Machander Nath Ki Kahani Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कहानी भाग 34|| Machander Nath Ki Katha Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 34

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कहानी भाग 34|| Machander Nath Ki Katha Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 34

Machander Nath Ki Kahani Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कहानी भाग 34|| Machander Nath Ki Katha Bhag 34 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 34

Machander Nath Ki Kahani


एक बाद गुरू गोरखनाथ और संत औधड़नाथ बैठे हुए थे। संत औधड़नाथ गुरू गोरखनाथ से बोले कि सत्‍य है गुरूदेव जब यह सकल ब्रह्माण्‍ड तत्‍वों से ही बना है और उसी में लीन हो जाता है तो वे पदार्थ कौन से हैं जो पहले तो ब्रह्माण्‍ड की रचना करें और समयानुकूल परिवर्तन कर दें।

कृपया आप इसके बारे में विस्‍तार से समझायें। गोरखनाथ बोले कि बेटा औधड़नाथ,  माया से रहित जो निराकार परमेश्‍वर है उसने पहले आकाश की रचना की, फिर अग्नि, पवन, जल, पृथ्‍वी की।

इन पांचों को बुद्धिजीवी तत्‍व कहते हैं। इन्‍हीं से शरीर की उत्‍पत्ति होती है। मनुष्‍य के शरीर में 24 नाडि़यां मुख्‍य होती हैं। इनमें से 10 नाडि़यों का संचालन वायु से होता है। सभी नाडि़यां प्राण वायु के आधार पर बनी हुई हैं।

इन 10 नाडि़यों में से 3 प्रमुख होती हैं। इनके नाम हैं, इड़ा, पिगला और सुष्‍मुणा। स्‍वरों की चाल शुक्‍ल पक्ष में पहले चन्‍द्र पक्ष चलता है। पीछे सूर्य स्‍वर इसी प्रकार कृष्‍ण पक्ष में सूर्य पहले और बाद में चंद्र पक्ष में चलता है।

इस प्रकार दिन रात 24 घण्‍टे में बार बार चलते है। जिस प्रकार शुक्‍ल पक्ष में चंद्र प्रधान होता है उसी प्रकार कृष्‍ण पक्ष में सूर्य प्रधान होता है।

जब सूर्य चंद्र स्‍वर क्रम के अनुसार चलते हैं तो उनके साथ क्रमश: पृथ्‍वी, अग्नि, वायु और आकाश भी चलते हैं। जिस प्रकार स्‍वरों के चलने की चाल भगवान ने बनायी है उसी प्रकार साधना करने वाले का समय एकाग्र होना चाहिये।


साधना करने वाले को चाहिये कि दिन में सूर्य स्‍वर का विचार न करे और रात को चंद्र स्‍वर का विचार न करे क्‍योकि सूर्य के स्‍वर में सूर्य का और चंद्र के स्‍वर में चंद्र का स्‍वर बंद रहता है।

शास्‍त्रों में जिस प्रकार स्‍वरों को चंद्र और सूर्य दो रूपों में विभाजित किया है यदि उदयकाल में चंद्र स्‍वर शुक्‍ल पक्ष में हो तो महान कार्य की सिद्धियों से शुभ फल की प्राप्ति होगी।

रविवार, सोमवार और मंगलवार को सूर्य स्‍वर महान फलदायक होता है। स्‍वरों की साथ तत्‍वों की चाल प्रत्‍येक स्‍वर की चाल एक-एक घण्‍टे की होती है।

इसी प्रकार प्रत्‍येक तत्‍व अपने क्रम से आधी-आधी घड़ी रहेगा। संक्रांति की चाल जिस प्रकार स्‍वरों के साथ सम्मिलित रहते हैं उसी प्रकार दिन रात में 12 संक्रांतो स्‍वरो के साथ चलती रहती है।

ये संक्रांत इस प्रकार हैं- वृष, कर्क, कन्‍या, वृश्चिक, मकर, मीन, ये तो चंद्र स्वर के हैं और मेष, सिंह, कुम्‍भ, तुला, मिथुन और धनु ये सूर्य स्‍वर के हैं।

यदि सूर्य स्‍वर चलते समय किसी वस्‍तु का विचार किया जाये तो जो बात कभी देखी सुनी न हो उसका भी ज्ञान हो जाता है। यदि चंद्र स्‍वर के साथ किसी वस्‍तु का विचार किया जावे तो दृष्‍टा दृष्‍ट पदार्थ का भी ज्ञान हो जाता है।

शुभ फल क्रिया-

प्रत:काल सोकर उठे तब जिस अंग का स्‍वर चल रहा हो तो उसी अंग की हथेली को अपने मुख से चूमो तो वह दिन बड़ी खुशी से बीतता है।


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लेन-देन विचार-

अगर किसी से कुछ लेना हो या कहीं बाहर जाना हो तो जिस अंग का स्‍वर चलता है तो उसी अंग के हाथ को उठाकर लेन-देन करे या उसी अंग के पैर को आगे उठाकर चलें तो सोचा हुआ मनोरथ सिद्ध होगा। इस प्रकार करने से कोई हानि न होगी और  न ही कोई क्‍लेश।

देश गमन क्रिया-

यदि कहीं दूर देश जाना हो तो चंद्र स्‍वर के चलने पर जाना चाहिये और यदि पास ही जाना हो तो सूर्य स्‍वर के चलने पर जाना चाहिये।

जिस समय चंद्र स्‍वर चलता है उस समय मनुष्‍य अनेकों अपराध सह लेता है और जब सूर्य स्‍वर चलता है तो वह बड़े-बड़े बलवानो को भी काबू में कर लेता है।

इस प्रकार स्‍वर त्रिगुण रूप धारण कर तीनों जनों को धारण किये रहते है। जैसे-जैसे स्‍वर ज्ञान मनुष्‍य को होता जाता है उसे उतना ही शुभ फल का भी ज्ञान होता रहता है।

कार्य के प्रकार-

कार्य दो प्रकार के होते हैं। 1-स्थिर और 2-अस्थिर।  चरइड़ा नाड़ी से सब स्थिर कार्य किये जाते हैं जैसे उदाहरण के लिये अलंकार बनवाना। अपने घरेलू कार्य चंद्र स्‍वर में ही करने चाहिये।

पिंगला स्‍वर के कार्य-

कठिन विद्या प्राप्‍त करना और अधम विद्या सीखना आदि।


सुष्‍मुणा स्‍वर के कार्य-

जब स्‍वर बार-बार बदलता दिखे उस समय सुष्‍मुणा नाड़ी को बदला हुआ जानना चाहिये। इस स्‍वर के चलते समय जो भी कार्य किया जायेगा वह निष्‍फल हो जावेगा।

निष्‍फल स्‍वर-

यदि सूर्य स्‍वर ऊपर की ओर या दाये बाये स्‍वर तिरछे चाल करे तो वह कार्य निष्‍फल हो जाता है। इस स्‍वर में फल की प्राप्ति नहीं होती है।

सिद्धि स्‍वर-

बायें स्‍वर के पहले या पीछे दाहिने स्‍वर के पहले या पीछे  क्रिया गुण स्‍वर चलते हो तो उस समय जो विचार किया जायेगा वह सिद्धि की प्राप्ति करेगा। ऐसे समय में किये गये सभी कार्य सफल होते हैं।

दर्पण पर तत्‍व ज्ञान करना-

आइने में अपने मुँह को देखकर उस पर अपनी श्‍वास के द्वारा जो आकार दर्पण पर बने उनसे तत्‍वों का बोध किया जा सकता है। यदि दर्पण पर श्‍वास से चौकोर चिन्‍ह बन जाये तो प्रथ्‍वी तत्‍व, अर्धचंद्राकार बने तो जल तत्‍व, त्रिकोण बने तो अग्नि तत्‍व, गोल बने तो वायु तत्‍व और बिन्‍दु बने तो आकाश तत्‍व का ज्ञान समझो।

श्‍वास से तत्‍वों की पहचान-

यदि श्‍वास नाक के नकुओं के बिल्‍कुल  बीच में चले तो भूमि तत्‍व समझो और यदि नीचे की ओर श्‍वास चले तो अग्नि तत्‍व समझो।

मुख स्‍वाद से तत्‍व विचार-

जब भूमि तत्‍व चलता हो तो मुख का स्‍वाद मीठा हो जाता है और जल तत्‍व के चलने पर मुख का स्‍वाद कसैला हो जाता है।


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श्‍वास के नाम से तत्‍व विचार-

जिस समय नाक श्‍वास आठ अंगुल प्रतीत हो उस समय वायु तत्‍व चलता है।  जिस समय दोनों स्‍वर पूर्ण हो जायें और बाहरी प्रकाश न दिखायी दे उस समय आकाश तत्‍व चलता समझो।

कार्य सिद्धि का समय-

भूमि तत्‍व के समय जो कार्य किया जाता है  वह देरी से सिद्ध होता है। जल तत्‍व में किया हुआ कार्य तत्‍काल फल देता है। अग्नि तत्‍व और वायु तत्‍व में जो कार्य किया जायेगा वह हानिकारक ही होता है। आकाश तत्‍व में किये गये कार्यों से विफलता प्राप्‍त होती है।

तत्‍वों का प्रभाव-

पृथ्‍वी तत्‍व का रंग पीला होता है। यह धीरे-धीरे चलता है। इस तत्‍व से धर्म के सभी स्थिर कार्य किये जाते हैं। इस पृथ्‍वी तत्‍व में सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

वायु तत्‍व का प्रभाव-

वायु तत्‍व हमेशा नीचे की तरफ चलता है। इसकी चाल शीघ्रगामी है और यह तत्व शुभ कार्यों के लिये अच्छा है।

अग्नि तत्‍व का प्रभाव-

यह तत्‍व ऊपर की ओर चलता है। इसका वर्ण लाल होता है। यह अत्‍यंत गर्म होता है। यह तत्‍व क्रूर के लिये श्रेष्‍ठ होता है।

आकाश तत्‍व का प्रभाव-

यह स्‍वर एक ही चाल पर सीधा चलता है और सभी तत्‍वों के गुणों को बढ़ाने वाला है। इस तत्‍व में योगाभ्‍यास किया जाता है।

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तत्‍वों की दिशायें-

पूर्व से पश्चिम तक पृथ्‍वी तत्‍व रहता है जिसके बीच में आकाश तत्‍व का भी निवास है।

तत्‍वों के देवता-

चंद्रमा, पृथ्‍वी और जल तत्‍व का देवता है। अग्नि तत्‍व मे सूर्य देवता है इसीलिये ये दोनो लाभदायक है।

तत्‍वो से सिद्धि का समय-

पृथ्‍वी तत्‍व सदैव दिन मे सिद्धि की प्राप्ति करता है। जल तत्‍व रात में फल देता है। अग्नि तत्‍व में मृत योग बनता है। वायु तत्‍व से क्षयरोग होता है व आकाश तत्‍व से कभी-कभी शुभ फल मिलता है।

दाहिने स्‍वरो से ग्रहो की उपस्थिति-

जिस समय दाहिना स्‍वर चलता हो उसमें अग्नि तत्‍व समावेश हो जाता है। उस समय मंगल ग्रह वर्तमान होता है। दाहिने तत्‍व के चलते समय पृथ्‍वी तत्‍व यदि हो तो उस समय सूर्य ग्रह की वर्तमान स्थिति समझी जाती है। वायु तत्‍व के रहते हुए राहु की स्थिति समझी जाती है।

बाये स्वरो की ग्रहों की उपस्थिति-

जिस समय बांया स्वर चल रहा हो और इसी प्रकार यदि वायु तत्‍व चल रहा है तो बृहस्‍पति की उपस्थिति और जो अग्नि तत्व चल रहा हो तो शुक्र की उपस्थिति समझो।

तत्‍वो का ग्रहों में वास-

पृथ्‍वी तत्‍व में बुध का निवास है। जल तत्‍व मे चंद्रमा का, अग्नि तत्‍व में शुक्र, रवि, मंगल का वास तथा आकाश तत्‍व मे बृहस्‍पति का निवास है।

शरीर में वायु तत्‍व का भाग-

वायु से ही मनुष्‍य चल सकता है। यदि शरीर में वायुतत्‍व कम हो जाय तो सभी तत्‍व किसी काम के नहीं रहते हैं।


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शरीर में आकाश तत्‍व का भाग- आकाश तत्‍व के प्रभाव से ही मनुष्‍य में राग, द्वेष, लज्‍जा, भय और मोह उत्‍पन्‍न होता है। लज्‍जा और भय आकाश तत्‍व से ही हैं। योगी लोग पहले इन्‍हीं दुर्गुणों का त्‍याग करते हैं।

मनुष्‍य शरीर में तत्‍वों का बोध-

जिस समय मनुष्‍य पूर्ण अवस्‍था में पहुँच जाता है उस समय देह में सौ पल पृथ्‍वी का बोझ बढ़ जाता है।

लाभालाभ का समय-

जब मनुष्‍य किसी पदार्थ से लाभ-हानि का विचार करे तो यह देखे कि विचार के वक्‍त कौन से तत्‍व चल रहे हैं। यदि पृथ्‍वी तत्‍व चल रहा हो तो काफी दिनों में लाभ होगा और सभी तत्‍वों में लाभ होगा सिर्फ अग्नि ततव को छोड़कर अग्नि तत्‍व से नुकसान ही होता है।

सिद्धार्थ तत्‍व भेद-

गुरू गोरखनाथ बोले बेटा औधड़नाथ, इन स्‍वरों का ज्ञान करना महा कठिन है। केवल तत्‍वज्ञानी ही इसे समझ सकते हैं।

पृथ्वी स्‍वर के बीज जो चतुष्‍कोण रूप वाला है और सोने के रूप जैसा उसका रंग है। पीली ही जिसकी शांति है।

स्‍वरों की सहायता-

जिस मनुष्‍य को स्‍वरों का ज्ञान है उसको किसी भी धन की आवश्‍यकता नहीं है। जो मानव स्‍वर ज्ञान से चलता है उसके पास लक्ष्‍मी दौड़ी चली आती हैं। लोभ और मोह उसके आस-पास भी नहीं भटकते हैं।

Guru Machander Nath Ki Katha || गुरू मछेन्‍द्रनाथ की कथा || Baba Machander Nath Ki Kahani || Machander Nath Ki Kahani Bhag 34


यह सुन औधड़नाथ बोले कि गुरूदेव प्राण में वायु कैसे स्थित है? क्या शरीर प्राणरूप है? शरीर में प्राणवायु अ‍थवा तत्‍वों का संचार कैसे होता है?

यह सुन गोरखनाथ बोले कि यह काया प्राणी की एक प्रकार की नगरी ही है। जिसके बीच में प्राणवायु रहती है।

प्राकृतिक स्‍वरों का प्रमाण-

ईश्‍वरीय नियमों के अनुसार प्रमाण 18 अंगुल ही रहता है।

नाडि़यों की प्रधानता-

पुरूष अंग में दाहिनी ओर और स्‍त्री अंग में बांयी नाड़ी की प्रधानता होती है। इसकी नौ प्रकार की तीन गति हैं। इसीलिये युद्ध के समय में कुम्‍भक नाड़ी द्वारा ही युद्ध जीता जाता है। सदैव कुम्‍भक नाड़ी से ही युद्ध प्रारंभ करना चाहिये।

युद्ध के घातक प्रश्‍न-

किसी राजा का भेजा हुआ दूत यदि वाम स्‍वर या दक्षिण स्‍वर में बैठकर प्रश्‍न करे और यह पूछे कि राजा के शरीर में कहीं चोट तो नहीं आयी? तो कह दो कि अभी तक तो कोई चोट नहीं आयी और राजा विजय प्राप्‍त कर वापिस आने वाला है। युद्ध की चढ़ाई के समय का फल स्‍वर शास्‍त्र कहते हैं कि जिस पर स्‍थायी तौर पर चढ़ाई की जाती है वह महापापी कहलाता है।

युद्ध की उपक्रिया-

युद्ध करने वाला शूरवीर जब युद्ध करने के लिये रणक्षेत्र में खड़ा हो तो पहले यह देखे कि उस समय कौन सी नाड़ी का स्‍वर चल रहा है।


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युद्ध की दिशायें-

युद्ध को जाते समय युद्ध करने वाले वीर की बांयी नाड़ी का स्‍वर चलता हो तो जिस मनुष्‍य पर चढ़ाई की गयी है उसकी विजय होगी और  खुद को शत्रु के कब्‍जे में रहना पड़ेगा।

दोनों प्रश्‍नों का एक साथ उत्‍त्‍र- यदि शून्‍य स्‍वर में पीछे आने वाले ने प्रश्‍न किया तो पीछे वाले प्रश्‍नकर्ता की जीत होगी।

युद्ध की गति-

जो शूरवीर पूर्ण स्‍वर के चलते समय युद्ध को जाता है उसका शत्रु समर भूमि में पीठ दिखाकर भाग जाता है। यदि शून्‍य नाड़ी के समय चढ़ाई की जाये तो चढ़ाई करने वाले की रणभूमि मे मृत्‍यु हो जाती है।

प्रश्‍नकर्ता का निषेध-

प्रश्‍नकर्ता के प्रश्‍न करते समय किसी प्रकार का शब्‍द कानो में आ रहा हो और यदि उत्‍तर देने वाले सिद्ध का मन न हो तो और ज्‍यादा अभाव हो रहा हो तो भी उत्‍तर नहीं देना चाहिये।

जुआ प्रश्‍न-

यदि जुआ खेलने वाला अपने स्वाभाविक स्‍वर से वायु की स्‍थापना की जाये फिर उसी जीभ को बाहर निकाले और फिर अन्‍दर ले जाकर ठहरावें तो जुआ खेलना शुरू करने पर उसकी हमेशा जीत होगी।

वशीकरण विद्या-

औधड़नाथ बोले गुरूजी आपने अभी तक नर युद्ध और काल युद्ध आदि अनेकों विषयों का ज्ञान दिया है। कृपा कर अब वशीकरण वि़द्या की भी चरचा कीजीये।

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गोरखनाथ बोले कि बेटा किसी को वश में करने के अनेकों उपाय हैं। अब तुम सूर्य और चंद्र स्‍वरों को ही आकर्षित करो। जो नर या नारी वश में करने की इच्‍छा रखते हो उन्‍हें चाहिये कि स्‍वाभाविक स्‍वर को स्‍त्री स्‍वर में मिलाकर एक रस के जब दोनों स्‍वर मिल जाते हैं तब स्‍त्री पुरूष के वश में और पुरूष स्‍त्री के वश में हो जाता है।

गर्भाधान विधि-

जो भी स्‍त्री ऋतुस्‍नान के चौथे- पांचवे दिन जब पुरूष का सूर्य स्‍वर चल रहा हो और स्‍त्री का चंद्र स्‍वर  हो तो उस समय संभोग करने से जो गर्भ ठहरता है वह निश्चित ही पुत्र होगा।

अंग-भंग संतान योग-

जो मनुष्‍य सूर्य स्‍वर के चलते सुष्‍मणा नाड़ी के योग से नारी को ऋतु दान देता है उस ऋतु दान से जो गर्भ ठहरता है उससे संतान अंगभंग होती है।

संतान योग स्‍वर-

कामनी को ऋतु दर्शन करने के पांचवे दिन बाद जब चंद्र स्‍वर चल रहा होता है यानि तीन, पांच, सात आदि तिथियों में जब पुरूष का रात-दिन स्‍वर चल रहा हो तो उस समय पृथ्‍वी, जल, अग्नि तत्‍व चल रहा हो तो उस समय में संभोग करने से जो गर्भ ठहरेगा वह पुत्र रत्‍न ही होगा।

ऋतु दर्शन समय गर्भ योग-

जिस समय कामनी को ऋतु दर्शन हो जाय उसके चौथे पांचवे दिन दोनो मिलकर संभोग करे तो वध्‍या स्‍त्री भी पुत्र उत्‍पन्‍न करती है।


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गर्भदान समय का योग-

यदि वायु तत्‍व को चलते समय गर्भ रहता है तो बच्‍चा दुबला पतला पैदा होगा और जल तत्‍व में गर्भ रहता है तो बालक बलवान होगा। अग्नि तत्‍व के रहने से गर्भ नष्‍ट हो जाता है और यदि किसी कारणवश ठहर भी गया तो भी बालक की अल्‍पायु में मृत्‍यु हो जाती है। जल तत्‍व के गर्भ में जो बालक रहता है वह धनवान होकर भोग भोगता है और जो वायु तत्‍व गर्भ में ठहरता है वह पुत्री होती है।

तत्‍व बोध का ध्‍येय-

जो मनुष्‍य तत्‍व ज्ञान का ज्ञानी होता है उसे महायश की प्राप्ति होती है। स्‍वरों से बढ़कर कोई ज्ञान संसार में नहीं है। स्‍वर ज्ञान से मनुष्‍य भगवान की प्राप्ति कर लेता है। स्‍वर ज्ञान द्वारा मानव अनेको भोग भोगकर मोक्ष पाता है। स्‍वरों का यह महान गढ़ज्ञान सबसे पहले शिवजी ने पार्वती जी को सुनाया था।

स्‍वरो द्वारा देश विदेश की यात्रा सुखपूर्वक की जाती है। स्‍वर जानने वाले मनुष्‍य का वचन बिल्‍कुल भी गलत नहीं होता है। स्‍वरों का बोध करने से मनुष्‍य सदाचारी और सत्‍यवादी हो जाता है। अर्थ, काम, मोक्ष ये सब स्‍वर ज्ञान से ही प्राप्‍त होते हैं।

जो मनुष्‍य स्‍वर ज्ञान और तत्‍व ज्ञान का अभिलाषी होता है वही इन दुर्लभ पदार्थेां के पा सकता है। सारा संसार उनके अनुकूल हो जाता है। यह स्‍वर ज्ञान और तत्‍व ज्ञान जानना हर मनुष्‍य को अपना ध्‍येय बनाना चाहिये तभी इस संसार का कल्‍याण संभव हो सकता है।


बीसा यंत्र-

बीसा यंत्र को तांबे के पत्र पर खुदवा लें और फिर सूर्योदय के समय इस मंत्र को केसर युक्‍त चन्‍दन से पूजन करके —-ओम श्री ह्वी कली लक्ष्‍मी देव्‍यै: नम:—- इस मंत्र की 20 माला जपकर श्री सूक्‍त का पाठ करे तो शीघ्र ही लक्ष्‍मी जी की कृपा होती है।

श्री महाविजय यंत्र-

इस यंत्र को शुद्धता पूर्वक भोज पत्र पर लिखकर हवन पूजन करके यंत्र को अपने पास रखने से युद्ध में सफलता मिलती है। स्‍त्री के पास रखने से वह पुत्रवती होती है। बांझ का बांझपन दूर हो जाता है। बैरी लोग मोहित हो जाते हैं।

तिजारी यंत्र-

इस यंत्र को अष्‍टगन्‍ध से भोजपत्र पर लिखकर भुजा में बांधे ता तिजारी दूर हो जाती है।

शीतला यंत्र-

इस यंत्र को शीतला वाले बालक के गले में बांधें तो शीतला रोग चला जाता है।

रोग निवारण यंत्र-

इस यंत्र को रविवार के दिन पुष्‍प नक्षत्र में अष्‍टगन्‍ध से भोजपत्र पर लिखकर मूगल की धूनी देकर गौर भैंस के गले में बांधें तो रोग खत्‍म हो जाता है।

कार्य सिद्ध यंत्र-

इस यंत्र को आक के रस से लिखकर वन में गाढ़े तो मनचाहा कार्य सिद्ध होगा। दूसरा यंत्र है कि इसको पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर लिखे तो मन चाहा कार्य हो जायेगा।

Guru Machander Nath Ki Katha || गुरू मछेन्‍द्रनाथ की कथा || Baba Machander Nath Ki Kahani || Machander Nath Ki Kahani Bhag 34



गमन आगमन यंत्र-

इस यंत्र को बीच की अंगुली से लिखें तो परदेस गया हुआ आदमी शीघ्र ही लौट आयेगा।

भय गमन यंत्र-

इस यंत्र को तिकोने कपड़े पर लिखकर बालक के गले में बांधे तो उस बालक को भय नहीं लगेगा।

नजर अंदाज यंत्र-

इस यंत्र को तांबे के पत्र पर लिखकर बालके के गले में बांधे तो उसे नजर नहीं लगेगी।

विदेशी आगमन यंत्र-

इस यंत्र को सड़क की धूल से कागज पर लिखे और उस पर कोड़ा मारे तो विदेश गया मनुष्‍य उल्‍टा लौट आयेगा।

दर्द नाशक यंत्र-

इस यंत्र को अनार के रस से लिखकर कान में बांधे तो दर्द जाता रहेगा।

कण्‍ठ रोग निवारण यंत्र-

इस यंत्र को सफेद कागज पर लिखकर गले में बांधें तो कण्‍ठ का रोग जाता रहता है।

सर्प निवारण यंत्र-

इस यंत्र को माल कांगनी के रस से भोजपत्र पर लिखकर घर में रखें तो सर्प नहीं आयेगा।

पिचासी का मंत्र-

भूत पिशाच यक्ष्‍णी चामुण्‍डा सभी को सिद्ध करने वाला है। इसे भोजपत्र पर लाल चंदन से 108 बार लिखकर अलग-अलग टुकड़ों पर उसका नाम लिखकर गंगा नदी में छोड़ो जिसको वश में करना हो।



मनोकामना सिद्ध यंत्र-

इस यंत्र को दीपावली के दिन पूजन में रखकर इसकी पूजा उसी प्रकार करें जैसे लक्ष्‍मी गणपति की करती है। फिर बिक्री के बक्‍स में रखकर रोज दर्शन करे तो सारी मनोकामना सिद्ध होती है।

पन्‍द्रह का यंत्र-

ह यंत्र बड़ा टेढ़ा है। इसे गुरूजी ने बड़ी मुश्किल से बताया है। पहले पवित्र होकर अनार के पत्‍ते पर कत्‍थे की स्‍याही नीम की कलम से प्रतिदिन बीस बार लिखे और फिर गंगा में पवित्र कर बाजू में व गले में बांधें तो अनगिनत संपदा हो जावे।

गर्भवती कष्‍ट निवारण यंत्र-

 यंत्र भोज पत्र पर गंगा जल के छींटे देकर जिस भी गर्भवती स्‍त्री को पिला दोगे तो उसे बच्‍चा जन्‍मने में कष्‍ट नहीं होगा।

चौतीस का सिद्ध यंत्र-

इस यंत्र को चौतीस बार अष्‍टगंध से लिखकर परी का ध्‍यान कर एक मंत्र अपनी भुजा में बांधकर तैंतीस अपनी चारपाई के नीचे गड्ढा खेद कर दाब दें तो रात्रि के पिछले पहर में आकर पैर दबाये व  गणेश जी की मूर्ति का पूजन करे।

उपका यंत्र-

जो लॉटरी जीतने के काम के लिये काले कौवे के पंख जो अपने आप गिरे हो मंगलवार के दिन तलाश कर लावें और केसर छिड़क कर यंत्र का पूजन करे और उसी कलम से पहेलिया भरे इस ताबीज को बाजू में बांधे तो अवश्‍य इनाम मिलेगा।


गणेश यंत्र-

इसको अपनी बाजू में बांधे और कार्तिक माह मे अमावस्‍या को 15 बार जपकर गणेश की मूर्ति का पूजन करे तो मुख से मांगी बात पूरी हो जावेगी।

ओम नमो: हस्‍य मुखय लम्‍बोदराय उच्चिष्‍ट महानते क्रे: क्रो: ही वे वे उच्चिष्‍ट स्‍वाहा यह मंत्र सवा महीने 15 बार पढ़ें।

पिचासी का यंत्र-

यह यंत्र मायावी है। इस यंत्र को कबूतरी के रक्‍त से 85 बार भोज पत्र के टुकड़ों पर लिखें और आखिर के लिखे को अपने गले के ताबीज में बंद कर बांधे और घी शक्‍कर का लेप कर नागरमोथा चबा कर जला हुआ कोयला मुख में रख ले तो मुंह नहीं जलेगा।

मृतक आत्‍मा से बातें-

यह 111 का जादुई मंत्र जिस भी मृतक आत्‍मा से बातें करनी हो तो इस यंत्र को 111 बार भोज पत्र के टुकड़ों पर लाल चंदन से लिखकर हिना, इत्र की लौ में एक-एक दिन में एक-एक टुकड़ा दिये में जलावें तो जिस आत्‍मा का ध्‍यान कर सोवे तो स्‍वप्‍न में उसी से बाते हो जावे।

आधा शीशी दर्द दूर करने का यंत्र-

इस यंत्र को रविवार के दिन चंदन से लिखकर गले में बांधे तो आधा शीशी का सिर दर्द दूर हो जाता है।



65 का यंत्र-

काले कौवे की जुबान को कड़वे तेल में जलाकर उस व्‍यक्ति की आंखों में अंजन लगाये जो उल्‍टा पैदा हुआ हो। वह मंत्र को भोज पत्र पर लिखकर बाजू में बांधे तो गढ़ा हुआ धन दिखायी देगा।

सावरी मंत्र-

इस यंत्र को भोजपत्र के अलग-अलग टुकड़ों पर 21 बार लिखकर अपने घर में दबाये और एक चॉंदी के ताबीज में बन्‍द करके जिस मुर्दे के मुख में रख दोगे वह तीन मिनट तक उठकर बोलेगा।

सिद्ध बीसा यंत्र-

इस यंत्र को बीस बार ही लाल चंदन से भेजपत्र पर अनार की कलम से बीस टुकड़ों पर लिखे। एक टुकड़ा तांबे के ताबीज में भर कर अपने बाजू पर बांधे और 19 टुकड़े स्‍वच्‍छ सरोवर में विसर्जन करने के बाद पैर के तलुवे में कपूर और नौसादर को पानी में पीसकर मलें और दहकते अंगारों पर चलें तो पैर नहीं जलते हैं।

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आपको यह कहानी कैसी लगी यह बात कृपया कर कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। बाबा मछेन्‍द्रनाथ ( Machander Nath) आप सभी की मनोकामना पूर्ण करेंं।

इस कहानी को ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयर करें बाबा के सभी भक्‍तों के साथ।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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