Machander Nath Ki Kahani Bhag 30 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 30|| Machander Nath Ki Katha Bhag 30 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 30

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 30 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 30|| Machander Nath Ki Katha Bhag 30 || मछंदर नाथ की कथा भाग 30

Machander Nath Ki Kahani Bhag 30 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 30|| Machander Nath Ki Katha Bhag 30 || मछंदर नाथ की कथा भाग 30

Machander Nath Ki Kahani


चरपटीनाथ की जन्‍म कथा

जब भगवान शिवजी की शादी पार्वती जी से हुई तो देव दानव और किन्‍नर सहित ब्रह्मा और विष्‍णु भी पधारे थे। पार्वती जी का अपूर्व रूप देखकर ब्रह्माजी को कामदेव ने सताया और तब वे अपना मोह दूर न कर सके।

तभी उनका वीर्य पृथ्‍वी पर आ गिरा और तब ब्रह्माजी ने शर्मिन्‍दा होकर अपने कदमों से रगड़ते हुए दूर तक चले गये जिससे 88000 ऋषि उत्‍पन्‍न हुए और दूसरी तरफ का हिस्‍सा कर्मचारियों ने कूड़े के साथ समेटकर लज्‍जा होम नदी में फेंक दिया।

परंतु हुआ कुछ यूं कि यह हिस्‍सा नदी में न गिरकर रेत की घास में अटक गया और 9 माह के बाद पिप्‍लायननारायण ने वहां अवतार लिया। इसी कारण से इनका नाम चरपटीनाथ रखा गया। उसी ग्राम में सत्‍यश्रवा नामक ब्राह्मण भी रहता था।

वह शास्‍त्रों में निपुण था। एक दिन गंगा नदी के तट पर कुशा लेने को गया तो उसे कुशों में एक बच्‍चा दिखाई दिया जो कि दिखने में सूर्य के समान तेजस्‍वी था। परंतु बालक को अपने साथ ले जाने की हिम्‍मत उसकी न हो सकी।

न मालूम यह तेजस्‍वी बालक किसका है? कहीं किसी राजा-रानी का बालक तो नहीं है? ऐसा उसने अपने मन में विचारा। वह बच्‍चा जोर-जोर से रोने लगा और कुछ देर बाद पिप्‍लायननारायण का अवतार हुआ। सभी देवताओं ने आकाश से पुष्‍पों की वर्षा की।

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तब बालक को देखकर ब्राह्मण घबरा गया और भागने लगा। तब नारद मुनि ने सत्‍यश्रवा ब्राह्मण से भागने का कारण पूछा। बाद में नारद मुनि ने बालक के जन्म की सारी कहानी सुनायी और बोला कि इसे अपने घर ले जाकर इसका लालन-पालन करो।

इसके बाद ब्राह्मण ने मुनि से कहा कि बालक को उठाकर मेरी गोद में दे दो। तब नारद मुनि ने गंगा नदी के तट पर आकर बालक को उठाकर ब्राह्मण को सौंप दिया।

नारद जी ने कहा कि इसका नाम चरपटीनाथ है ऐसी देवताओ की आज्ञा है। इसके बाद नारद मुनि स्‍वर्गलोक को चले गये। ब्राह्मण उस लड़के को अपने घर ले गया।

उसकी पत्‍नी बड़ी नेक और पतिव्रता स्‍त्री थी जब  उसे बालक का समाचार सुनाया तो वह बोली कि इसका समाचार तो देवी माता मुझे सुना गयी हैं। इसीलिये देवताओ ने आपको दर्शन दिये और नारद मुनि के हाथों यह बालक आपको दिलवाया।

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अपने पति की बातें सुनकर वह बच्‍चे को नहला-धुलाकर अपना स्‍तनपान कराने लगी। जब वह बालक 5 वर्ष का हो गया तो उसका जनेऊ कर उसे पाठशाला में प्रवेश दिलाया। वहां वह 64 कलाओं में प्रवीण हो गया।

एक दिन ब्राह्मण वेश धर नारद मुनि सत्‍यश्रवा के घर आये। तब तक चरपटी नाथ की आयु 12 वर्ष हो चुकी थी। ब्रह्माजी के वीर्य से इस बालक की उत्‍पत्ति हुई है इसीलिये यह मेरा छोटा भाई है।

अपने भाई को प्‍यार कर नारद मुनि बद्रिकाश्रम गये और वहां दतात्रेय जी, मछेनद्रनाथ और शिवजी से मुलाकात की। शंकर जी ने दतात्रेय जी से कहा कि आपकी इच्‍छा नौ नाथों का संघ स्‍थापित करने की थी सो अब इस चरपटीनाथ को नाथ पंथ में शामिल कर अपनी इच्‍छापूर्ति करो।

इस पर दतात्रेय जी ने कहा कि बिना पश्‍चाताप होने तक हमें योग साधना नही होती  इसीलिये हमें पश्‍चाताप होने तक इंतजार करना होगा। नारद जी ने कहा कि आप उसे उपदेश देने की सिद्धता सिद्ध करें।

ऐसा कहकर नारद मुनि सत्‍यश्रवा आश्रम में गये और उनसे कहा कि मैं आपके घर विद्यार्थी बनकर ठहरूँगा। आज से आप मुझे अपना शिष्‍य समझे। इस प्रकार नारद मुनि चरपटीनाथ के साथ रहने लगे।

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एक‍ दिन उन्‍हें अपने गांव में गोद भरवानी थी इसीलिये उन्‍होंने चरपटीनाथ को नौकर के साथ रवाना कर दिया। अपने शिष्‍य कुलम्‍ब को भी सहायता के लिये साथ में भेज दिया। वह संस्‍कार चरपटीनाथ ने विधिपूर्वक संपन्‍न करवा दिया।

इसके बाद जब बनिये ने दक्षिणा दी तो चरपटी नाथ ने लेने से इंकार कर दिया और अपने घर चला आया। इन्‍होंने यजमान से झगड़ा कर अपना नुकसान किया है। सारी बातें सुनकर सत्‍यश्रवा कुपित हुआ और अपनी पूजा कर यजमान के घर पहुँचा।

सारी बातें सुनने के बाद घर आकर चरपटीनाथ को दो-तीन थप्‍पड़ जड़ दिये। बाद में चरपटी नाथ पश्‍चाताप करने को घर से निकल गया और भगवती के मंदिर में जा पहुँचा।

नारद जी भी भेष बदलकर मंदिर में पहुँचे। पहले देवी के दर्शन किये और फिर चरपटीनाथ के समीप गये और कहा कि आप यहां क्या कर रहे हैं।

फिर चरपटीनाथ ने नारद जी को सारी कथा कह सुनायी और कहा कि तुम्‍हारा पिता पागल हो गया है। नारद मुनि ने कहा कि न तुम उनका मुख देखो और न ही अपना मुख उनको दिखाओ। तुम वन में जाकर पश्‍चाताप करो।

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तब चरपटीनाथ ने कहा कि कृपा कर हमारे घर जाकर कुलम्‍ब को यहां भेज दो। तब हम दोनों भाई यहां से कही भी जाकर विद्या अभ्‍यास कर लेंगे।

दोनों साथियों की एक राय होने पर पहले उन दोनों ने बद्रिकाश्रम पहुँच कर बद्री केदार के दर्शन किये और फिर काशी जी में रहकर विद्याभ्‍यास किया।

पर कुछ समय बाद यह विचार चरपटी नाथ को न भाया तो वे बद्री केदार को नमस्‍कार कर विदा लेने पहुँचे और तभी वहां दतात्रेय और मछंदर नाथ प्रकट हो गये। कुलम्‍ब ने उन दोनों के चरणों में माथा टेक कर प्रणाम किया।

फिर कुलम्‍ब ने अपना नाम नारद बताया और बोले कि तेरा काम सिद्ध करने के लिये ही मैंने अपना नाम कुलम्‍ब रखा था। इतना सुन चरपटीनाथ नारद जी के चरणों में गिर पड़े। व दर्शनों की प्रार्थना की।

तब नारद जी ने कहा कि हम तीनों एक साथ प्रकट होकर तुम्‍हें दर्शन देंगे लेकिन बिना गुरू बनाये कोई भी कार्य बेकार है। एक बार जब गुरू मंत्र फूँकेंगे तो सारा संसार ब्रह्ममयी दिखायी देने लगेगा।


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इतना सुनकर चरपटीनाथ ने हाथ जोड़कर नारद जी से कहा कि अब मुझे आपसे उत्‍तम गुरू कहां मिलेगा? इतना सुन नारद जी ने दतात्रेय जी को सूचित किया तब उन्‍होंने आकर चरपटीनाथ के माथे पर अपना वरदहस्‍थ रखा और कान में मंत्र फूँका।

मंत्र कान में पड़ने के बाद चरपटी नाथ का अज्ञान दूर हो गया। उन्‍हें दिव्‍य ज्ञान की प्राप्ति हुई और साक्षात दर्शन तीनों देवों ने दिये और फिर विद्याभ्‍यास करवाकर नाथ पंथ की दीक्षा देकर दतात्रेय ने उन्हें सारी विद्याओं में निपुण बना दिया।

बाद में तप करने को कहा और सांवरी मंत्र की कविता रच सभी देवताओं से आशीर्वाद प्राप्‍त किये। फिर गिरनार पर्वत को होते हुए ती‍र्थयात्रा को गये और अनेकों तीर्थ यात्रा की।

अपनी यात्राओं के दौरान उन्‍होंने अपने काफी शिष्‍य बना लिये।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

इस कहानी को ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयर करें बाबा के सभी भक्‍तों के साथ।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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