Machander Nath Ki Kahani Bhag 13 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 13 || Machander Nath Ki Katha Bhag 13 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 13

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 13 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 13 || Machander Nath Ki Katha Bhag 13 || मछंदर नाथ की कथा भाग 13

Machander Nath Ki Kahani Bhag 13 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 13 || Machander Nath Ki Katha Bhag 13 || मछंदर नाथ की कथा भाग 13

Machander Nath Ki Kahani


उस दिन आधी रात को राजा गोपीचन्‍द की मां अपनी दासी को साथ लेकर जालन्‍धरनाथ के स्‍थान पर पहुँची। योगी उस समय समाधि में लीन थे। राजा गोपीचन्‍द की मां भी उनके सामने विराजमान हो गयीं।

काफी समय के पश्‍चात जब योगी जी की समाधि टूटी तो उन्होने अपने सामने दो नारियों को बैठे  पाया।

योगी ने पूछा कि माता आप दोनों कौन हैं? आधी रात के समय मेरी धूनी पर आप के आने का क्‍या कारण है? तब रानी ने बताया कि मैं गोपीचन्‍द राजा की मां हूँ। इस समय तो मैं बस आपके दर्शन मात्र के लिये आई हूँ।

मैं एक विधवा हूँ इसी कारण सबके सामने नहीं निकलती हूँ। इसीलिये मुझे रात के समय यहां आपसे मिलना पड़ा। यह सुनकर योगीराज ने कहा कि आप जैसी नेक स्त्री को रात के समय भेंट नहीं करनी चाहिये। यह एक कलंक की निशानी है। यह संसार किसी पर भी झूठा दोष लगा सकता है।

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मैनावती ने यह सुन कहा कि आप तो ब्रह्मज्ञानी संत हैं। आपकी दृष्टि में नर-नारी में भेद क्‍यों? मैं जिस ज्ञान के उद्देश्‍य से यहां आयी हूँ उसे पूर्ण किये बिना तो नहीं जाऊँगी। यह सुनकर योगी ने कहा कि आप लोगों का भला तो इसी में है कि आप यहा से चली जाओ।

रानी ने कहा कि यदि आप के कर कमलों में हमारी मृत्‍यु भी हो जाए तो भी यह बहुत बड़े सौभाग्‍य की बात है। रानी का दृढ़ निश्‍चय देख कर योगी एक बार फिर से पूछा कि आप यहां किस कारण से आयी हैं?

यह सुन मैनावती बोली कि भक्‍त को अमृत की प्‍यास होती है। अब आप मुझे अमृतपान कराकर मेरी अज्ञानता को दूर करने की कृपा करें।

यह सुन योगी बोले कि फिलहाल तो तुम यहां से चली जाओ मैं बाद में तुम्‍हें अपनी शिष्‍या बनाकर अमृतपान करवाकर तुम्‍हारी अज्ञानता को दूर करूँगा।


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योगी की बातें सुनकर मैनावती ने अपना शीश झुका दिया और योगी को प्रणाम कर अपनी दासी के साथ अपने महल पहुँच गयीं। लेकिन एक दिन योगी अपनी तपस्‍या में लीन थे तो माता उनके सामने जाकर विराजमान हो गयीं।

तभी एक काला सर्प बहुत ही तेज रफ्तार से रानी के ऊपर चढ़ गया परंतु रानी ने कोई भी घबराहट नहीं दिखाई और न ही दासी के शोर का उन पर कोई असर ही हुआ।

सर्प देवता ने रानी को नहीं काटा और वे चले गये। इसी प्रकार रानी की कई सारी परीक्षाएं हुईं पर वे सभी परीक्षाओं में खरी उतरीं।

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अब जाकर जालन्‍धरनाथ ने उन्हें धर्मोपदेश देकर अपनी शिष्‍या बना लिया। योगी की कृपा से सारा जगत रानी को ब्रह्ममय दिखाई देने लगा। मैनावती के अज्ञान को दूर कर उन्हें अमरता का वरदान दिया। बड़ी ही प्रसन्‍न होकर रानी मैनावती अपने घर लौटीं।

वह अपने बेटे को विचारमग्‍न होकर देख रहीं थीं। जब रानी के बांदियों की आवाज रानी मैनावती के कानो में पड़ी तो अपने बेटे का गठीला बदन देखकर उन्‍हें अपने पति राजा त्रिलोचन चन्‍द की याद आ गयी जो कि युवावस्‍था में राजा गोपीचंद के ही समान दिखते थे।

यह सोचकर कि ऐसे ही काया मेरे पुत्र की हो जाएगी, वह रोने लगीं। जब राजा की निगाह एकदम ऊपर उठी तो माता को रोता देखकर वे अत्‍यंत दुखी हुए।

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