Machander Nath Ki Kahani Bhag 7 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 7 || Machander Nath Ki Katha Bhag 7 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 7

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 7 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 7 || Machander Nath Ki Katha Bhag 7 || मछंदर नाथ की कथा भाग 7

Machander Nath Ki Kahani Bhag 7 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 7 || Machander Nath Ki Katha Bhag 7 || मछंदर नाथ की कथा भाग 7

Machander Nath Ki Kahani


मछंदर नाथ ने वारामल्‍हार पवित्र स्‍थान पर अष्‍टभैरवों को विश्‍वास दिलाकर देवी से प्रसाद प्राप्‍त किया और कुमार देवता की तीर्थ यात्रा पर कोंकण के कुडाल प्रति के अडूल ग्राम में जा रहे हैं। वहां पर काली मां का म‍ंदिर है।

जब वे महामाता के दर्शन करने के लिये गये तो उन्‍होंने देवी का बड़ा कठोर रुप पाया। वहीं शंकर भगवान के कालिकास्‍त्र की स्‍थापना हो रही है। व उसी अस्‍त्र से असंख्‍य दैत्‍यों का संहार किया जा रहा है। तभी शिवजी ने खुश होकर उस अस्‍त्र का वरदान देवी को दिया है।

तभी देवी ने वरदान मांगा कि हे देव, आज मैंने हर एक कार्य आपकी आज्ञानुसार ही किया है। अब आप मुझे आराम करने की आज्ञा दें।

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तब शंकर भगवान ने उसी स्‍थान पर देवी की स्‍थापना करवा दी। इसी के दर्शनों के लिये वहां गुरू मछंदर नाथ गये। तब उन्‍होंने देवी जी से विनती की कि हे माता, मैंने सावर मंत्रों का काव्‍य तैयार किया है। उसमें आपकी सहायता की आवश्‍यकता है। अब आप दया कर वरदान देकर मेरी कविता के गौरव को बढ़ावें।

योगी की प्रार्थना सुन देवी इस प्रकार लाल-पीली होकर बोली जैसे आग में घी की आहुति डाल दी गयी हो। वे बोलीं कि अरे दुष्‍ट, तेरे यहां आने से मुझे काफी कष्‍ट पहुंचा है। मैं यहां एकान्त में निवास कर रही हूँ। और तू कविता निर्माण कर मुझे कष्‍ट पहुँचाना चाहता है। मैं शंकर जी के हाथ का अस्‍त्र हूँ। मुझे जगाने की तेरी हिम्‍मत कैसे हुई?

अब तो तू चला जा अन्‍यथा तेरी खैर नहीं होगी। इस प्रकार की बातें मत कर। सूर्य की रोशनी जिस प्रकार सारे संसार को रोशनी देती है उसी प्रकार अपने प्रताप से सारे जग को मैं वश में कर लेता हूँ।

अरे मूर्ख, तेरी उत्‍पत्ति तक का मुझे पता है। तेरा पिता एक मछुआरा था और मछली पकड़कर अपना पेट भरता था। और तू भूतों और बेतालों को वश में करके आपे से बाहर हुए जा रहा है। लेकिन मैं तेरे वश में आने वाली नहीं हूँ। मैं एक जहर भरा अस्त्र हूँ। तू क्‍यों मेरा दिमाग खराब करता है?


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यह सब सुन योगीराज बोले कि आप शिवजी के साथ साथ रहकर बड़े बड़े पराक्रम दिखनाने का दावा करती हो इसीलिये पहले आप ही मुझे अपना पराक्रम दिखाओ। यह सुनते ही काली शेर पर सवार हो गरजती हुई आकाश में प्रकट हुई।

उस गर्जना में आकाश में शब्‍द सुनाई देते हैं कि हे सन्यासी, अब तू अपने प्राण बचा और गुरू जी को याद कर। जिस प्रकार वज्रास्‍त्र से पर्वत टूटता है उसी तरह से पृथ्‍वी टूटेगी।

यह धमकी सुन योगी ने वासव शक्ति प्रकट की। सूर्य का वासवास्‍त्र और शिवजी का भद्रकालिकास्‍त्र दोनों का आकाश मे युद्ध शुरू हो गया। दोनों अपनी अपनी शक्तियों से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। तब काली ने वासव शक्ति को गिरा दिया और योगी की तरफ दौड़ी।

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योगी ने देवी को माया समझ और भस्‍मी हाथ में लेकर एकादश सध मंत्र सिद्ध कर फेंका। ऐसा करते ही ग्‍यारह रूद्र प्रकट हो गये जो प्रलयकारी और महाभयंकर थे। उन्‍हें देखते ही काली का तेज मंद पड़ गया। तुरंत ही देवी ने सभी रूद्रों को प्रणाम कर भक्तिपूर्वक उनकी स्‍तुति की और तब वहां सब शांत हो गया।

योगी ने वज्रास्‍त्र और भूमास्‍त्र निगल लिया और वज्रास्‍त्र को शैलान्‍द्री नामक पर्वत पर पटक दिया। ऐसा करने से पर्वत के भी टुकड़े-टुकड़े हो गये।

अपने दोनों अस्‍त्रों की ऐसी दशा देखकर योगी ने वाताकर्षण अस्‍त्र छोड़ा। यह अस्‍त्र दत्‍तात्रेय जी ने योगी को दिया था। उसी को सिद्ध करके फेंकने से देवी पर उसका प्रकोप बढ़ गया।

उसी के प्रभाव से देवी बेहोश हो पृथ्‍वी पर आ गिरीं। ऐसी हालत देखकर देव, दानव, असुर और किन्नरों को बड़ा आश्‍चर्य हुआ। जैसे ही देवी जी के प्राणों पर बन आयी तो उन्‍होंने शिवजी का स्‍मरण किया।

जब शंकर जी को कैलाश पर्वत पर यह जानकारी मिली कि यह कार्य योगी द्वारा हुआ है तो शंकर जी बैल पर सवार हो वहां आये। शंकर जी को देखते ही योगी जी उनके चरणों में जा गिरे। फिर शिवजी ने उन्‍हें उठाकर उनकी पीठ थपथपाई।

तब योगी ने शंकर जी से कहा कि यह सब आपकी ही कृपा है। तब शिवजी बोले कि सर्वप्रथम तुम काली को उठाओ। उस पर योगीराज कहते हैं कि पहले आप मेरे सर पर अपना बरहस्‍थ रखिये।


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तब खुश होकर शिवजी बोले कि हे पुत्र अब तुम्‍हें किस वस्‍तु की इच्‍छा बाकी है? जिस प्रकार शुक्राचार्य ने संजीवनी की विद्या कच को दे दी थी उसी प्रकार सावरी विद्या आपने मुझे याद करवाई। उसी को मैंने कविता के रूप में रचा। अब मुझे अपनी दया द्वारा ऐसा वरदान दे कि मैं सदा आपका स्‍मरण करता रहूँ।

पहले काली को जीवनदान देकर उठाओ। आज से मैं उसे तुम्‍हारे सुपुर्द करता हूँ। इस प्रकार की बातें सुनकर अपना सिर शिवजी के पैरों में झुका दिया फिर कलास्‍त्र मंत्र जपकर भस्‍मी फेंकी और वातताकर्षण अस्‍त्र निकाला।

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तब देवी होश मे आयीं और इधर उधर देखने लगीं। जब उनको शिवजी दिखाई दिये तो उनके चरणों में अपना शीश झुकाया। फिर देवी ने कहा कि आपने आज यहां आकर मेरे प्राण बचाये।

फिर शंकर जी देवी से बोले कि जो मैं तुम्‍हे कहता हूँ उसे मान लेना। तुम मेरी शरण में  रह रही हो। आज से तुम मछेन्द्रनाथ की सहायक बनो। इतना सुन देवी मुस्‍कुरा कर बोलीं मैं तो सदैव आपके चरणों की दासी हूँ।

आप मुझ दासी को जहां भी जाने के लिये बोलेंगे मैं वहीं जाने को तैयार हूँ। फिर देवी जी ने योगी को अपने पास बुलाया और विनती कर कहा कि मैं सब तरह से तुम्‍हारी सहायता करूँगी ऐसा मैं तुमको वचन देती हूँ।

योगी और शिवजी को देवी ने तीन दिन अपने यहां रोक के रखा। चौथे दिन शिवजी तो कैलाश पर्वत पर चले गये और मछंदर नाथ गदासी तीर्थ हरेश्‍वर को रवाना हो गये।

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