Machander Nath Ki Kahani Bhag 24 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 24 || Machander Nath Ki Katha Bhag 24 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 24

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 24 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 24 || Machander Nath Ki Katha Bhag 24 || मछंदर नाथ की कथा भाग 24

Machander Nath Ki Kahani Bhag 24|| मछंदर नाथ की कहानी भाग 24 || Machander Nath Ki Katha Bhag 24 || मछंदर नाथ की कथा भाग 24

Machander Nath Ki Kahani


गिरनार पर्वत पर पहुँच कर दोनों योगियों ने भगवान दतात्रेय जी के दर्शन किये। मछंदर नाथ को देखकर दतात्रेय जी अति प्रसन्न हुए। इसके बाद दतात्रेय जी ने कहा कि अब तुम दोनों यहीं रहो और कुछ दिन रहने के बाद ही वहां से जाने की आज्ञा दी।

दतात्रेय जी को उस समय छोड़कर जाते समय दोनों को बहुत दुख हुआ। वहां से चलते हुए काशी होते हुए वे प्रयागराज आये। उस समय वहां पर त्रिविक्रम राजा का राज्‍य हुआ करता था।

त्रिविक्रम काल के समान अपने शत्रुओं पर वार करता था। उसकी प्रजा उससे संतुष्‍ट थी। उसकी रानी भी पतिव्रता थी जो अपने पति कि आज्ञा की कभी भी अवहेलना नहीं करती थी। वह अपने पति की आज्ञा को ही अपना परम धर्म समझती थी।

राजा संतानहीन था। राजा की उम्र अधिक हो जाने के कारण उसकी आशा अब निराशा में बदल चुकी थी। इसी सोच में उस राजा का निधन हो गया। सारे नगर में हा-हाकार मच गया।

मछंदर नाथ को संतानहीन रानी को देखकर दया आ गयी और वह शोक प्रकट करते हुए कहने लगे कि धन्‍य है वह राजा जिसके लिये उसकी प्रजा महान दुख प्रकट कर रही है।

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मछंदर नाथ के मन में आया कि उस राजा को जीवित कर दें ताकि जनता का दुख दूर हो सके। तब मछंदर नाथ ने राजा की आयु का ज्ञान कर योग दृष्टि से देखा तो उन्‍हें पता चला कि राजा धर्मज्ञ होने के कारण ब्रह्म में समा गया है।

तब दोनों गुरू और चेले नगरी के बाहर शिवालय में जा पधारे। और उस राजा के शव को रुकवाया और कहा कि हम इसे जीवित कर रहे हैं। फिर मछंदर नाथ ने अपने चेले गोरखनाथ को बुलाया और कहा कि लोक कल्‍याण के लिये मैं इस राजा को जीवित कर रहा हूँ।

मैं इस राजा के शरीर में प्रवेश कर रहा हूँ तब तक 12 वर्षों तक तुम मेरे शरीर की सुरक्षा करना। बाद में मैं पुन: अपने शरीर में प्रवेश कर सकूँगा। इतना कह राजा के शरीर में मछंदर नाथ की आत्‍मा ने प्रवेश कर लिया और तभी राजा श्‍मशान भूमि में खड़ा हो गया।

जनता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रह गया था। वे लकडि़यों में आग लगाकर लौट गए। गोरखनाथ जी सोचने लगे कि गुरूजी का शरीर मैं बारह वर्षों तक कैसे संभालूँगा? वे ऐसा सोच ही रहे थे कि अचानक उन्‍हें एक चरवाही नजर आयी।

गोरखनाथ ने उस चरवाही को सारी बातें समझाई। उसी शिवालय मे एक सुरंग थी जिसे चरवाही ने गोरखनाथ को दिखाया। तब गोरखनाथ ने अपने गुरू का शव वहां लाकर रख दिया।


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चरवाही ने पूछा कि यह शरीर 12 वर्षों तक सड़ेगा नहीं? तब गोरखनाथ ने कहा कि मेरे गुरू अमर हैं। योगियों के शरीर सड़ा नहीं करते। किंतु यह बात तेरे और मेरे बीच में ही रहनी चाहिये। किसी भी तीसरे व्‍यक्ति को इसका आभास न हो।

इधर जिंदा हुआ त्रिविक्रम राजा राजमहल में बिना शंका के रहने लगा व राजकार्य संभालने लगा। वह रानी के साथ राजा की भांति ही रहने लगे। एक दिन त्रिविक्रम शिवालय में गये और गोरखनाथ से पूछा।

तब गोरखनाथ ने कहा कि गुरूदेव आपका शरीर पूर्णत: सुरक्षित है। गोरखनाथ ने वह स्‍थान भी उन्‍हें दिखाया। राजा रोज आकर शिवालय में जाकर अपना शरीर देख जाया करता था।

एक दिन गोरखनाथ ने राजा से कहा कि गुरूजी अब मैं तीर्थयात्रा पर जाना चाहता हूँ। आप योग साधना करके स्‍वस्‍थ रहना। अपने शिष्‍य का कहा मानकर उन्‍होंने गोरखनाथ को आज्ञा दे दी। तब गोरखनाथ तीर्थयात्रा को रवाना हो गये।

इधर 6 माह बाद रेवती रानी के गर्भ ठहर गया और 9 माह के बाद उसने एक पुत्र को जन्‍म दिया। उसका नामकरण कर धर्मनाथ रखा। एक दिन रानी पूजा करने शिवालय को गयी।

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पूजा करते समय वह शिवजी को बोली कि हे उमापति, मेरे पति से पहले मुझे मृत्‍यु देना। रानी की विनती सुनकर पास में खड़ी चरवाही हंस पड़ी। चरवाही को हंसता देखकर रानी को बड़ा ताज्जुब हुआ।

रानी ने चरवाही से पूछा कि तुम्‍हे हंसी क्‍यों आयी? इसका कारण मैं जानना चाहती हूँ। तब वह चरवाही बोली कि महारानी आप मेरे से सच न पूछें तो ही उसमें हम दोनों का भला निहित है। मैं आपसे सच नहीं कहना चाहती क्‍योंकि इसमें भारी अनर्थ होने का खतरा है।

हम तो आपकी प्रजा हैं। हमें हलाल करना आपके लिये कौनसी बड़ी बात है? यह सुन रानी ने कहा कि तू पूरी तरह निश्चिंत रह। मैं तुझे कोई दुख नहीं होने दूँगी। तब उसने सारी घटना रानी को बता दी।

चरवाही ने बताया कि जब राजा चिता में रखे जाने को थे तभी मछंदर नाथ ने उनके शरीर में प्रवेश किया और इस प्रकार उन्‍हें जीवित किया। तुम विधवा होकर भी सुहागन बनी हुई हो इसी कारण मुझे तुम्‍हारे प्रार्थना करने पर हंसी आ गयी।

रानी के कहने पर चरवाही ने योगीराज का वह शव भी दिखा दिया जिसे देख रेवती रानी बड़ी बेचैन हो गयी। वह सोचने लगी कि बेकार में मेरा पतिव्रत धर्म चला गया। लेकिन अब आगे के झंझट को काट ही देना चाहिये।

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समय आने पर योगी अपने शरीर में प्रवेश अवश्‍य करेगा। जब तक राजकुमार नाबालिग है तब तक राज्‍य का कार्यभार कैसे चलेगा? इसी कारण योगी के शरीर का छिन्‍न भिन्‍न कर देना जरूरी है।

जब शरीर ही नष्‍ट हो जावेगा तो मछंदर नाथ को झक मारकर हारकर मेरे अधीन ही रहना पड़ेगा। इस प्रकार निश्‍चय कर रानी ने दासी और दो दासो को साथ लेकर सुरंग में जाकर मछंदर नाथ के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर शरीर जंगल में फिकवा दिया।

सुरंग का दरवाजा बंद करके रानी राजमहल को लौट आयी। रानी का कार्य संपन्‍न हो जाने के बाद पार्वती जी ने शिवजी से कहा कि रानी ने मछंदर नाथ के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल में फिकवा दिया है।

यह सुन शिवजी बोले कि ऐसा लग रहा है जैसे मानो आज मेरे ही प्राण निकल रहे हैं। यह कह उन्होंने यक्षिणी को आदेश दे कहा कि तुम मछंदर नाथ के शरीर के सारे टुकड़े इकट्ठा करके कैलाश पर्वत पर ले आओ।

महादेव के आदेश पर लाखों चामुण्‍डायें आ गयीं। महादेव ने उन्‍हें आदेश दिया कि मछंदर नाथ के शरीर के टुकड़े तुम इकट्ठे कर वीरभद्र को दे देना। इसका शिष्‍य गोरखनाथ महाप्रतापी है। वह यहां अवश्‍य आयेगा।

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उन्‍होंने पहरेदार बैठा दिये। जब समय समाप्‍त हुआ तो गोरखनाथ तीर्थयात्रा से वापस लौटे और जो उन्‍होंने आकर देखा वह तो उनकी कल्‍पना से परे था। गोरखनाथ घूमते-घूमते गोदावरी गंगा के नजदीक आभा नगर के जंगल में आये।

वहां उन्‍हें भूख सताने लगी परंतु वहां उन्‍हें कुछ भी नजर नहीं आया। दोपहर के समय एक छोटा सा बालक उन्‍हें एक खेत में खड़ा दिखाई दिया। उसे गोरखनाथ ने आवाज दी।

संत के शब्‍द सुनकर वह उठकर बोला कि आप इस समय जंगल मे कैसे आये? गोरखनाथ बोले कि कुछ खाने-पीने को दोगे तो पुण्‍य मिलेगा। तब उस बालक ने बड़े आदर से खाना खिला और पानी पिला प्रसन्‍न किया।

जब गोरखनाथ ने उससे उसका नाम पूछा तो उसने कहा कि आपका काम हो गया तो अब आपको नाम से क्‍या करना? अब अपने रास्‍ते जाओ।

गोरखनाथ बोले कि बच्‍चा तुम जो कहते हो ठीक है लेकिन तुमने जो मेरी प्रसन्‍नतापूर्वक सेवा की है तो जो इच्‍छा हो सो मांग लो। यह सुन वह बालक बोला कि तुम तो खुद ही मांगते फिरते हो तो तुम भला मुझे क्‍या दे सकते हो?

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गोरखनाथ बोले कि बेटा तुम आज जो कुछ भी मांगोगे मैं तुम्‍हें वही दूँगा। यह सुन उसने कहा आप भिक्षुक लोग मुझे दे ही क्‍या सकते हो? मैंने जो कुछ देना था वह दे दिया अब तुम अपना रास्‍ता नापो।

तो गोरखनाथ बोले कि जिस चीज की तुम्‍हें सबसे ज्‍यादा जरूरत हो उसे त्‍याग देना। जब शाम को सिर पर बोझा रखकर घर जाने को तैयार हुआ तब वह गोरखनाथ के वचनों को याद कर खड़ा का खड़ा रह गया। फिर जब उसे भोजन की इच्‍छा हुई लेकिन प्‍यारी चीज त्‍यागने की याद करके उसे अपने वचन की याद आयी और इस प्रकार उसने उसे त्‍याग दिया।

अब गोरखनाथ की कृपा ऐसी हुई कि वह हवा ही खाने लगा। सूखकर उसका शरीर बस ढा़ंचा मात्र ही रह गया था। इधर गोरखनाथ बद्रिकाश्रम जा पहुँचे और बद्री केदार के चरणों में गिर पड़े।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

इस कहानी को ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयर करें बाबा के सभी भक्‍तों के साथ।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछंदर नाथ जी की।

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