Machander Nath Ki Kahani Bhag 28 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 28|| Machander Nath Ki Katha Bhag 28 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 28

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 28 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 28|| Machander Nath Ki Katha Bhag 28 || मछंदर नाथ की कथा भाग 28

Machander Nath Ki Kahani Bhag 28 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 28|| Machander Nath Ki Katha Bhag 28 || मछंदर नाथ की कथा भाग 28

Machander Nath Ki Kahani


रेवणनाथ कैलाश पर्वत से चलकर ब्राह्मण के घर पहुँचे और लड़के का शव कूटकर उसके सात भाग किये। फिर उसके सात पुतले बना कर संजीवनी विद्या के मंत्रों के जाप से सातों भाइयों को जीवित कर लिया।

इसके बाद रेवणनाथ ने सातों बेटे उनकी मां को सौंप दिये। 12वें दिन उन सब का नामकरण संस्‍कार किया। बाद में दीक्षा देकर उन्‍हें अपना शिष्‍य बना लिया।

देवी सरस्‍वती के कारण ब्रह्मा जी का कुछ वीर्य एक सांपन के किसर पर भी पड़ा  जिसे वह निगल गयी थी। तब अस्तिक ऋषि के मन में विचार आया कि नारायणों में से एक अवतार इस सांपन के गर्भ में है जिसका नाम ऐरहोत्र नारायण है।

यह सब तुम्‍हें इसीलिये सुनाया जा रहा है क्‍योंकि राजा जन्‍मेजय ने नाग यज्ञ किया है और उस यज्ञ की विशेष बात यह है कि उस यज्ञ में सांपों की आहुति दी जावेगी। अत: तुम सुरक्षित स्‍थान पर बैठ जाना।

इस पर नागिन ने पूछा कि वह सुरक्षित स्‍थान कौनसा है? तो इस पर रेवणनाथ बोले वह जो बरगद का पेड़ है उसके खोखले में तू छिपकर बैठ जाना।

ऋषि ने हल्‍के वज्र के प्रयोग से वृक्ष विचन करके स्‍वयं हस्तिनापुर पधारे और ऋषि ने राजा जन्‍मेजय के मण्‍डप में पहुँचकर सब ऋषियों को यह गुप्‍त कथा सुनायी और कहा जो ब्रह्मा बीज सर्पणी के उदर में है वह संत नागनाथ नाम से प्रसिद्ध होगा।

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उसे अपना मत मानो  और तब सभी ऋषियों ने उनके कहने को स्‍वीकार कर लिया और नाग यज्ञ समाप्‍त होने के बाद उस नागिन के दिन पूरे हो गये और उस खोखले में काफी दिन सुरक्षित रहे। जब अण्‍डा बड़ा होकर फूट गया तो एक बच्‍चा रोता हुआ दिखाई दिया।

परंतु वहां उसे संभालने वाला कोई भी नहीं था सिवाय भगवान के। उसी समय ब्राह्मण कोणधर्मा आया। वह हर रोज उस वृक्ष से पत्ते ले जाया करता था। एक दिन जब वह वृक्ष से पत्‍ते लेने आया तो बड़ के खोखले में एक बच्‍चा देखा। तभी वहां आवाज आयी हे कोणधर्मा, इस खोखले के अंदर एक बालक है। तू इसे अपने घर ले जा और इसका लालन पालन कर।

यह बालक ऐरओत्र नारायण का अवतार है। तभी किसी ने वहां तीर छोड़ा जिससे बरगद का पेड़ गिर गया और जब ब्राह्मण ने उस खोखले में से बालक को निकाला तो देवताओं ने आकाश से पुष्पों की वर्षा की और नमस्‍कार किया।

देवताओ ने ब्राह्मण को बताया कि आप बड़े ही भाग्‍यशाली हैं इसी कारण यह वट सिद्धनाथ आपको प्राप्‍त हुए हैं। इसकी माता का नाम पधिनी सांपन है। वट वृक्ष ने इसकी रक्षा की है इसीलिये यह बालक वट सिद्धनाथ कहलायेगा।

यह सिद्धि प्राप्‍त कर सभी योगियों का नाथ होगा। इस प्रकार आवाज सुनकर पंडित वह बालक लेकर अपने घर पहुँचा और अपनी पत्‍नी को उस बालक के बारे में सब कुछ बताया।

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उसकी पत्‍नी ने बड़ी खुशी होकर उस बालक को स्‍तनपान कराया और उसे वह नहला-धुला कर झूलने में झुलाकर उसे प्‍यार से कहती कि हे नागनाथ बेटा सो जा।

जब वह बालक 7 वर्ष का हुआ तो माता पिता ने उसका जनेऊ संस्‍कार कर दिया। एक समय की बात है कि काशी विश्‍वनाथ मंदिर में गंगा नदी के तट के पास खेलते समय दतात्रेय जी वहां आये।

उन्होंने देखा कि सिद्धनाथ एक कतार में बैठाकर अपने सभी साथियों को झूठा भोजन करा रहे हैं। यह देखकर दतात्रेय जी को हंसी आ गयी। तब वे बाल रूप धारण कर पंक्ति में बैठ गये और बोले कि मैं अतिथि हूँ।

मुझे भारी भूख लगी है। तो सिद्धनाथ बोले कि तू है कौन जो हमारा खेल बिगाड़ने बैठ गया है। तब बाद में सिद्धनाथ ने उन्‍हें उस पंक्ति मे बैठा दिया। और बोले कि खूब प्रेम से खाइये

यह देख दतात्रेय जी जान गये कि यह बालक अवश्‍य की पूर्व जन्‍म का कोई योगी है। इसकी यह बुद्धि पूर्वजन्‍म के उपकार के कारण ही है। फिर उन्‍होंने उसे दिव्‍य दृष्टि से देखा तो सारी बात समझ में आ गयी।

इसके बाद दतात्रेय जी को उस बालक पर दया आ गयी और उसे सिद्धि प्रदान की जिसका गुण ऐसा था कि वटनाथ जिस वस्‍तु का भी नाम लेते थे वह वस्‍तु वहां पर हाजिर हो जाया करती थी। विदा होने पर दतात्रेय जी ने उसका नाम पूछ अपना नाम भी बता दिया।

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अब सि‍द्धनाथ का जो मनपसंद भोजन होता वे वही खाया करते। अब भला घर का भोजन कैसे खाये? जब उनके माता-पिता ने न खाने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि हम तो पकवान खाकर आये हैं। थोड़ा सा आपके लिये भी है। लो चखलो।

जब भोजन चखा तो बड़ा आनन्‍द आया और सारे गांव में यह सूचना फैल गयी कि वटनाथ सभी को मुफ्त खाना खिला रहा है। एक दिन अपने बेटे को पिता ने अपने पास बुलाया और पूछा कि बेटा तुम जो रोज रोज तरह तरह के पकवान खिला रहे हो यह किसका चमत्‍कार है?

यह सुन वटनाथ बोले कि मैं आपको भी खिला सकता हूँ। इतना कह उन्‍होंने धरती पर अपना हाथ रखा और तरह तरह के पकवान हाजिर थे। कोणधर्मा को बड़ा आश्‍चर्य हुआ और पूछा  कि यह चमत्‍कार तुझे कैसे प्राप्‍त हुआ?

वटनाथ ने अपने पिता को बताया कि यह सब तो दतात्रेय जी के कारण संभव हुआ है। वे तो तीनों देवों के अवतार हैं। एक दिन वे मुझे सिद्धि देकर चले गये।

एक दिन वटनाथ विचार कर लक्ष्‍मी नारायण के मंदिर में जा ठहरे। कुछ दिन बाद पुजारी की सहायता से लोगों को खाना खाने के लिये निमंत्रण भेजा। तब पुजारी बोले कि सारे गांव के भोजन की व्‍यवस्‍था तुम किस प्रकार करोगे?

वटनाथ बोले कि भोजन की व्‍यवस्‍था मैं कर देता हूँ बाकी आप देखना। ऐसा कह वटनाथ ने सिद्धि के योग से खाने-पीने के सारे सामान की व्‍यवस्‍था की। उसी गांव में दतात्रेय जी भिखारी का रूप धारण कर भिक्षा मांग रहे थे।

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उन्‍हें पहले दिन ही भिक्षा मिलने में काफी मुश्किल हो रही थी। वहां के निवासियों ने उनसे कहा कि तुम बेकार ही घर-घर जाकर भिक्षा मांग रहे हो जबकि गांव में ही सबके भोजन की व्‍यवस्‍था हो रही है। हम सभी वहीं खाने को जा रहे हैं।

अब अकेले तुम्‍हारे लिये कौन खाना बनायेगा? फिर दतात्रेय जी यह देखने के लिये कि गांव में भण्‍डारा कौन करा रहा है, उस स्‍थान पर जा पधारे। यह जानकर कि यह सिद्धिभोज है, दतात्रेय जी ने उस दिन उपवास किया।

तब गांव वाले लोगों ने उस भिखारी के बारे में वटनाथ को बताया कि वह गांव में भिक्षा मांगने आता तो है पर उसका कोई नियम नहीं है। वह हमेशा कच्‍चा अन्‍न ही लेना पसंद करता है परंतु आजकल तो गांव में चूल्‍हा जलना बंद है तो कुछ पता नहीं उसके बारे में।

तब वटनाथ ने कहा कि अगली बार जब वह भिखारी वहां भिक्षा मांगने आये तो उससे मेरी मुलाकात करवाना। मैं स्‍वयं उससे प्रार्थना करूँगा और उसे मनाकर भोजन कराऊॅंगा।

इस प्रकार वटनाथ ने बहुत से लोगों से कहा और कच्‍ची भिक्षा देने से मना कर दिया। यहां के अन्‍न की ही भिक्षा उसे देनी है। अगर वह ना माने तो मुझे बताना।


ऐसा कहकर संत ने बहुत सा सिद्ध अन्‍न उन्‍हें दे दिया।  जब अगले दिन दतात्रेय जी भिक्षा मांगने पहुँचे तो लोग उन्‍हे सिद्धि वाला अन्‍न देने लगे तब उन्‍होंने उस अन्‍न को लेने से इंकार कर दिया।

यह सूचना लोगों ने वटनाथ को दी तो वटनाथ जल्‍दी  से उनके साथ गये। उन्‍हें दूर से एक भिखारी दिखाई दिया। वटनाथ ने हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की और कहा मुझ अनाथ को काफी दिनों से आपके दर्शन न हुए।

दतात्रेय ने उनकी भक्ति देखकर गले से लगा लिया और अपना वरदहस्‍थ उसके माथे पर रखा और कान में मंत्रोपदेश दिया। ऐसा आत्‍मज्ञान मिलने पर वह ब्रह्मज्ञानी हो गया। वह दतात्रेय के चरणों में गिर पड़ा। दतात्रेय ने उसे पूर्वजन्‍म की क‍था सुनाई।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

इस कहानी को ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयर करें बाबा के सभी भक्‍तों के साथ।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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