा करते समय अपने सर पर एक घास का गठ्ठर रख कर घूमा करते थे। यह गठ्ठर उनके सिर पर एक-दो बालिस्‍त ऊँचा रहता था।

इसी प्रकार घूमते-घूमते वे गौड़ बंगाल की हेलापहन नगरी में जा पहुँचे । उस वक्‍त वह घास का गठ्ठर सिर से ऊँचा अधर में चल रहा था।

लोगों को उस गट्ठर को देखकर कौतूहल हुआ कि शायद कोई सिद्ध महात्‍मा आ पहुँचे हैं। जैसे-जैसे लोगों को यह सूचना मिली लोग उनके दर्शन को आते गये।


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वह गन्‍दे स्‍थान पर रहते थे और भिक्षा मांगकर खाते थे। उस नगर में राजा गोपीचन्‍द राज करता था। राजा की माता मैनावती बड़ी चतुर और सदाचारिणी नारी थीं।

वह एक दिन बड़े चौबारे पर खड़ी थीं और नगर का दृश्‍य देख रहीं थी। अचानक उनकी नजर जालन्‍धर पर पड़ी और यह देख मैनावती को बड़ा आश्‍चर्य हुआ। उन्हें यह समझते देर न लगी कि यह निश्चित ही कोई सिद्ध पुरूष हैं।

मैनावती सोचने लगीं कि इस महापुरूष को अपना गुरू बनाकर जीवन सफल बनाना चाहिये। इस प्रकार का निश्‍चय करके रानी ने दासी को आज्ञा दे दी कि तुम मेरा एक कार्य करो और किसी को भी इस संदर्भ में पता नहीं चलना चाहिये।  

तुम उस साधु के ठहरने के स्‍थान का पता करो और स्‍थान पता करने के बाद शीघ्र-अतिशीघ्र मुझे सूचित करो। उस दासी ने वैसा ही किया जैसा कि रानी मैनावती ने उसे करने को कहा था।

वह दासी उस साधू के ठहरने के स्‍थान पर गई और वहां से सीधा रानी के पास आकर उस जगह के बारे में सूचित कर दिया।

अब रानी मैनावती को जालन्‍धर नाथ के ठहरने के स्‍थान के बारे में भली-भांति पता चल गया था।

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