Machander Nath Ki Kahani Bhag 23 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 23 || Machander Nath Ki Katha Bhag 23 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 23

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 23 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 23 || Machander Nath Ki Katha Bhag 23 || मछंदर नाथ की कथा भाग 23

Machander Nath Ki Kahani Bhag 23 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 23 || Machander Nath Ki Katha Bhag 23 || मछंदर नाथ की कथा भाग 23

Machander Nath Ki Kahani


राजा भर्थरी ने वन में दतात्रेय जी से 12 वर्ष गृहस्‍थ सुख भोगने का समय मांगा था। तब वे अपनी नगरी उज्‍जैन में वापस आये और शाम का भोजन करने के बाद अपनी रानी पिंगला के महल में गये।

अपने पति के आने पर रानी ने उन्‍हें सोने की शय्या पर बैठाया और अपने पति के चरणों की सेवा की। प्रेम प्रकट किया। वे दोनों पास ही बैठे थे। आपस में प्रेम-प्रलाप कर रहे थे। तभी राजा ने रानी को चूमकर कहा कि हम दोनों के शरीर भले ही अलग हों पर प्राण एक ही हैं।

राजा भर्थरी को पान दे रही रानी ने कहा कि ब्रह्माजी ने हमारा जोड़ा खुद अपने आप गढ़ा है। हम लोग प्रेम से एक दूसरे से मिलते हैं।

यह सुन पिंगला रानी बोलीं कि यदि आपका कहना सच निकला तो मैं एक पल भी जीवित न रहूँगी और आपके शव के साथ ही सती हो जाऊँगी।

अपनी रानी की बातें सुनकर राजा भर्थरी बोले कि रानी मेरे मरने के बाद तुम सती हो जाओगी यह सत्‍य बात नहीं है। कथनी और करनी में बहुत बड़ा फर्क होता है। अपने प्राणों से बढ़कर कोई भी दूसरी चीज प्‍यारी नहीं है।

प्राणों का त्‍याग करना बहुत कठिन कार्य है। यह सुन रानी पिंगला बोलीं कि मैंने जो आपसे अपने मन की बात कह दी तो भी आपको दया नहीं आयी?

ईश्‍वर की रीत ईश्‍वर जाने और न जाने कोय।

जो कुछ रची विधाता राई रत्‍ती न कम होय।।


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जिस समय मछंदर नाथ गर्भादि पर्वत पर तप कर रहे थे और गोरखनाथ तीर्थ यात्रा पर निकले हुए थे। गोरखनाथ जी गिरनार पहुँचे और वहां पर दतात्रेय जी से भेंट की। गोरखनाथ दतात्रेय जी के चरणों मे लेट गये।

दतात्रेय जी ने उनके माथे पर हाथ रखा और पूछा कि आज कल मछंदर नाथ नहीं दिखाई दे रहे। और तुम यहां पर कैसे आये हो? गोरखनाथ बोले कि गुरू मछेन्द्रनाथ गर्भादि पर्वत पर तप कर रहे हैं। और मैं उनके बताये तीर्थों की यात्रा करते हुए आपके श्रीचरणों में आया हूँ।

दतात्रेय भगवान ने गोरखनाथ जी से कहा कि तुम मेरा एक कार्य करो। मैंने भर्थरी को उपदेश दिया था कि तुम सभी रानियों को छोड़कर बद्रिकाश्रम पहुँच जाओ। अब वह भी अच्‍छी तरह जान गया है कि यह संसार एक मिथ्‍या है।

अब तुम जा कर उसे यह अहसास करवा दो कि तुम भी सूर्य पुत्र हो और वह तुम्‍हारा छोटा भाई है। इसके बाद दतात्रेय जी ने गोरखनाथ जी को भर्थरी के जन्‍म की सारी कथा सुनाई।

वे दोनों बद्रिकाश्रम पहुँचे जहां भर्थरी ध्‍यानमग्‍न बैठे चिंतन कर रहे थे। दतात्रेय और गोरखनाथ को देखकर भर्थरी को चेत हुआ और उन्‍होंने उठकर दोनों को प्रणाम किया।

तब गोरखनाथ बोले कि मैं गुरू मछेनद्रनाथ का शिष्‍य गोरखनाथ हूँ। मेरे गुरू दतात्रेय जी के शिष्‍य होने के नाते से तुम मेरे भाई हो। तुम्‍हें दतात्रेय जी ने उपदेश दिया है इसीलिये तुम्‍हें उनके चरणों में माथा टेकना चाहिये। मैं तुम्‍हें नमस्‍कार करता हूँ।


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अब दतात्रेय जी ने भर्थरी से पूछा कि बेटा अब तू बता कि तेरी इच्‍छा रानियों के साथ रहने की है या तपस्‍या करने की? तब भर्थरी ने कहा कि अब तो गुरू कृपा ही मेरा आधार है।

फिर दतात्रेय जी ने भर्थरी को नाथ पंथ की दीक्षा दी और अपना वरदहस्‍थ उसके माथे पर रखा। उसे योगाभ्‍यास करवाए। बलवान बनने की रसायन बनाना बताया।

सभी विद्याएं और देवताओं के आशीर्वाद मिलने के बाद बावन वीर और 56 कलुवों को अनुकूल करवाया फिर उनसे वरदान भी दिलवाए। इसके बाद दतात्रेय जी ने भर्थरी को बद्रिकाश्रम में तप करने बिठाया।

बाद में दतात्रेय जी गिरनार पर्वत पर बैठ कर मछंदर नाथ का इंतजार करते रहे। इसके बाद गोरखनाथ, भर्थरी को लेकर गिरनार पर्वत पर लेकर गये और दतात्रेय जी की आज्ञानुसार मछेन्द्रनाथ से मिले और दतात्रेय जी का संदेश उन्‍हें सुनाया।

अब दोनों गुरू चेले दतात्रेय जी के दर्शन के लिये वहां से चलकर विद्रमनगर के रास्‍ते होकर कौडिल्‍यपुर नगर में पहुँचे। वे दोनों वहां अब भिक्षा के लिये घूमने लगे।

तभी अचानक उन्‍होंने देखा‍ कि शीशागढ़ के राजा ने अपने बेटे के हाथ-पैर काटकर चौराहे पर डाल दिये हैं। वह आश्‍चर्य में थे कि वहां का राजा इतना ज्ञानी, धर्मात्‍मा और सद्गुण वाला होते हुए भी ऐसे अनुचित कार्य को कैसे कर बैठा?

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उसने इतना क्रोध किस कारण से किया? क्‍या यह बेटा राजा का नहीं है? वह राजा की प्रार्थना करने पर कृष्‍णा नदी में उसे मिला था। राजा के पुत्र नहीं था जिस कारण वह सदा उदास रहा करता था।

तब रानी ने राजा से कहा कि आप चिन्‍ता क्‍यों करते हो भाग्‍य में जो होना है वह तो होकर ही रहेगा। राजा ने शिवजी की प्रार्थना करने का संकल्‍प लेकर अपने प्रधान को बुला सारा राज्‍य उसे सौंप दिया और राजा, रानी को साथ लेकर रामेश्‍वर चले गये।

कुछ दिनों के बाद वे दोनों कृष्‍णा नदी के संगम पर आ पहुँचे। और उसी रात राजा को स्‍वप्‍न आया कि अभी आप यहां से कहीं जाना नहीं। आपको यहां पुत्र की प्राप्ति होगी।

तुंगभद्रा नदी के बीच मेरा और पार्वती का वास है। तुम दोनों रोजाना हमारी सेवा करो। स्‍वप्‍न में दिखने वाली जगह तलाशने पर एक पुराना शिवलिंग दिखाई दिया। तब राजा ने उसकी प्राण प्रतिष्‍ठा की और शिव का नाम जपने लगा।

उधर शिव अपने गणों सहित कैलाश पर्वत पर बैठे थे। तभी सुरोचन नामक अप्‍सरा ने शंकर जी को याद किया और दर्शन देने पर वह उनके कदमों में गिर पड़ी।


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अब वह शिवजी की मुख मुद्रा देखकर नाचने गाने लगी। लेकिन मन आपे में न रहने के कारण सुरताल बिगड़ गए। यह देख शंकर जी बोले कि सुरोचन मैं तेरे मन का भाव समझ रहा हूँ।

इस कारण भद्रा समय पर मित्रआचार्य नामक ब्राह्मण के यहां तू जन्‍म लेगी। शंकर जी का श्राप सुनकर वह भयभीत होकर बोली कि मैं स्‍वर्ग सुख से भी वंचित हो जाऊँगी।

वह बार-बार धरती पर अपना माथा टेक शिवजी की स्‍तुति करने लगी। वह श्राप मुक्ति का मार्ग पूछने लगी। तब शिवजी ने प्रसन्‍न होकर कहा कि मृत्‍यु लोक में अब तू जन्‍म ले और समय आने पर तू मेरी मूर्ति को स्‍पर्श करेगी और श्रापमुक्‍त हो स्‍वर्ग को आ जावेगी।

इस प्रकार वह धरती पर आकर मित्राचार्य की पत्नी सरयू के गर्भ से नौ माह बाद उत्‍पन्‍न हुई। वह पिछले जन्‍म में एक अप्‍सरा होने के कारण इस जन्‍म में भी विश्‍व सुंदरियों को मात दे रही थी।

उसका नाम कादरबा रखा गया। जब वह 12 वर्ष की हुई तो उसके पिता मित्राचार्य ने उसके लिये वर ढूँढना प्रारम्‍भ किया लेकिन वह विवाह से इंकार कर देती थी। वह तो बस रात-दिन शिवजी के ध्‍यान में मग्‍न रहती थी।

वह रोजाना पूजा करने अपने माता-पिता के साथ जाया करती थी। एक दिन वह अकेली पूजा करने चली गई थी। उसने जय शंकर कहकर अपना मस्‍तक शिवजी के चरणों में टेक दिया।

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तभी शंकर जी प्रकट हो गये। वे उस सुंदरी के रूप को देखकर कामातुर हो गये और उसे पकड़ने के लिये दौड़े। परंतु वह आगे-आगे दौड़ने लगी। लेकिन एक समय ऐसा आया जब शिवजी ने उन्‍हें जा पकड़ा।

शिवजी का स्‍पर्श होते ही वह स्‍वर्ग सिधार गई परंतु शिवजी का वीर्य कृष्‍णा नदी में जा गिरा जहां राजा ने स्‍नान कर सूर्य को अर्घ्‍य देने के लिये हाथ में जल लिया हुआ था।

अचानक राजा को बालक का पुतला हाथ में दृष्टिगोचर हुआ। महादेव ने प्रसन्‍न होकर हंसी-खुशी वह बालक रानी को सौंप दिया। बच्‍चे के मिलने की सारी कथा रानी ने राजा को सुनाई।

रानी बोली कि मालूम होता है कि किसी बड़े देवता ने अवतार लिया है। रानी ने बालक को अपना स्‍तनपान करवाया। जब वह स्‍तनपान करने लगा तो उसका नाम कृष्‍णागार रख दिया।

कुछ और दिन वहां रुक कर राजा और रानी अपने राज्‍य में पहुँचे। जब उस बालक की आयु 12 वर्ष हुई तो राजा के मन में उसके ब्‍याह करने की उमंग उठी। राजा ने अपने बेटे के लिये सुयोग्य कन्‍या की तलाश में चारों तरफ अपने दूतों को भेजा।

लेकिन सुयोग्‍य कन्या न मिलने के कारण वे सब खाली हाथ लौट आये। कुछ दिन बाद रानी का निधन हो गया। अब राजा को बहुत पीड़ा हुई। उसे विषय-वासनायें सताने लगीं तो उसने सोचा खुद का ही विवाह कर लिया जाये।



प्रधान ने उसके लिये चित्रकूट के राजा की पुत्री भुजावती जिसकी उम्र मात्र 15 वर्ष थी, से करवाने को कहा। एक दिन राजा शिकार के लिये वन में गया हुआ था। तो इसी दौरान भुजावती और उसके सौतेले पुत्र कृष्‍णामार की आंखें चार हुईं।

वे दोनों पहले एक-दूसरे को नजर उठाकर भी नहीं देखते थे। रिश्‍ते में अपने पुत्र को देखने पर भुजावती को वासना सताने लगी। रानी ने अपनी दासी को भेजकर कृष्‍णामार को बुलवाया।

रानी की दासी ने तुरंत ही कृष्‍णामार को यह सूचना दी। वह खेलता-कूदता अपनी सौतेली मां के पास आ गया। उस समय कृष्‍णामार की उम्र 17 वर्ष थी। उसने रानी को नमस्‍कार किया।

परंतु हुआ कुछ यूँ कि कामवश भुजावती ने अपने बेटे का हाथ पकड़ लिया और उसे बुरी नजर से देखने लगी। कृष्‍णामार एकदम भयभीत हो गया। भोजवती ने उससे स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि तू मुझ से पति के समान भोग-विलास कर और मेरे मन को शान्ति दे।

तब बेटे ने क्रोध में आकर अपनी मां को काफी भला-बुरा कहा। और वह वहां से चला गया। तब रानी ने यह बात अपनी दासी से कही कि अब ये सारी बात राजा के समक्ष खोल देगा और राजा यह जानकर मुझे मौत की सजा सुना देंगे।

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इससे अच्‍छा तो यही होगा कि मैं अभी विष खाकर अपनी जान दे दूँ। इधर जैसे ही रानी विष खाने को तैयार होती है तभी दासी ने कहा कि तुम व्‍यर्थ ही अपने प्राण देने की सोच रही हो। तुम अपने महल में जाकर रूठकर सो जाओ।

जब राजा तुमसे रूठने का कारण पूछे तो उनसे आंखों में पानी भरकर कह देना कि आपके होते हुए भी आपका पुत्र मेरा बलात्‍कार करने पर उतारू हो गया। परंतु जब मैंने उसे भला-बुरा कहकर आंखें दिखाईं तो वह भयभीत होकर भाग गया। ऐसी अवस्‍था में अब मैं और अधिक नहीं जीना चाहती हूँ।

रानी तुम्‍हारे ऐसा कहने पर राजा अपने पुत्र का वध कर देगा। फिर तुम जिसे चाहो उसे बुलाकर ऐशोआराम की जिंदगी जीना।

दासी के कहे अनुसार रानी अपने महल में जाकर बिना बिछे पलंग पर लेट गयी और उसने भोजन, पानी और नहाना-धोना इत्‍यादि भी त्‍याग दिया।

शाम को  जब राजा अपने महल में लौटा तो रानी को न देखकर  उसने दासी से पूछा कि भुजावती कहां है? वह आज आरती का थाल लेकर क्‍यों नहीं आयी? यह सुन दासी ने कहा कि उन्‍होंने मुझे अपनी तकलीफ के बारे में कुछ भी नहीं बताया।

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दासी आगे बोली कि वह अपने पलंग पर पड़ी हैं। राजा भुजावती के महल में गये और उससे क्रोधित होकर कहा- कि तू रानी होकर भी इस तरह क्‍यों पड़ी हुई है? अगर किसी ने तुझसे कुछ कहा है या तुझे बुरी नजर से देखा है तो तू मुझे बता। मैं उसकी आंखें निकलवा दूँगा।

राजा की बात सुनकर रानी को संतोष हुआ। उसने राजा से कहा कि तुम्‍हारे बेटे की बुद्धि भ्रष्‍ट हो गयी है। उसके अलावा इस महल में और कोई भला मेरी इज्‍जत लूटने की कोशिश कर सकता है? हे ईश्‍वर मेरी सहायता करें।

राजा ने रानी की बातें सुन कोतवाल को आदेश दिया कि कृष्‍णागार को मार कर हाथ-पैर तोड़कर चौराहे पर फेंक दो। थोड़ी ही देर में यह चर्चा सारी नगरी में फैल गयी।

सारी जनता ने राजा को काफी समझाया पर अन्त में जब राजा न माना तो कोतवाल ने राजा के कहे अनुसार कृष्‍णगार को मार दिया और हाथ-पैर तोड़कर चौराहे पर फेंक दिया।

तभी गोरखनाथ अपने गुरू के साथ आ निकले। उन्‍होंने भीड़ देखकर सारा हाल अपने गुरू मछेन्द्रनाथ को बताया और कहा कि इस दुष्‍ट राजा ने अपनी पत्‍नी के बहकावे में आकर अपने पुत्र को मरवा डाला है।


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यह सुनकर गुरू मछेनद्रनाथ ने संजीवनी विद्या से उस बालक को जीवित कर दिया और राजा के सामने ले जाकर कहा कि हम इसे नाथ पंथ में शामिल करेंगे। आपने इस बेकसूर के हाथ-पैर तुड़वा दिये।

अब हम इसे अपने साथ लेकर जा रहे हैं। तब गोरखनाथ ने कहा कि गुरूजी आप इसे सभी विद्याओं में संपन्‍न बना दें और तप करने के बाद कोई दूसरा कार्य करेंगे।

कष्‍णागार का नाम चौरगीनाथ रखा और उसे ले जाकर गुफा में रखा। उससे कहा कि अब तुम यहां बैठकर तपस्‍या करो और हम गुफा का पत्‍थर अड़ा देते हैं। गोरखनाथ बोले कि यहां तुम्‍हें दोनों समय का भोजन मिल जाया करेगा।

तुम उसे रोजाना खा लिया करना। और यह स्‍मरण रहे कि कोई पत्‍थर तुम पर न आ गिरे। फिर चौरगीनाथ ने कहा कि आप जैसे रखेगे मैं वैसे ही रहूँगा। इसी में मेरा कल्‍याण निहित है। परंतु आप बस मुझे भूल मत जाना। आप मेरा ध्‍यान रखना।

चौरंगीनाथ की प्रार्थना योगीराज ने स्‍वीकार कर ली और तत्पश्‍चात दोनों गुरू-चेले ने एक बड़ा पत्‍थर लाकर गुफा के आगे खड़ा कर दिया। इसके बाद चामुण्‍डा देवी का स्‍मरण किया।


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देवी चामुण्‍डा धरती पर उतर आयीं और उन्‍होंने मछेन्द्रनाथ से पूछा कि आपने मुझे किस कार्य के लिये याद किया है? यह सुन गोरखनाथ बोले कि माता यहां एक प्राणी है। उसके भोजन के लिये यहां गुप्‍त रूप से फल-फूल रख दिया करना।

आपके ऐसा करने से इसका पेट भर जाया करेगा। यह कहकर दोनों योगी गिरनार पर्वत पर जा पहुँचे। देवी चामुण्‍डा दोनों समय पर भोजन रखकर चली जाया करती थीं। परंतु चौरगीनाथ को बड़ा भय रहता था कि कही कोई गलती न हो जाये।

चौरगीनाथ का हर एक पल साधना में ही बीतता था इसी कारण से उसका शरीर तो बस ढांचा मात्र ही रह गया था। और वह गहरी तपस्‍या में लीन हो गया।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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