Machander Nath Ki Kahani Bhag 16 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 16 || Machander Nath Ki Katha Bhag 16 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 16

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 16 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 16 || Machander Nath Ki Katha Bhag 16 || मछंदर नाथ की कथा भाग 16

Machander Nath Ki Kahani Bhag 16 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 16 || Machander Nath Ki Katha Bhag 16 || मछंदर नाथ की कथा भाग 16

Machander Nath Ki Kahani


राजा गोपीचन्‍द अपने गुरू की आज्ञानुसार बद्रिकाश्रम की ओर चल दिये। वह रास्‍ते में अपनी भूख मिटाने के लिये भिक्षा मांगते जाते थे। नगर में जो कोई भी गोपीचन्‍द को देखता वही आदर सम्‍मान करता। कुछ लोग तो उन्‍हें समझाने का प्रयत्‍न भी करते पर वे उनकी बातों पर ध्‍यान नहीं देते थे।

चलते-चलते गोपीचन्‍द गौड़ बंगाल की निरमा नगरी के कुएं पर जा पहुँचे। उस नगर में इनकी बहन चम्‍पावती और हुक्‍मचन्‍द राज्‍य करते थे। वे गोपीचन्‍द के समान ही धन संपन्‍न थे। पानी पिलाते समय उन्‍होंने गोपीचन्‍द को पहचान लिया और चम्‍पावती ने अपने घर वालों को गोपीचन्‍द के योगी होने का समाचार सुना दिया।

हुक्‍मचन्‍द अपनी पत्‍नी को डांटने लगे। वे कहने लगे कि उसके यहां आने से नगरी के लोग क्‍या कहेंगे? सब यही कहेंगे कि महाराजा का साला इधर-उधर भिक्षा मांगता फिर रहा है। तुम्‍हारा भाई मूर्ख है। वह एक क्षत्रिय के घर जन्‍म लेकर शूरवीर बनने के बजाय संत बन गया।

उसके ऐसा करने से धर्म का नाश तो हुआ ही साथ ही साथ कुल का नाश भी हो गया। अपने प‍ति और ससुराल वालों की बातें चम्‍पावी को पसंद न आयीं। जब घर के लोग ज्‍यादा भला-बुरा कहने लगे तो राजा हुक्‍मचंद ने कहा कि अब ऐसी बातें करने से कोई लाभ नहीं है।

वह हमारे द्वार पर आकर भिक्षा मांगे इससे तो अच्‍छा यही है कि घुड़साल में टिका कर खाना-पीना खिलाकर बाहर के बाहर ही विदा कर दिया जाये।

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इस प्रकार राजा ने अपनी दासी को भली-भांति समझा बुझा कर गोपीचन्‍द के पास भेजा कि आपकी भेंट आपकी बहन चम्‍पावती से करवाने के लिये राजा हुक्‍मचंद ने आपको बुलाया है। हुक्‍मचंद की योजना के अनुरूप ही गोपीचन्‍द को घुड़साल में टिका कर राजा-रानी को सूचित किया गया।

तब रानी ने थाल सजाकर भोजन भिजवाया। भोजन पहुँचाकर राजा ने कहा कि तुम अभी भोजन करो। तुम्‍हारी बहन अभी आती ही होगी।

यह सुनकर गोपीचन्‍द बोले कि अब मुझे मान-सम्‍मान से कोई मतलब नहीं है। मेरा न तो कोई शत्रु है और न ही कोई मित्र। अब तो मैं वैरागी हूँ। इसलिये भोजन को छोड़ना उचित नहीं।

राजा हुक्‍मचंद ने रानी चम्‍पावती को यह दिखाते हुए कहा‍ कि तुम्‍हारा भाई कितना बेशर्म है जो वहां घुड़साल में बैठा भोजन कर रहा है।

अपने पति के इस प्रकार के ताने सुनकर रानी चम्‍पावती ने आत्‍महत्‍या कर ली। जब गोपीचन्‍द ने दासी से पूछा कि यह सब क्‍या हो रहा है तो दासी ने बताया कि तुम्‍हारी बहन ने छत से कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली है।

दासी की बात सुनकर गोपीचन्‍द ने कहा कि मुझे यहां नहीं आना चाहिये था क्‍योंकि अब मेरे यहां आने से बड़ा भारी कलंक लग गया है। अब समाधि लगाकर इसे जीवित करना परम आवश्‍यक है।

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ऐसा विचार कर उन्‍होंने अपने बहनोई गोपीचन्‍द से कहा कि अब अपने गुरूदेव को बुलाना होगा। अब आप चार रोज यहां ठहर जायें। शव का बांया हाथ काटकर रख लिया। गोपीचन्‍द वापस हेलापट्टन गये और अपने गुरू को बुला लाये। इधर चम्‍पावती के शव को जला दिया गया था।

जब गुरू और चेला दोनों राजा हुक्‍मचन्‍द की नगरी में पधारे तो राजा ने उन दोनों का खूब आदर-सत्‍कार किया। तब योगी ने सब जानते हुए भी हुक्‍मचंद से कहा कि शव ले आओ। इस शव को हम जीवित कर देंगे।

यह सुन हुक्‍मचन्‍द बोले कि शव को तो पहले ही जलाया जा चुका है। तब गोपीचन्‍द जो हाथ काटकर ले गये थे वह ले आये और योगी को दिया। योगी ने उस हाथ से ही संजीवनी मंत्रों के प्रभाव से जीवित कर दिया।

जीवित होते ही चम्‍पावती योगी के चरणों में गिर पड़ी। राजा हुक्‍मचंद भी अपने अपराधों की क्षमा मांगने लगे। वे कहने लगे कि मुझ पतित को अपमान करने के लिये क्षमा कर दें और एक रात को रूककर रूखा-सूखा खाकर मुझे आशीर्वाद दें।

फिर चम्‍पावती ने गुरू और शिष्‍य दोनों को भोजन करवाया और योगी ने चम्‍पावती को अपना झूठा खिलाकर अमरत्‍व प्रदान किया। इसके बाद योगी हेलापट्टन चले गये और गोपीचन्‍द बद्रिकाश्रम चले गये।

6 माह के बाद कणिफानाथ ने गोपीचन्‍द को देखा तो वे विद्याएं सीख चुके थे और उन्‍हें देवताओं से वरदान दिलवाए। इसके बाद उन्हें सारी विद्याएं सिखलाईं।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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