Machander Nath Ki Kahani Bhag 25 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 25|| Machander Nath Ki Katha Bhag 25 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 25

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 25 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 25|| Machander Nath Ki Katha Bhag 25 || मछंदर नाथ की कथा भाग 25

Machander Nath Ki Kahani Bhag 25|| मछंदर नाथ की कहानी भाग 25|| Machander Nath Ki Katha Bhag 25 || मछंदर नाथ की कथा भाग 25

Machander Nath Ki Kahani


तब चौरगीनाथ के हालचाल पूछने के लिये उन्‍होंने गुफा का पत्‍थर हटाया तब देखा कि चौरगीनाथ की देह पर मिट्टी की परत जम गई है।

उसमें से केवल शिव-शिव की ध्‍वनि निकल रही है। गोरखनाथ ने उसके शरीर से मिट्टी साफ की और बोले कि मैं गोरखनाथ तुम्‍हें देखने आया हूँ। इतना कह वे चौरगीनाथ को बाहर उठा कर लाये। उसे अपनी दिव्‍य दृष्टि से देखा तब उसमें शक्ति आ गई।

वह गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़े और हाथ जोड़कर बोले कि आज मैं सनाथ हुआ हूँ। फिर गोरखनाथ ने उसे बद्री केदार में शिव पार्वती के दर्शन कराये। वहां से उसे शस्‍त्रास्‍त्र विधा के लिये आशीर्वाद दिया तब बद्री केदार को प्रणाम कर चौरगीनाथ के साथ गोरखनाथ कौडिल्‍यपुर गये।

चौरगीनाथ को माता-पिता से मिलने को कहा। वे बोले कि इन्‍होंने तुम्‍हारे हाथ पैर तोड़े थे इन्‍हें चमत्‍कार दिखाओ। गोरखनाथ की आज्ञा मानकर चौरगीनाथ ने बाग की तरफ वातास्‍त्र की भसमी मंत्रित करके फेंकी।

फिर ऐसी हवा चली कि बाग के सारे माली हवा में उड़ने लगे और वातास्त्र समाप्‍त होते ही एकदम सभी नीचे गिरते ही मूर्छित हो गये। राजा ने सभी मालियों की दुर्दशा की खबर सुनी ।

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उस राजा ने पहरेदारों को बोला कि जाकर पता लगाओ कि यह किसका प्रताप है। पहरेदारों को पता लगाते समय दो योगी तालाब पर दिखाई दिये और यह बात उसने राजा को जाकर बताई।

पहरेदारों की बातें सुन राजा ने सोचा कि गोरखनाथ और मछंदर नाथ ही होंगे। उनकी शरण मे मुझे हाथ जोड़कर चलना चाहिये। भगवान जाने उनके मन मे क्‍या है। क्‍या पता व सारा नगर ही जलाकर भस्‍म कर दें।

तब राजा अपनी सेना के साथ उनके पास आया। गोरखनाथ ने चौरगीनाथ को अपना प्रताप दिखाने को कहा और अपने गुरू की आज्ञा मिलते ही उसने वातास्‍त्र छोड़ा और तभी राजा अपनी सेना सहित आसमान मे उड़ गया।

दोबारा आज्ञा मिलते ही उसने पर्वतास्‍त्र छोड़ा और वातास्त्र धीरे-धीरे निकाल लिया और तब सभी नीचे आ गये। तब गोरखनाथ की आज्ञा से चौरगीनाथ अपने पिता के चरणों में गिर गया। उसने राजा को अपनी पहचान बतायी कि वह राजा का पुत्र है।

राजा ने बेटे को छाती से लगाया और गोरखनाथ के कदमों में गिर पड़ा। तब राजा ने दोनों को घर चलने का आग्रह किया तो इस पर चौरगीनाथ ने कह दिया कि हम आपके घर नहीं जायेंगे क्योंकि आपने सौतेली माता के कहने में आकर मेरे हाथ-पैर तुड़वा दिये थे और बाहर फिंकवा दिया था।

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यह कह चौरगीनाथ ने सारी दासतान अपने पिता को सुनाई। तब राजा ने जाना कि मेरी रानी भुजावती व्‍यभिचारिणी है। राजा ने क्रोध में आकर सेवकों से रानी को वहां लाने को कहा।

तब चौरगीनाथ ने कहा कि माताजी को आप यहां न लाओ आपको जो भी कहना है वह घर के अंदर ही कहना। तब राजा खुशामद कर दोनों योगियों को पालकी में बैठाकर राजमहल ले गया और रानी को सारी बात बताकर और भला-बुरा कहकर घर से निकाल दिया।

तब गोरखनाथ ने राजा को तीसरा विवाह करने की अनुमति दी और कहा कि तीसरा विवाह करने से तुम्‍हारा वंश चलेगा यह आपको मेरा आशीर्वाद है।

कौडिल्‍यपुर छोड़ने के बाद दोनों संत प्रयागराज गये और उस चरवाही से अपने गुरू के बारे मे पूछा तो वह भयभीत हो गई।

कुछ देर बाद वह बोली कि रानी ने मुझे धमकाकर सारी सच्‍चाई जान ली थी। मुझे रानी को सब बतान पड़ा। गोरखनाथ ने पूछा कि अब गुरूजी की क्‍या दशा है? तो यह सुन वह चरवाही बोली कि अब गुरू जी की क्‍या दशा है मैं नहीं जानती।

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चरवाही की बातें सुनकर गोरखनाथ को शंका हुई तो वे सुरंग में देखने को गये। लेकिन वहां उन्‍होंने अपने गुरू मछंदर नाथ के शरीर को न पाया।

अब गोरखनाथ रोने लगे तो चरवाही ने कहा कि आप चुप बैठे रहो मैं अभी रानी से पूछ कर के आती हूँ। वह तुरंत राजमहल में पहुँच कर रानी से बोली कि मैंने मछंदर नाथ का शव आपके हवाले किया था अब 12 वर्ष पूर्ण होने पर गोरखनाथ आये है। वह कहां है?

इतना सुन रानी ने चरवाही को अलग ले जाकर कहा कि मैंने उसके टुकड़े-टुकड़े करके जंगल में फिकवा दिये थे। रानी की बातें सुनकर यह सब गोरखनाथ को बताया तो वे जंगल में ढूँढने लगे पर वहां कुछ भी नहीं था।

तब गोरखनाथ ने अपनी दिव्‍य दृष्टि से देखा तो पता चला कि टुकड़े तो वीरभद्र के पास हैं। जैसे ही वीरभद्र को पता लगा कि गोरखनाथ आने वाला है तो उसने सोचा कि मुझे सावधान रहना चाहिये।

इधर गोरखनाथ और चौरगीनाथ दोनों अपना-अपना झोला लेकर तैयार हो गये। गोरखनाथ ने प्रथम सूर्य पर पर्वतास्‍त्र की योजना की जिससे सूर्य के रथ चलने में बाधा उत्‍पन्‍न होने लगी।


तब सूर्य ने वज्रास्त्र से पर्वतास्त्र को तोड़ दिया और बोले कि मेरे मार्ग में रुकावट डालने वाला कौन वीर पैदा हो गया है? तब बोध करके उन्‍होंने जाना कि यह कार्य गोरखनाथ का है तब वे गोरखनाथ के निकट गये।

जब सूर्यदेव उन दोनों योगियों कि नजदीक आये तो दोनों सूर्य के चरणों में गिर पड़े। तब सूर्य देव बोले कि आप लोगों ने मुझे व्‍यर्थ ही क्‍यों परेशान किया है?

तब मछेन्द्रनाथ बोले कि पिताजी मेरे गुरू मछंदर नाथ का शव शिवगणों के पास कैलाश पर्वत पर है। अब आप हमें ऐसा उपाय बतायें कि हम अपने गुरू का उद्धार कर सकें।

गोरखनाथ की बातें सुन सूर्यदेव दोनों योगियों सहित कैलाश पर्वत पर गये। शिवगण सूर्य के कदमों में गिर पड़े और दर्शन देने का कारण पूछा। तब सूर्यदेव ने गोरखनाथ के प्रताप से वीरभद्र को आगाह किया और उनकी नम्रता की तारीफ भी की।

यह सुन वीरभद्र बोले कि मछंदर नाथ ने हम सबकी बुरी दशा बनायी थी हम अब उसके शरीर के टुकड़ों को वापस नहीं देगे। इस पर सूर्य देव ने कहा कि यदि तुम्‍हें इतना अभिमान है तो उस समय तुम्‍हारी शक्ति कहां चली गयी थी?

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सूर्यदेव बोले कि अब तुम दाब देकर अकड़ दिखा रहे हो लकिन स्‍मरण रहे, गोरखनाथ को तुम कम मत समझना। तब तो अकेले मछेन्द्रनाथ ने तुम्‍हारी दुर्दशा कर दी थी अब तो तुम्‍हारा पाला दो दो योगियों से पड़ रहा है।

तब वीरभद्र बोले कि मछंदर नाथ के टुकड़ों को हम किसी कीमत पर वापस नहीं करेंगे। जिसे जो करना हो वो कर ले।

इस पर सूर्य देव बोले कि अगर तुम्‍हारी इच्‍छा युद्ध करने की है तो धरती पर करो क्‍योंकि अगर मेरी बात न मानी तो कैलाश पर्वत का चूरा-चूरा बन जावेगा। इतना कह सूर्यदेव अंतर्ध्‍यान हो गये।

फिर वीरभद्र ने शिवगणों को आज्ञा दी कि तुम लोग आगे चलो मैं पीछे-पीछे आता हूँ। इस युद्ध में अष्‍ट भैरव और चौरासी लाख शिवगण अस्‍त्र-शस्त्रों सहित पधारे।

शिवगणों की सेना देखकर गोरखनाथ और चौरगीनाथ भी युद्ध के लिये तैयार हो गये। दोनों तरफ से भीषण युद्ध होने लगा लेकिन चौरगीनाथ ने मोहनी अस्‍त्र व वातास्‍त्र की योजना से वीरभद्र का सारा दल खत्‍म हो गया।

तभी वीरभद्र चामुण्‍डाओं को लेकर आ पहुँचा। वीरभद्र ने देखा कि उसकी सेना एक-दूसरे का विनाश करने में लगी है। और फिर गोरखनाथ की संजीवनी मंत्र विद्या से दानव दल खड़ा हो गया।

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सभी देवताओं ने विमान में बैठकर बैकुण्‍ठ जाकर सारा समाचार विष्‍णु भगवान को सुनाया और हाथ जोड़कर कहा कि प्रभु आपको फिर पृथ्‍वी पर अवतार लेना होगा।

इतना सुन विष्‍णु भगवान ने महादेव जी को अपने पास बुलाकर कहा क्‍या वीरभद्र पागल हो गया है? अब यह बात समाप्‍त करने शिवजी गोरखनाथ और वीरभद्र के समीप गये और प्‍यार से समझाया कि मछेन्‍द्रना‍थ का शरीर मेरे हवाले करो तभी यह झगड़ा समाप्‍त हो सकेगा।

तब महादेव जी के आज्ञानुसार चामुण्‍डा को भेज मछंदर नाथ के शरीर के टुकड़े मंगवाये और गोरखनाथ के हवाले करने को कहा। पर यह बात वीरभद्र को न भायी।

तब गोरखनाथ ने वीरभद्र के नाश की तैयारी की। उन्‍होंने वाताकर्षण मंत्र  की योजना कर सांवरी मंत्र पढ़कर भस्‍मी फैंकते ही वीरभद्र सहित सभी दानव सेना का अन्‍त हो गया और वे सब धरती पर जा गिरे।

तब शिवजी और विष्‍णु जी भी वहीं आ गये और मछंदर नाथ को जीवित करने की बात की। तभी गोरखनाथ ने अन्‍यास्‍त्र की योजना कर मरे हुए राक्षसों का दाह संस्‍कार किया। यह वाताकर्षण प्रयोग नाथपंथी योगियों के अलावा किसी भी देवता और दानव को ज्ञात नहीं है।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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