Machander Nath Ki Kahani Bhag 9 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 9 || Machander Nath Ki Katha Bhag 9 || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 9

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 9 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 9 || Machander Nath Ki Katha Bhag 9 || मछंदर नाथ की कथा भाग 9

Machander Nath Ki Kahani Bhag 9 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 9 || Machander Nath Ki Katha Bhag 9 || मछंदर नाथ की कथा भाग 9

Machander Nath Ki Kahani


अपने द्वार पर अतिथि संत को भिक्षापात्र लिये भिक्षा मांगते देख गृहस्वामिनी अपने घर पर बने सभी प्रकार के भोजन लेकर द्वार तक पहुँची और गोरखनाथ के पात्र को ऊपर तक भर दिया।

भिक्षापात्र देख गुरू गोरखनाथ अलख कहते हुए वहां से चल पड़े। अपने गुरू के आगे सभी प्रकार के भोज्‍य पदार्थ रख दिये। मछेन्द्रनाथ भोजन खाते जाते और हर एक व्‍यंजन की तारीफ भी करते जाते।

इस प्रकार उन्‍होंने सारी सामग्री खा डाली। वे बोले कि भोजन के सभी व्‍यंजन बहुत अच्‍छे थे पर दही बड़े कुछ इस प्रकार थे कि मेरा मन और खाने को कर रहा है।

तो गोरखनाथ चल पड़े और सोचने लगे कि अगर गृह स्‍वामिनी ने इंकार कर दिया तो क्‍या होगा?

गोरखनाथ जी ने दुबारा उसी दरवाजे पर अलख जलाई तो स्वामिनी गुस्‍से में बोली कि पहले वाली से क्‍या तेरा पेट नहीं भरा? यह सुन गोरखनाथ ने सारी बातें उस गृह स्‍वामिनी को बता दीं।

तो स्‍वामिनी ने कहा कि हम जैसों को लूटकर खाना आप जैसों का धर्म है। तो गोरखनाथ ने कहा कि हम झूठी बात नहीं बोलते। तो स्‍वामिनी ने कहा कि झूठ बोलना आपका धर्म है।

गोरखनाथ ने कहा कि माताजी एक बार आप मेरे गुरू की इच्‍छापूर्ति कर दीजिये मैं आपकी हर सेवा के लिये तैयार हूँ।  तो स्‍वामिनी ने कहा कि तू मेरी क्‍या सेवा कर सकता है?


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इस पर गोरखनाथ ने कहा कि माता आप कहकर तो देखिये मैं आपकी परेशानी भी दूर कर सकता हूँ।

तो गृह स्‍वामिनी ने कहा कि मैं जब तक बड़ा लेकर आती हूँ तू अपनी आंख निकालकर मुझे दे देना। इस पर गोरखनाथ ने अपनी आंख निकाल कर दे दीं।

गोरखनाथ ने भगवान महादेव से कहा कि प्रभु आप मुझे यह वरदान दें कि मेरी समस्‍त विधायें ज्ञान से परिपूर्ण हो जायें ओर मैं आपके चरणों का दास बना रहूँ। भगवान शंकर ने कहा कि जो विधाएं तुमने मछंदर नाथ से सीखी हैं वो दूसरी जगह से प्राप्‍त होंगी।

भगवान शंकर से वरदान प्राप्‍त करने पर गोरखनाथ ने अपनी तपस्‍या को सफल समझा और तीर्थ यात्रा को चल पड़े। उसकी मन की इच्‍छा यह थी कि जल्‍दी से गंरू के पास पहुँच का सारी कहानी सुनायें।

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गोरखनाथ घूमते घूमते राजा गोपीचन्‍द की राजधानी जा पहुँचे। उनहें मालूम हुआ कि यहां के राजा ने जालंधर नाथ को कैद कर रखा है।

गोरखनाथ, राजा की माता मैनावती से मिले जो गुणवान और सेविका थीं। गोरखनाथ के बल और ज्ञान पर वह मोहित हो गईं। जब जालंधर नाथ को मुक्‍त कराने की बात कही तो उसने कहा कि मुझे पता नहीं है।

मैं तो अपने बेटे को अपरत्‍व दिलाने में चिंति‍त हूँ। गोरखनाथ अपनी पहली शिष्‍या के वचन सुनकर प्रसन्‍न हुए और तीर्थ यात्रा को चल पड़े।

जब वे नगर के बगीचों के बीच में से होकर गुजरने लगे तो बगीचे में विराजमान राजा कणिफा नाथ ने उन्‍हें देखा।

कणिफानाथ ने उठकर गोरखनाथ का स्‍वागत किया और पूछा कि अपना परिचय बताओगे? तो गोरखनाथ ने कहा कि मैं मछेनद्रनाथ जी का शिष्‍य हूँ और मेरा नाम गोरखनाथ है। इतना सुन बोले कि इस बाग के आम बहुत मीठे हैं।

यदि खाने की इच्‍छा हो तो मंगवाऊँ। तो गोरखनाथ ने कहा कि मुझे ज्‍यादा भूख नहीं है और छोटी सी बात के लिये उन्हें क्‍यों कष्‍ट दिया जावे? इस पर राजा ने कहा कि मैं अपने विद्या बल से यहीं मंगवा देता हूँ।

अपनी विद्या का चमत्‍कार दिखाने के  लिये विसाभ्‍वास्‍त्र के मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित भस्‍म को आम के वृक्षों की तरफ फेंका जिससे पके हुए आम धरती पर टूट कर आ गिरे।

दोनों संतों ने आमों को प्रेमपूर्वक खाया। फिर भी बच गए तो गोरखनाथ बोले कि भाई इन बचे हुए आमों को बासी करने से क्‍या फायदा? इन्हें इनकी जगह पर भेज ही दो ताकि ताजे बने रहें।


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इस पर कणिफानाथ बोले कि भाई अनहोनी बात करने पर क्‍या फायदा होगा? गोरखनाथ बोले, जिस प्रकार टूटने से पहले लगे थे। तो कणिफानाथ बोले आप अपूर्व गुरू के शिष्‍य परिपूर्ण गुरू के शिष्‍य किस प्रकार बन सकते हैं?

गोरखनाथ ने कहा कि मेरे गुरू ने इतना सामर्थ्‍यवान बनाया कि हारने वाला नहीं। कणिफानाथ ने कहा कि वे ही आपके गुरू हैं जो त्रिया राज्य में भोग-विलास में लिप्‍त हैं। उनकी परिपूर्णता की बात किससे छिपी है?

गुरू की बुराई की बातें सुनकर गोरखनाथ ने गुस्‍से में कहा, अपने गुरू की दुर्दशा का भी कुछ पता है? वह बेचारे गौड़ बगल में दबाये हुए गोपीचन्द राजा के यहां गड्ढे में पाट दिये गये हैं।

अगर तुम चमत्‍कार जानते हो तो क्‍या बाहर नहीं निकाल सकते? तुम्‍हें यकीन न हो तो हेलापट्रृटम जाकर अपने गुरू की दुर्दशा देखो।

फिर जब उसने कोई भी उत्‍तर नहीं दिया तो गोरखनाथ ने कहा कि मेरे गुरू की सिखाई हुई विद्या का चमत्‍कार भी देखना चाहते हो तो लो देखो। अभी ये आम जाकर अपनी जगह लटकते हैं।

फिर तो तुम मेरे गुरू को परिपूर्ण मानोगे। कुछ करके दिखाओ तभी आपको जानेंगे। तो गोरखनाथ ने प्रेषशास्‍त्र और संजीवनी मंत्रों से आमों को अपनी अपनी जगह लटका दिया।

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ऐसे अभूतपूर्व चमत्‍कार को देख कणिफानाथ काफी चिंतित हुए। उनको अपनी वार्ता पर काफी ग्‍लानि हुई और वे समझ गये कि मैं गोरखनाथ से विधा बुद्धि में काफी कमजोर हूँ।

गोरखनाथ काफी विद्वान हैं। कणीफानाथ ने अपने वचनों के लिये गोरखनाथ से क्षमा मांगी। उन्‍होंने कहा कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।


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गोरखनाथ की वा‍र्ता सुनकर दोनों संत सम्‍मानपूर्वक गले लगे और कणीफानाथ राजा गोपीचन्द की में अपने गुरू का उद्वार करने को चल पड़े। गोरखनाथ त्रिया राज्‍य की ओर चले गये।

गोरखनाथ सोचते सोचते त्रिया राज्य की सीमा पर जा पहुँचे जहां पर लिखा था कि पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। तो गोरखनाथ एक शिला पर हरि गुणगान करते रहे।

उस रास्‍ते से एक रथ आता दिखाई देता है और जब यह रथ उनके पास आया तो गोरखनाथ ने देखा कि इस रथ मे सभी नारियां हैं। तो उनमें से एक अप्‍सरा नामक सुंदरी से पूछा कि आप कौन हो और कहां से आ रही हो? आप कहां जायेंगी?

यह सुनकर उस सुंदरी ने कहा कि हम महेन्‍द्रगढ़वासी हैं और इस समय हम त्रिया राज्‍य को जा रहे हैं। वहां जाकर हम सभी भजन और कीर्तन व लीला करेंगे।

तो गोरखनाथ ने कहा कि यहां कोई संगीत कला विशारद नहीं है? तो उन्‍होंने उत्‍तर दिया कि क्यों नहीं है? पर सभी की कला अलग-अलग होती है।

फिर गोरखनाथ ने कहा कि माताजी, हम साधु संत हैं हमें व्‍यर्थ की बातों से क्‍या मतलब है। गोरखनाथ की बातें सुनकर महारानी हंसने लगीं।

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हंसते हुए वह बोलीं तुम संत होकर भी त्रिया राज्‍य में जाने की इच्‍छा रखते हो। मैं यह अच्‍छी प्रकार जानती हूँ कि अच्‍छे-अच्‍छे ऋषि और मुनि भी कामदेव का प्रभाव नहीं संभाल पाये।

रानी की बात सुनकर गोरखनाथ बोले कि रानी यह बात सही नहीं है। वे बोले कि मैं तो ब्रह्मचारी हूँ और मुझे तो पेट भरने के दो रोटी चाहिये। मेरी इच्‍छा तो बस वह राज्‍य देखने की है।

गोरखनाथ की बात सुनकर रानी ने सोचा कि इतना सच्‍चा आदमी इस पृथ्‍वी पर मिलना बहुत दुर्लभ है। फिर रानी सोचने लगीं अगर गोरखनाथ हमारे साथ जायेगा तो जायेगा कैसे?

फिर रानी गोरखनाथ से कहती हैं कि उस राज्‍य में पुरूषों का जाना मना है। इस पर गोरखनाथ ने कहा कि इसका क्‍या कारण हो सकता है?


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इस पर सुंदरी ने कहा कि वहां पर पवन पुत्र हनुमान जी की गर्जना होती है जिससे कन्याएं जन्‍म लेती हैं। सुंदरी आगे कहती हैं कि मुझे यहां की जलवायु का ही कोई अंतर दिखाई देता है।

आगे गोरखनाथ कहते हैं कि हनुमान जी सन्‍यासियों की कुछ भी अहित नहीं कर सकते। अगर उन्‍होंने मुझे सताने का प्रयास भी किया तो मैं भी उनका कोई न कोई उपाय कर लूंगा।

यह सुनकर सुंदरी ने कहा कि आप क्‍या कर सकते हो? इस पर गोरखनाथ जी ने बड़ी ही सरलता से उत्‍तर दिया कि मैं स्वयं को अपनी माया से स्‍त्री में बदल दूंगा तो वे मुझे पुरुष नहीं समझेंगे और पहचान भी नहीं पायेंगे।

सुंदरी को योगी की बात में बड़ी रूचि आ रही थी।

वह आगे बोलीं कि तब तो मुझे भी गर्भवती होना होगा। पर हम आपको वहां किस कारण से साथ ले जायें जरा यह भी तो बतायें। तो गुरू गोरखनाथ जी ने कहा कि आप मुझे साजिदा बना कर ले चलें।

तब रानी ने कहा कि जानते भी हो साजिदा किसे कहते हैं? साजिदा उसे कहते हैं जो साज बजाने में दक्ष हो।


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यह सुन योगी बोले कि साज की तो बात ही क्‍या करतीं हैं आप। मैं तो गान विद्या में भी निपुण हूँ। तो यह सुन सुंदरी ने कहा कि आपको अपनी परीक्षा देनी होगी और यह कहकर सुंदरी ने साज को गुरू गोरखनाथ के आगे रख दिया।

गोरखनाथ ने गंधर्व विद्या को अभिमंत्रित कर अपने माथे पर लगाई और इस प्रकार गोरखनाथ ने साज को सभी प्रकार से बजा-बजा कर सुनाया।

इसके बाद उन्होंने अपनी गान विद्या का भी परिचय दिया। उन्होंने साज को महिलाओं को पकड़ाया और साथ-साथ गाना प्रारंभ किया। उन्‍होंने ऐसी मनमोहक प्रसतुति दी कि आकाश के सभी पंक्षी रुककर गोरखनाथ जी का गाना सुनने लगे।

सुंदरी जी गोरखनाथ जी की लीला देखकर बड़ी प्रसन्‍न हुईं। कुछ देर रूककर उन्‍होंने कहा कि त्रिया राज्‍य की मैनाकिनी रानी आपका संगीत सुनकर अत्‍यंत प्रसन्‍न होंगी।

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सुंदरी ने सोचा कि इसे साथ ले जाने से लाभ होगा। वे खुश होकर अपनी सहेलियों के साथ में जाकर रथ पर सवार हो गईं और योगी जी सारथी बनकर रथ हांकने लगे। रथ्‍ अब त्रिया राज्‍य में पहुंच चुका था।

अब सुंदरी ने रथ रोकने का आदेश दिया। सूर्यास्‍त का समय था। सुंदरी ने पहले सभी सहेलियों को साथ में लेकर भोजन किया और फिर सोने की तैयारी की। अंत में योगी जी को दो रोटी देते हुए बोलीं कि अब आप सोने की तैयारी कर लीजिये।

यह सुन गोरखनाथ जी ने कहा कि माता जी नींद तो नहीं आ रही है। हम बैठे-बैठे जागरण भी कर लेते हैं और सो भी लेते हैं। इतना सुन सुंदरी अपनी सहेलियों के साथ खर्राटो के साथ सोने लगीं।

अब गोरखनाथ जी ने सोचा कि अब अपने गुरू को यहां से निकालने का प्रयत्‍न किया जाये। जब हनुमान जी आ जायेंगे तो उन्‍हें राज्‍य की सीमा में प्रवेश ही नहीं करने दूँगा।

इतना कहकर उन्‍होंने मोहनास्‍त्र, बज्रास्‍त्र, प्रक्षेपास्‍त्र, नागारस्‍त्र और स्‍पास्‍त्र के द्वारा ऐसी योजना बनाई कि हनुमान जी त्रिया राज्‍य में आ ही न सकें।


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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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