Machander Nath Ki Kahani Bhag 21 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 21 || Machander Nath Ki Katha Bhag 21 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 21

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 21 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 21 || Machander Nath Ki Katha Bhag 21 || मछंदर नाथ की कथा भाग 21

Machander Nath Ki Kahani Bhag 21 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 21 || Machander Nath Ki Katha Bhag 21 || मछंदर नाथ की कथा भाग 21

Machander Nath Ki Kahani


मिथला नगरी का कुम्‍हार अवंती नगरी में रहने लगा। वह सत्‍यवर्मा की बेटी को अपनी बेटी की तरह ही रखता था। एक दिन राजा की बेटी ने कुम्‍हार से कहा कि मैं इन्‍हें अकेले में कुछ कहना चाहती हूँ।

इस पर कुम्‍हार ने कहा कि मैं तुम्‍हारी बातें अवश्‍य कराऊँगा। फिर कुम्‍हार रात में गधे के पास गया और बोला कि हे गंधर्वराज मेरे कहने से राजा ने सत्‍यवती की शादी आपके साथ कर दी। अब वह रोज आपकी राह देखती है।

मेरी इच्‍छा है कि आप दोनों खुशी-खुशी मिल-जुलकर रहा करो। और आपने शादी का उत्‍सव भी अभी तक नहीं मनाया है सो सत्‍यवती को अपनी पत्‍नी के रूप में स्‍वीकार कीजिये।

कुम्‍हार ने कहा कि प्रथम मेरा भ्रम दूर करके पीछे राजकुमारी से मिलिये। कुम्‍हार के ऐसा कहने पर गन्‍धर्व ने कहा कि जब सत्यवती ऋतुवंती होगी तब आप मुझे ऋतुवंती होने का समय बता देना।

इतनी बातें सुनकर कुम्‍हार को बड़ा हर्ष हुआ। जब सत्‍यवती ऋतुवंती हुई तो कुम्‍हार ने जाकर बताया। इतना सुनते ही गधे का रूप एक सुंदर राजकुमार के समान बन गया। इस पर कुम्‍हार के आनन्‍द का ठिकाना न रहा।

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वह सोचने लगा कि सत्‍यवती के भाग्य से ही यह महापुरूष मेरे घर रह रहा है। फिर कुम्‍हार ने गधे के रूप में जैसा व्‍यवहार किया उसकी क्षमा मांगने लगा तो इस पर गंधर्व ने कहा कि आप मेरे पिता समान हैं क्‍योंकि आपने ही मुझे पाला है।

अब आपके कारण ही मेरा श्राप का समय कट गया और मैं राजकन्‍या से विवाह कर सका। मैं आपका एहसानमंद हूँ।

इसके बाद दोनों एकान्‍त में गए और उसी रात सत्‍यवती से गंधर्व विवाह किया। फिर उसी रात सत्‍यवती के गर्भ ठहर जाने से गांधर्व ने अपनी सारी श्राप की कहानी सुनाई।

गंधर्व ने कहा कि अब मैं स्‍वर्गलोक को जाऊँगा और जो हमारा पुत्र होगा उसका पालन-पोषण करना क्‍योंकि जब वह बड़ा हो जाएगा तो सम्राट बनेगा और चारों दिशाओं में उसके नाम का डंका सदा बजता रहेगा।

तुम मुझे भूल जाना और मेरे लिये दुखी न होना। अपने पुत्र का मुख देख खुशी से रहना। परंतु स्‍मरण रहे कि उसे यह कहानी पता न चले। अपने पति की बातें सुनकर सत्‍यवती शोकाकुल होकर मुस्‍कुरा दी।

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अक्‍सर कुम्हार से लोग पूछा करते थे कि यह लड़की तुम्‍हारी कौन है? इस पर कुम्‍हार कह देता कि यह मेरी बेटी है। और इसके बच्‍चा होने वाला है।

फिर नौ महीने बाद सत्‍यवती ने एक बालक को जन्म दिया  और बारहवें दिन बालक का नामकरण संस्‍कार हुआ और उसका नाम विक्रम रखा गया। सूर्य अस्‍त हो जाने के बाद पुरोचन गंधर्व ने अपना शरीर पलटकर बच्‍चे को गोद में लिया और बालक का मुख चूमते ही वह शापमुक्‍त हो गया।

तभी इन्‍द्र का विमान उसे वहां लेने आ पहुंचा और गंधर्व से कहा कि तुम अब स्‍वर्ग लोक पहुँचो। इन्‍द्र की बातें सुन गंधर्व ने बालक को सत्‍यवती को पकड़ा दिया और कहा कि मैं जा रहा हूँ।

इस बालक को माता और पिता दोनों का प्यार देना। यह सुन सत्‍यवती रोती हुई बोली कि हे प्राणनाथ आप हमें किस पर छोड़कर जाते हो। यह सुन पुरोचन बोले कि तुम मुझे जिस समय भी याद करोगी मैं उसी समय तुमसे मिलने चला आऊँगा।

फिर कुम्‍हार को नमस्‍कार कर इंद्र सभा में जा पहुँचे। वहां पहुंच अपना पदभार संभाला। फिर इधर विक्रम धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और 16 वर्ष की आयु में उसने सम्राट से भेंट की तो सम्राट ने उसे चौकीदार के पद पर रख लिया।

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फिर जब राक्षस दक्षिण की ओर जा रहा था तभी विक्रम ने उसे मार डाला और उसके खून से अपने माथे पर तिलक लगा लिया। इस प्रकार उस राक्षस को भी मुक्ति मिल गई और वह गंधर्व रूप धारण कर विमान में बैठकर जाने लगा।

विक्रम ने पूछा कि तुम राक्षस होकर किस प्रकार स्‍वर्ग को जा रहे हो तो उसने कहा कि मैं चित्रवर्मा गंधर्व हूँ। शंकर पार्वती के खेल में दखल देने के कारण मुझे पार्वती जी ने श्राप दे दिया था। इसीलिये आज मैं श्रापमुक्‍त हो स्‍वर्ग जा रहा हूँ।

राक्षस के चले जाने के बाद विक्रम ने चारों रत्‍न प्राप्‍त किये। तब वह भर्थरी की ज्‍योतिष विद्या की तारीफ करने लगे। फिर विक्रम, भर्थरी के पास जो बंजारे थे उनके पास गये। बंजारो को विक्रम ने अपना नाम बताया।

विक्रम बोले कि आप सभी की बातों से मेरा भला हुआ है इसीलिये मैं यहां दोबारा आया हूँ। अगली सुबह नाके वाला दिशा मैदान जा रहा था तो उसने कहा कि नगरी के बाहर तो बंजारे ठहरे हैं। उनसे चुंगी का पैसा मत मांगना।

भर्थरी नाम के मनुष्‍य को मेरे पास ले आओ। उसे मेरा छोटा भाई समझना और मैं आपको काफी धन दूँगा। धन के लोभ में उस चुंगी वाले ने विक्रम की सारी बातें मान लीं और नित्‍यकर्मों से निपटकर अपने चपरासी से बोला कि बाहर जो बंजारे ठहरे हुए हैं उनकी चुंगी माफ कर भर्थरी नामक पुरुष को मेरे पास ले आओ।

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तब उसने कहा कि दरबार से आज्ञा हुई है कि भर्थरी को कुछ दिन दरबार में रखा जाये। जब वे चुंगी चौकी पर जा पहुँचे तो विक्रम भी वहां जा पहुँचे और भर्थरी को गले लगाकर खूब मान-सम्‍मान किया।

तब मुंशी ने चुंगी कर और इनाम तो राजा ने एक रत्‍न उसके पास रख दिया और कहा कि तुम्‍हारा सारा धन चुका कर मैं रत्‍न वापस ले लूँगा। तब मुंशी ने कहा कि यह हमारा नौकर है अभी इसके पास ठहरो।

इसकी माता तुम्‍हारे लिये भी खाना बना दिया करेंगी। तब भर्थरी ने कहना मान लिया और विक्रम फिर  उसे अपने साथ घर ले गया। थोड़ी देर बात की और सारी बातें सत्‍यवती को बतायीं।

यह सब सुनकर सत्यवती बड़ी ही प्रसन्‍न हुईं। विक्रम ने सत्‍यवती से कहा कि भर्थरी मेरा छोटा भाई है अत: इसका पालन भी मेरे समान ही होना चाहिये।

भर्थरी, विक्रम के पास रहने लगे। सत्‍यवती और विक्रम दोनों ही भर्थरी को पूरा प्‍यार करते थे। विक्रम और भर्थरी दोनों भाईयों की तरह रहने लगे थे।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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