Machander Nath Ki Kahani Bhag 15 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 15 || Machander Nath Ki Katha Bhag 15 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 15

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 15 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 15 || Machander Nath Ki Katha Bhag 15 || मछंदर नाथ की कथा भाग 15

Machander Nath Ki Kahani Bhag 15 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 15 || Machander Nath Ki Katha Bhag 15 || मछंदर नाथ की कथा भाग 15

Machander Nath Ki Kahani


जालन्‍धरनाथ के कैद होने की खबर नगर में किसी को भी पता नहीं थी। सब की नजरों में बस यही था कि वे अब यह जगह छोड़कर अन्‍यत्र चले गये हैं। अपने गुरू के चले जाने की खबर जब राजमाता को पता चली तो वे बड़ी ही अधीर हुईं। अपने बेटे को अमरत्‍व दिलाने की अभिलाषा उनके मन में ही रह गयी।

इसी कारणवश वह बीमार हो गयीं। जब राजा गोपीचन्‍द ने अपनी माता के बीमार होने का कारण जानना चाहा तो राजमाता ने कहा कि मैं तो बस तुम्‍हें योगी से वरदान दिलवाना चाहती थी पर तूने तो उनका आर्शीवाद तक प्राप्‍त नहीं किया।

यह कह वह बोलीं कि बेटा डरो नहीं, मैं मरूँगी नहीं क्‍योंकि मुझे अपने गुरू से अमरत्‍व का वरदान मिला है। उन्‍हें ऐसा-वैसा मत समझना क्‍योंकि वह मुर्दे में भी जान डाल सकते हैं।

यह सुन गोपीचन्‍द बोले कि हे माता, ये घर-घर जाकर भिक्षा मांगने वाले योगी तुम जैसी भोली-भाली नारियों को अपने जाल में फंसा कर बुद्धि भ्रष्‍ट कर देते हैं।

यह सुन माता बोलीं कि वे ऐसे-वैसे सिद्ध पुरुष नहीं थे उन्‍हें तो परमात्‍मा का ही अवतार समझना चाहिये। उनही की दया दृष्टि है जो कि यह सारा संसार मुझे ब्रह्ममय दिखता है।

अपनी माता की बात भी राजा को नहीं भायी। वे सोचने लगे कि पटरानी का कहना ही सही है। अगर वह योगी होता तो अपनी मंत्र सिद्धि से पलभर में ही बाहर निकल आता परंतु बीमार अवस्‍था में भी माता का चेहरा चन्‍द्रमा के समान चमक रहा है और सत्‍य की चमक दमदमा रही है।

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अपने बेटे को सोच में डूबा देख माता कहती हैं कि बेटा अगर आगे से कोई भी योगी आये तो उनसे दीक्षा लेना मत भूलना। अब राजा धर्म संकट में पड़ गये कि क्‍या करें?

राजा सोचने लगे कि यदि पटरानी की बातें झूठी निकलीं तो मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो जाएगा। और तो और मुझे तो अपने द्वारा किये गये अपराध का भी ज्ञान नहीं है। इस प्रकार सोचकर वे बोले कि माता अगर कोई नामपंथी योगी इस राज्‍य में आयेगा तो मैं उनसे दीक्षा अवश्‍य लूँगा।

यह वचन अपनी माता को देने के बाद वे सीधे कणिफानाथ के पास पहुँचे। प्रधानमंत्री ने कणिफानाथ को रहने के लिये स्‍थान दिया और कणिफानाथ को रतनजडित सिंहासन पर विराजमान कर दिया। राजा ने तन-मन-धन से योगी की पूजा-अर्चना की।

जब राजमाता को कणिफानाथ के आने का पता चला तो वे अपनी शय्या से उठ कर राजभवन मे गई। वहां उनहोंने देखा कि कणिफानाथ सिंहासन पर विराजमान थे। जब कणिफानाथ का स्‍वागत-सत्‍कार हो गया तो राजमाता ने उन्‍हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

प्रार्थना कर राजमाता बोलीं कि मेरे अहोभाग्‍य जो आप इस नगरी में पधारे। अब से लगभग 12 वर्ष पूर्व यहां पर जालन्‍धरनाथ योगी महाराज पधारे थे। उनके सिर पर घास का गट्ठर अधर रहता था।। उन्‍होंने मेरी कई सारी परीक्षायें लीं किंतु अन्‍त में मुझे दीक्षा देकर अपनी शिष्‍या बनाया।


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उन्‍होंने मुझे सिर पर हाथ रखकर अमरत्‍व का वरदान भी दिया। जब से वे गये हैं मुझे उनके दर्शन भी नसीब नहीं हुए हैं।

यह सुन कणिफानाथ बोले कि आपने भी तो उनकी कोई सुध नहीं ली।

राजमाता बोलीं कि मेरी बात मन ही मन रह गयी। मैं तो बस अपने पुत्र को उनके चरणों में डालकर अमरत्‍व का वरदान दिलवाती।

यह सुनकर कणिफानाथ बोले कि हम दोनों के ही गुरू कणिफानाथ जी हैं। वे अब भी आपके राज्‍य की सीमा मे हैं। जब आपने गुरूजी की सुध न ली तो मैं भी उन्‍हें खोजता हुआ यहां आ पहुँचा। राजा गोपीचन्‍द भी योगी के समीप ही बैठे थे और उन दोनों की बातें सुनकर राजा का मुख पीला पड़ता जा रहा था।

राजमाता बोलीं कि यह तो मेरे समझ के बाहर की बात है कि योगी जालन्‍धरनाथ अभी भी इसी राज्‍य की सीमा में हैं। यह बात किसी को कैसे नहीं पता?

यह सुनकर कणिफानाथ बोले कि राजमाता आपके बेटे ने ही गुरू जी को छिपा रखा है। अगर मेरी बातों पर आपको यकीन न हो तो अपने पुत्र से ही पूछ लीजिये। पूरी जानकारी मिलने के बाद ही मैं यहां पर आया हूँ।

बाद में गोपीचन्‍द  की ओर देखकर कणिफानाथ बोले कि राजन अब तो बता दो कि हमारे गुरूदेव को कहां पर छिपा रखा है? राजा गोपीचन्‍द को अपनी चोरी पकड़े जाने का बहुत दुख हुआ। जब उनकी माता ने पूछा तो कुछ समय तो वह टालते रहे किंतु अंत में उनको सत्‍य बताना ही पड़ा।

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यह सत्‍य जानकर राजमाता बहुत दुखी हुईं और लज्जित होकर रोने लगीं। यह देखकर कणिफानाथ बोले कि राजमाता आप घबराइये नही क्‍योंकि मेरे गुरू ने तो हजारों व्‍यक्तियों को अमरता प्रदान की है। उनका अहित तो ब्रह्मा जी भी नहीं कर सकते।

वे जहां कहीं भी होंगे, अपना कार्य कर रहे होंगे। मैं शीघ्र ही उन्‍हें आपके सम्‍मुख प्रकट करूँगा। राजमाता ने कहा कि आप मेरे इस पापी पुत्र को क्षमादान कैसे दिलवाओगे?

कार्य तो आपके पुत्र ने ऐसा किया है कि इनका संपूर्ण राज-पाट नष्‍ट कर दिया जाये पर हम योगियों का यह कार्य नहीं है। परंतु गुरूजी को क्रोध अधिक है इसीलिये वे क्‍या कर बैठें मैं नहीं कह सकता। कणिफानाथ की बातें सुनकर राजमाता पुन: रोने लगीं।

वे बोलीं कि हे मेरे दयालु गुरू जी भाई, क्‍या आप कोई ऐसी व्‍यवस्‍था नहीं कर सकते हैं कि जिससे मेरा पुत्र जालन्‍धरनाथ के कोप का भागी बनने से बच जाए। अन्‍यथा इसकी 1200 रानियों और 1600 कन्‍याओं का क्‍या होगा?

राजमाता के नम्र स्‍वभाव होने के कारण कणिफानाथ ने वचन दिया कि आपके बेटे को बचाने का पूरा-पूरा प्रयास मैं करूँगा। कणिफानाथ ने राजा गोपीनाथ के आकार के पांच पुतले तैयार करवाए जो कि पांच अलग-अलग धातुओं (तांबा, पीतल, सोना, चांदी और लोहा) से बने थे।

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यह बुत ऐसे थे कि दूर से देखने पर राजा गोपीचन्‍द ही प्रतीत होते थे। इन पांचों पुतलों को वहीं रखवा दिया जहां जालंधरनाथ योगी कैद थे। फिर शुभ मुहूर्त देखकर कणिफानाथ राजा को लेकर उस स्‍थान पर पहुँचे। प्रथम सोने का पुतला गोपीचन्‍द ने रखवाया और हाथ में कुदाल लेकर गड्ढा खोदना शुरू कर दिया।

कणिफानाथ ने राजा को पहले ही समझा दिया था कि जैसे ही गुरू जी नाम पूछे तो तुम गोपीचन्‍द कहकर बाहर भाग जाना। उन्‍होंने चिरंजीवी नामक भस्‍म राजा के माथे पर लगा दी तब राजा पुतले के बीच में खड़ा हो गया और गड्ढा खोदना शुरू कर दिया।

कुछ समय बाद राजा को आवाज सुनाई दी कि इस गड्ढे को जो खोद रहा है वह अपना नाम बताये। योगी के प्रश्‍न पर राजा ने कहा कि मेरा नाम गोपीचन्‍द है। इतना कह राजा झट से बाहर भाग गये।

राजा का नाम सुनते ही योगी ने कहा-

गोपीचन्‍द तू भस्‍म हो जा। उनके मुँह से ये शब्‍द निकलते ही सोने का पुतला भस्‍म हो गया। यही प्रक्रिया कुल 4 बार चली और विभिन्‍न धातुओं के पुतले भस्‍म होते चले गये।

जब राजा फिर पांचवी बार गड्ढा खोदने लगे तो योगी जालंधर नाथ सोच में पड़ गये कि मेरे क्रोध से तो ब्रह्माण्‍ड नष्‍ट हो जाता है पर यह राजा गोपीचन्‍द अभी तक भस्‍म क्‍यों नहीं हुआ?

क्‍या इसे परमात्‍मा की ओर से कोई विशेष सहायता मिल रही है? छठी बार गड्ढा खोदने पर गड्ढा खाली हो गया और जालन्‍धरनाथ ऊपर की ओर देख भी न पाये कि कणिफानाथ आगे बढ़कर बोले कि गुरूजी की जय हो। यहां आपका शिष्‍य कणिफानाथ आ पहुँचा है।


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मैं बड़ी मुश्किल से पता लगा कर यहां आया हूँ। फिर अन्‍दर से आवाज आयी कि अब तुम गड्ढा खोदना बंद करो। और कणिफानाथ को आशीर्वाद देकर अन्‍दर से बाहर निकलने लगे। काफी समय होने के कारण उनके शरीर पर बड़े-बड़े घाव बन गये थे।

जालंधरनाथ ने शाकास्‍त्र का जाप किया और देखते ही देखते सारी मिट्टी शरीर से हट गई। उनके घाव भी भर गये। तब कणिफानाथ ने गड्ढे में कूदकर गुरू से गले मिलकर उन्‍हें बाहर निकाला। उन्‍होंने यागी को राजा गोपीचन्‍द को बचाने की बातें भी बतायीं।

तब राजा गोपीचन्‍द ने अपना मस्‍तक जालन्‍धरनाथ के चरणों में टेक दिया। तब जालन्‍धरनाथ ने अपने कदमों से राजा को उठाकर आशीर्वाद दिया। जालंधर नाथ बोले कि जब तक सूरज चांद रहेंगे तब तक तुम अमर रहोगे और सुख भोगोगे।

यह सुन राजमाता मैनावती बोलीं कि मैं 12 वर्षों से आपका इन्‍तजार कर रही थी। मैं हैरान थी कि आपने अपनी दया से मेरे पुत्र को इतना बड़ा अपराध क्षमा कर सुख भोगने का आशीर्वाद दिया। परंतु राज्य वैभव नाशवान है। यह सदा कायम रहने की वस्‍तु नहीं है। अत: मैं आपसे चाहती हूँ कि आप इसे योगी होने का वरदान दें।

यह कह वह गोपीचन्‍द से बोली कि बेटा जो मांगना है वह मांग ले। इनके समक्ष तो यमराज भी हाथ बांधे खड़े रहते हैं।

तब राजा गोपीचन्द हाथ जोड़कर बोले कि गुरूदेव मैं वह पदार्थ नहीं बनना चाहता जो कि अग्नि लगने से खत्‍म हो जाए। मुझे तो आप जैसा ज्ञानी होने का वरदान ही चाहिये।

इतना सुनते ही योगी जी ने राजा की पीठ थपथपाई और लंगोटी बंधवाई और कान फाड़ मुद्रा पहनाई। राजा को साधू का सारा सामान देकर नाथ पंथ में शामिल कर लिया। अब गोपीचन्‍द गुरू की आज्ञा का इन्‍तजार करने लगे।

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राजा के वैरागी होने का समाचार सारे नगर में फैल गया। जब अंत:पुर की रानियों को पता चला तो वे रोने-धोने लगीं। इधर योगीराज ने आज्ञा दी कि तुम पहले राजमहल में श्रंगीनाद बजाकर रानियों को माता कहकर भिक्षा मांगो और सबसे भिक्षा मांग कर तप करने वन में निकल जाओ।

उन्‍होंने कहा कि तुम योगी भरथरी के साथ रहो। अपने गुरू की आज्ञा मानकर राजा राजमहल में भिक्षा मांगने गये और रानी से माता कहकर भिक्षा मांगी। इस पर पटरानी रोते हुए बोलीं कि मैं तुम्‍हें क्‍या भिक्षा दूँ? मेरे आंसूओं का हार लेते जाओ।

क्‍या आप राजा जनक की तरह महल में रह कर ही योग नहीं निभा सकते? हमें कुछ नहीं चाहिये। हम तो बस आपके दर्शन करके ही जी लेंगे।

यह सुन गोपीचन्‍द बोले कि माता जी योग से कठिन भोग है। बिना योग के भोग भी नहीं हो सकता। योग और भोग दोनों में ही समाधि लगती है। क्‍या अमर विद्या प्राप्‍त हो जाने के बाद राज्‍य का त्‍याग करना आवश्‍यक है?

इस पर गोपीचन्‍द बोले कि हां माता,  अमर विद्या पालन करने के लिये राज्‍य त्‍यागना आवश्‍यक है। यह सुन रानी बोलीं कि अगर आप हम सबको त्‍यागने से सुखी हो सकते हो तो हमें त्‍याग ही दीजिये। हम अपने सीने पर पत्‍थर रख लेंगी परंतु आपको हानि न होने देंगी।

सच्‍ची नारियां अपने स्वामियों के लिये सदा से कुर्बान होती आयी हैं। परंतु वन में आपके साथ कौन हंसेगा और कौन बोलेगा? तो राजा ने उत्‍तर दिया कि श्रंगी कुबड़ी मेरे साथ बातें करेगी। धरती का बिछौना और आकाश मी चद्दर मेरी रक्षा करेंगी।

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फावड़ी मेरे साथ सोयेगी, कन्‍द मूल की मिठास ऋषि मुनि ही जान सकते हैं। कफनी फटने पर इंद्रियदमन कछोटा लगाऊँगा। सगुण निर्गुण श्रंगी कुबड़ी कभी छूटने वाली नहीं है। आगम निगम इकतारा पुखता हैं और मैं तन मन से लक्ष्‍य प्राप्‍त कर सुख से सोऊँगा।

काफी देर तक बातें करने के बाद 1200 रानियां और 1600 कन्‍याएं मोह में आकर गोपीचन्‍द को पकड़ने लगीं। योगी ने फावड़ी उनके मारने वास्‍ते उठायी तब उसी माता ने भोजन का थाल उठाकर अपने बेटे का भिक्षा दी और बोलीं-

मैं धन्‍य हूँ। बेटा आज भिक्षा देने के बाद तुझे तीन शिक्षाएं देती हूँ। उन्हें न भूलना। एक-एक शिक्षा की कीमत एक-एक लाल से ज्‍यादा है। यह सुन गोपीचन्‍द बोले कि माता जरूर शिक्षा दें। इसी कारण तो मैंने हीरे भरे खजाने का त्‍याग किया है।

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पहली शिक्षा-

बेटा हमेशा अपने किले के अन्‍दर ही रहना‍ जिससे शत्रु हमला न कर सकें। यह सुन गोपीचन्‍द बोले कि माता अब किला कहां है। तो माता ने कहा कि यह रहस्‍यवाद है। मेरी प्रथम शिक्षा ब्रह्मचर्य से बढ़कर कोई किला नहीं है। शोक, रोग, भय और व्याधा किसी का भी आक्रमण ब्रह्मचर्य पर नहीं हो सकता।

जो ब्रह्मचारी नहीं है वह न तो योगी बन सकता है, न संत और न ही  भक्‍त। बेटा योगी तो ज्ञानी भी बन सकता है। और ब्रह्मचर्य को तो योगी, ज्ञानी और भक्‍त तीनों ही प्रणाम करते हैं।

धन्य हो माताजी, मैं आपकी यह शिक्षा कभी नहीं भूलुंगा। अब आप दूसरी शिक्षा देने का कष्‍ट करें।

दूसरी शिक्षा-

बेटा तुम सदा मोहन भोग का भोजन करना चाहे एक मुट्ठी चने ही मिल जाएं तो अच्‍छा है। गोपीचन्‍द बोले कि मुझे तो यह भी रहस्‍यवाद मालूम होता है।

बेटा इसका अर्थ यह है कि चौबीस घण्‍टे में एक बार भोजन करना। माताजी आपके अनुभव का कोई जवाब नहीं। अब कृपा कर तीसरी शिक्षा भी देने का कष्‍ट करें।

तीसरी शिक्षा-

जब तुम्‍हें नींद सताये तो मसहरी पर सोना। इसका अर्थ यह है कि जब नींद सताये सिर्फ तभी सोना चाहिये बाकी समय में भक्ति और भजन करने चाहिये। आलस में पड़े रहना उचित नहीं है।

यह सुनकर गोपीचन्‍द ने कहा कि धन्‍य हो, माता हो तो ऐसी। पिंगला रानी ने अपने बुरे आचरण से अपने पति को योगी बना दिया। जबकि मैनावती ने अपने अच्‍छे आचरण से गोपीचन्‍द को योगी बना दिया।

इस संसार में भली बुरी दोनों प्रकार की नारियां हैं। अपनी माता मैनावती से भिक्षा और शिक्षा ले वह अपने गुरू के पास गये। अपना माथा नवाया। योगी ने पूछा कि बेटा, रानी से क्‍या भिक्षा मिली?

गोपीचन्‍द बोले कि रानी ने भिक्षा में यह शिक्षा दी कि दूसरे के उपकार के लिये अपने स्‍वार्थ का अवश्‍य बलिदान करना, अधिक भूख लगने पर ही भोजन करना और जब अधिक नींद सताये तभी सोना।


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जालन्‍धरनाथ बोले कि तुम्‍हें तीन अनमोल शिक्षाएं मिली हैं। अब अवश्‍य सिद्धि प्राप्‍त होंगी। तुम्‍हारी माता ने जो प्रवृत्ति मार्ग अपनाया है और जो निवृति मार्ग ग्रहण किया है ऐसी स्‍त्री मैंने संसार में पहली बार देखी है।

अब जालन्‍धरनाथ ने गोपीचन्‍द को बद्रिकाश्रम जाकर तप करने की आज्ञा दी। पटरानी के बेटे मुक्‍तचन्‍द को राजगद्दी सौंप दी और प्रधान सरदारों को उनकी योग्‍यता के अनुसार पुरस्कार दिये। अन्‍त:पुर की स्त्रियों को समझाया कि अब आप मुक्‍तचन्‍द को ही अपना सब कुछ समझें।

जालन्‍धरनाथ और कणिफानाथ कुल 6 महीने वहीं रहे और राज्‍यप्रबन्‍ध की व्‍यवस्‍था करते रहे।


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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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