Machander Nath Ki Kahani Bhag 6 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 6 || Machander Nath Ki Katha Bhag 6 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 6

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 6 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 6 || Machander Nath Ki Katha Bhag 6 || मछंदर नाथ की कथा भाग 6

Machander Nath Ki Kahani Bhag 6 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 6 || Machander Nath Ki Katha Bhag 6 || मछंदर नाथ की कथा भाग 6

Machander Nath Ki Kahani


मछंदर नाथ  (Machander nath) हनुमान जी को राम राम कर हिंग्जाल देवी के दर्शन को गये। जहां ज्‍वाला देवी, भगवती, अदीप्त शक्तियां हैं। मछंदर नाथ वहां जा पहुँचे। जब मछंदर नाथ देवी द्वार पर  दर्शनों को गए तो दरवाजे पर मघप्रतापी अष्‍टभैरव को खड़े पाया।

उसने योगी को देखते ही पहचान लिया कि सावरी मंत्र के प्रभाव से नागपक्ष अवस्‍था में पेड़ के नीचे सभी देवताओं को वशीभूत कर वरदान प्राप्‍त किये हैं। इसीलिये भैरव अपना भेष बदलकर खड़ा हो गया और योगी से बोला कहां जा रहे हो?

योगी ने कहा कि मेरी इच्‍छा देवी दर्शन की है। हम यहां पर द्वारपाल हैं और अन्‍दर जाने वालों के पाप पुण्‍य की परीक्षा कर पूर्णवान को ही भीतर जाने देते हैं। इसीलिये आप अपने पाप पुण्‍य की परीक्षा देकर ही अन्‍दर जाना। आपने जितने भी पाप पुण्‍य किये हैं उन्‍हें बता कर ही अन्‍दर जा सकते हैं।

मछेन्‍द्र, भैरव का भाषण सुनकर बोले जो पाप पुण्‍य मुझसे हुए हैं वे भगवान के लिये हुए हैं। मैं पुण्‍य पाप से कोसों दूर हूँ। अष्‍ट भैरव बोले आपने कैसा ही दुष्‍कर्म किया या नहीं किया इसीलिये सच सच बता कर ही भीतर जाओ फिर देवी मां दर्शन देगी। तब मछंदर नाथ बोले कि मैंने संसार के सारे प्राणियों पर शासन करने के लिये ही जन्‍म लिया है।

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योगी की ऐसी बातें सुनकर अष्‍टभैरव क्रोध में आपे से बाहर हो तीर, तलवार, भाला, धनुष और गदा ले युद्ध के लिये तैयार हो गए। मछंदर नाथ  (Machander nath) ने दत्‍तात्रेय जी की जय बोलकर हाथ में भस्‍मी लेकर गुप्‍त मंत्र पढ़ा और बोले- मेरे मित्र वारुणी देव मेरे कार्य सिद्धि को तैयार हो जाओ। मैं आप सबको हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।

इस तरह सबको आमंत्रित कर चारों दिशाओं में भस्‍मी फेंकी और फिर वज्रपंजर का प्रयोग कर भभूति को अपने शरीर पर मल लिया। अब योगी का शरीर वज्र सदृश हो गया। अब उन्‍होंने अष्‍ट भैरव से कहा युद्ध के लिये तैयार हो जाओ। जो अब पीछे हटेगा उसको अपने माता पिता की सौगन्‍ध।

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इतना सुन क्रोध में आकर अष्‍ट भैरव ने मछंदर नाथ  (Machander nath) पर वार करना शुरू कर दिये। लेकिन योगी को कोई भी जख्‍म नहीं हुआ। वह उन्‍हें तिनके के समान प्रतीत हुआ। फिर उन्‍होंने वासव शक्ति का प्रयोग किया जिससे त्रिलोक कांप उठा। तब देवी भगवनी ने पता करने के लिये अपनी दासियां भेजीं।

प्रलय के समान दृश्‍य देख अस्‍त्रों शस्‍त्रों का प्रयोग किया। लेकिन मछेनद्रनाथ के समक्ष् सभी असफल रहे। मोहिनी अस्‍त्र को अपनी योजनानुसार प्रयोग किया जिसने गुप्‍त रूप से दासियों के शरीर में प्रवेश कर उनको भ्रम में डाल दिया।


अब दूसरे चमत्‍कार द्वारा विद्या गौरव अस्‍त्र का प्रयोग किया। तब सभी दासियों ने अपने अपने वस्‍त्र आसमान में उडा दिये और नग्‍न अवस्था में हो गईं। फिर माया अस्‍त्र का प्रयोग कर हजारों की संख्‍या में पुरूष निर्माण कर उनके सामने खडे कर दिये और स्‍मरण अस्‍त्र के प्रयोग से सभी दासियों को जागृत किया।

अब दासियों ने देखा कि हजारों की संख्‍या में हमारे सामने पुरूष खडे हैं और हम सब वस्‍त्रहीन हैं। इतना समझते ही सभी नारियां लज्जित हो जंगल में चारों ओर छिपने लगीं। कुछ ने भागते हुए रास्ते में बेहोश पड़े अष्‍ट भैरव को देखा तब वे उल्‍टी लौटकर देवी के पास पहुँची।

उनकी यह अवस्‍था को देखकर देवी को बड़ा कष्‍ट हुआ फिर उन्होंने पूछा कि तुम्‍हारी यह दशा कैसे हुई?

दासियां बोलीं की कुछ पुण्‍य शेष थे इसीलिये लाज लुटते-लुटते बच गई। यहां एक योगी आया हुआ है और उसने ही हमारी यह दशा की है। उसी ने ही भैरव को भी बेहोश कर दिया है। आप जल्‍दी से भागो वरना वह आपको भी कुछ कर सकता है।

दासियां देवी को समझा ही रहीं थीं कि सामने से योगी आता हुआ दिखाई दिया। इस प्रकार सभी दासियों की यह दशा देख देवी भगवती को काफी कष्‍ट हुआ। तब देवी ने उसको अन्‍तर्द्रष्टि से देखा और तब उन्हें मालूम हुआ कि कवि नारायण ने ही मछंदर नाथ  (Machander nath) नाम से अवतार लिया है।

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तब देवी ने अपनी दासियों को पहनने के लिये वस्‍त्र दिये और उनको साथ लेकर योगी के समीप गईं। उन्‍होंने बेटा कहकर उसके सिर पर अपना हाथ रखकर प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया। देवी माता ने योगी को अपनी गोद में बैठाकर कहा, धन्‍य है तुम्‍हारे प्रताप को।

अब तुम्‍हें क्षमा प्रदान कर उसे होश में लाना है। तभी योगी ने वाताकर्षण अस्‍त्र निकाला और तब वहां अष्‍ट भैरव वहां आकर गौर से देखने लगा कि देवी योगी को लिये अपनी गोद में बैठी हैं। तब अष्‍ट भैरव के सामने योगी की देवी ने प्रशंसा की और कहा कि नाग अश्‍वत्‍थ के वट के नीचे सब देवताओं ने प्रसन्‍न हो इन्‍हें आशीर्वाद दे रखा है।

फिर देवी ने योगी से कहा कि बेटा मुझे तुम्‍हारा पराक्रम देखने की ख्‍वाहिश है। मैंने सुना कि तुम पहाड उड़ा कर वापिस उसी स्‍थान पर रख सकते हो। क्‍या मुझे अपनी करामात दिखा सकोगे? देवी की याचना सुनकर वातास्‍त्र की योजना कर मंत्र पढ़कर भस्‍मी पर्वत पर फेंकी तो पहाड़ आकाश में उड़ने लगा। देवी ने प्रशंसा की।

अब योगी ने वायु अस्‍त्र का प्रयोग किया तो पर्वत को नीचे अपने स्‍थान पर पहुँचा दिया। योगी की करामात देख देवी को संतोष हुआ। फिर देवी योगी को अपने स्‍थान पर ले गई। यहां वह तीन दिन तक रहे और जाते समय देवी ने खुश होकर स्‍पर्शास्‍त्र और भिन्‍नास्‍त्र दो शस्‍त्र प्रसाद स्‍वरूप योगी को दिये। योगी ने देवी को नमस्‍कार कर देवी से अस्‍त्र ग्रहण कर वहां से चल पड़े।


बेताल की हार


हिग्‍लाज देवी के दर्शन करके योगी चलकर बाराहामल्‍हार नाम के वन में गए और वहां के गांव में जाकर एक मंदिर में शांति से सो गए।  रात के दूसरे पहर में उन्‍हें एक जोरदार आवाज सुनाई दी।

योगी ने सोचा कि मुझ पर भूतों ने आक्रमण कर दिया है। इस प्रकार योगी ने स्‍पर्शास्‍त्र की योजना बनाकर अस्‍त्र की शक्ति के प्रभाव से सभी भूतों को स्थिर कर दिया। सारे भूत पेड़ों के समान तनकर सीधे खड़े हो गये। वे अब बेताल से जाकर नहीं मिल सके।

इधर बेताल ने देखा कि सभी भूत आज क्‍यों नहीं आये? फिर उसने 5 से 6 भूतों को पता लगाने के लिये भेजा। जब वे शर्माकर नदी के किनारे आकर अपने जाति के भाईयों की दुर्दशा को देखते हैं तो उनसे पूछते हैं कि क्या हुआ? तो उन्‍होंने बताया कि वहां एक योगी आया हुआ है। जब उन्‍होंने उसे देखा तो वे योगी के पास में गये और अपने सभी भाईयों को छोड़ने की विनती की।

इस पर योगी ने कहा कि मैं इन्‍हें नहीं छोड़ूंगा। मुझे बेताल की बहादुरी भी देखनी है। उसकी बात सुनकर सभी भूत वापस बेताल के पास जाकर बोले कि वहां पर एक सिद्ध योगी आ पहुँचा है जिसने शरभा नदी के किनारे सभी भूतों को रोक रखा है। भूतों की बातें सुनकर बेताल ने विश्‍व भर से भूतों की सेना बुलायी और बेताल ने उन्‍हें सारी हकीकत बताई।

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अब बेताल अपनी भूतों की सेना लेकर शरभा नदी के किनारे जा पहुँचा और युद्ध शुरू कर दिया। अब योगी ने भस्‍मी को आमंत्रित करके अपने पास रख लिया और भूतों की करामात देखने लगे। अब योगी ने वज्रास्‍त्र मंत्र पढ़कर अपने चारों ओर लक्ष्‍मण रेखा की तरह एक लकीर खींच ली जिससे कोई भूत उसके पास न आ सके।

उन भूतों ने बुरी तरह से योगी पर वार करना शुरू कर दिया पर योगी पर उनका कोई असर नहीं हुआ। लेकिन योगी ने स्‍पर्शास्‍त्र छोड़कर सभी भूतों को जहां का तहां ही खड़ा कर दिया।

फिर योगी ने अपनी चतुराई से वज्रास्‍त्र को सिद्ध कर सभी दिशाओं में छोड़ दिया। यह युद्ध 12 घण्‍टों तक चला परंतु दानवों ने उनको खोखला कर दिया और वे हारकर रूपेश हो गए। योगी ने वासव शक्ति का प्रयोग कर बेताल को भी मूर्छित कर दिया। जब उसके प्राण संकट में आये तब वह अपना अभिमान छोड़कर योगी की शरण में जा पहुँचा।

वह हा‍थ जोड़कर कहने लगा कि आप मेरी जान छोड़ दीजिये। हम सभी संसार भर में आपका यश गायेंगे। आप जब भी कोई भी कार्य करने को कहेंगे तो उस कार्य को हम पूरा करेंगे। जिस प्रकार यम के पास यमदूत रहते हैं व भगवान विष्‍णु के पास विष्‍णुदूत रहते हैं उसी प्रकार हम आपके सदैव साथ हैं।


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अगर हम वचन भंग करेंगे तो अपने पुरखों को नरक कुण्‍ड में भेजने का पाप करेंगे। बेताल की प्रार्थना सुन योगी बोले कि सावरी मंत्र विद्या पर मेरा अधिकार है इसलिये जो मंत्र जिस तरह का है उसी तरह से जपने वाले की आज्ञा पर कार्य करोगे और सिद्धि होने पर मंत्र सिद्ध होना चाहिये। योगी का वचन सभी भूतों ने खुशी खुशी मान लिया।

उसी तरह उनका भक्‍त कौनसा है यह भी उन्‍हें समझा दिया। बेताल ने योगी की सभी बातें मान लीं। प्रेरक अस्‍त्र की योजना कर उन्‍हें छोड़ दिया। उसके बाद सभी ने योगी के चरणों को नमस्कार कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।

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