Machander Nath Ki Kahani Bhag 2 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 2 || Machander Nath Ki Katha || मछेन्‍द्रनाथ की कथा भाग 2 || Machindranath Story In Hindi

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Machander Nath Ki Kahani Bhag 2 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 2 || Machander Nath Ki Katha || मछंदर नाथ की कथा भाग 2

Machander Nath Ki Kahani Bhag 2 || मछंदर नाथ की कहानी भाग 2 || Machander Nath Ki Katha || मछंदर नाथ की कथा भाग 2

Machander Nath Ki Kahani


इधर भगवान दत्‍तात्रेय शिवालय पधारे और शिवजी की उपासना कर महादेव का मन मोहा। इस पर प्रसन्‍न होकर शिवजी ने भुजा भेंट देकर उनका आलिंगन किया और अपने पास बिठाकर एक दूसरे का कुशल-क्षेम पूँछा।

अगले ही पल दोनों बद्रिकाश्रम की रमणीयता देखने के लिये चल पड़े। वे रास्‍ते में धर्म चर्चा कर उसी वन में जा पहुंचे जहां मछंदर नाथ गहरा तप कर रहे थे। जब भाग्‍योदय होता है तो इसी प्रकार कारण बन जाते हैं।

इसी कारण से शिव जी की दत्‍तात्रेय जी के साथ वन विहार की इच्‍छा हुई और दोनों को ही बद्रिकाश्रम की अपार सुन्‍दरता देखकर आनंद हुआ।

भगवान शिव और दत्‍तात्रेय जी वन विहार करते हुए भागीरथी नदी के तट पर घूम रहे थे। तभी अचानक उनकी दृष्टि तप करते हुए मछंदर नाथ पर पड़ी।

कलियुग में किसी को ऐसा कठोर तप करते देखकर दत्‍तात्रेय जी को बड़ा आश्‍चर्य हुआ। फिर एक जगह रूककर शिवजी और दत्‍तात्रेय जी ने मछंदर नाथ के पास जाकर पूँछा कि बेटा तुम किस उद्देश्‍य से यहां तपस्‍या कर रहे हो?


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इस प्रकार मछंदर नाथ (Machander nath) ने आंखें खोलकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोले-

प्रभु मुझे यहां बारह वर्ष तपस्‍या करते हुए बीत गए लेकिन मुझे यहां कोई भी मनुष्‍य नजर नहीं आया। आज अचानक आप ही यहां पधारे हैं। आप क्‍यों पूछ रहे हैं?

पहले आप बतलायें कि आप कौन हैं? आज आपके दर्शन हुए हैं। इतना सुनकर दत्‍तात्रेय जी मुस्‍कुराकर बोले कि मैं अभी ऋषिपुत्र हूँ और सब मुझे दत्‍तात्रेय कहकर ही सम्‍बोधित करते हैं।

अब बेटा तुम्‍हारी जो इच्‍छा हो उसे अपने मुख से कहो। इतना सुन मछंदर नाथ का रोम रोम प्रफुल्लित हो गया। उन्‍होंने विचार किया कि आज मेरी तपस्‍या पूर्ण हो गई है।

इस प्रकार प्रसन्‍नचित होकर अपना मस्तिष्‍क उनके चरणों में झुका दिया। अपने नयनों से प्रेमाश्रु बहाकर ऋषि के चरण धो डाले। अब दोनों हाथ जोड़कर बोले कि हे प्रभु आप तो अंतर्यामी हैं।

ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों का एकरूप ही हैं। परंतु अपने इस दास को आप भूल कैसे गये? अब आप मेरे सभी दुर्गुणों को दूर करने की कृपा करें। ऐसा कहकर वे बार बार अपना मस्‍तक उनके चरणों में रखने लगे।



तब दत्‍तात्रेय जी ने कहा कि-

अब बेटा तुम चिन्‍ता मत करो। तुम्‍हारी मनोकामना पूर्ण होने का वक्‍त आ गया है। इतना कहकर दत्‍तात्रेय ने अपना हाथ बालक के सिर पर फेरा और कान में एक मंत्र फूँका जिससे मछंदर नाथ के सभी अज्ञान का अन्‍त हो गया। अब उसके चारों ओर उसे ब्रह्म नजर आने लगा।

तब बालक मछंदर नाथ से पूँछा कि ब्रह्मा के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है। मेरे आगे-पीछे सिर्फ ईश्‍वर ही ईश्‍वर हैं। मछंदर नाथ का यह वचन और आत्मिक भावना देख दतात्रेय जी हाथ पकड़कर अपने साथ ले गये जहां भगवान शंकर विराजमान थे।

शंकर जी ने उस बालक को शरण दी और उसे सर्व सिद्धि का स्‍वामी बनाने के लिये सर्व रिद्धि सिद्धि की पढ़ाई करवाने का ज्ञान सौंपा। दत्‍तात्रेय जी ने भी सभी विद्याओं का मंत्र उपदेश दिया। अब मछंदर नाथ तीर्थ यात्रा के लिये रवाना हो गए।


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इधर कामिक को इस सब का आभास भी नहीं हुआ था। जब वह दिन छिपने से पहले मछलियां पकड़ कर रवाना हुआ और जल से बाहर निकला तो तट पर मछलियों से भरा टोकरा तो पाया मगर मछंदर नाथ्‍ को वहां नहीं पाया।

पहले तो उसने सोचा कि बालक ही तो है यहीं कहीं खेलकूद कर रहा होगा। लेकिन जब काफी ढूंढने पर भी अपने बेटे को वहां न पाया तो उसका मन उदास हो गया।

अकेले अपने पति को उदास मुखसे मछलियां लादे आता देख सारदत जो कि कामिक की पत्‍नी थी, का माथा ठनका। वह अपने पति से बालक मछंदर नाथ के बारे में पूँछने लगाी कि वह कहां रह गया?

Guru Machander Nath Ki Katha || गुरू मछंदर नाथ की कथा || Baba Machander Nath Ki Kahani ||



यह सब सुन कामिक ने अपनी पत्‍नी को रोते रोते सारी घटना बता दी। उसने मछेन्‍द्र को खेजने और उसे ढूँढने पर भी न मिलने का अफसोस भी जताया। अपने पति के मुख से अपने बेटे के खो जाने की बात सुनकर व‍ि महुत दुखी हो गई।

वह काफी रोयी और चिल्‍लाई। जब उस बेचारी का होनी से कोई बस न चला तो वह अपने पति कामिक को बुरा भला कहने लगी। उसने छटपटाकर पत्‍थर की सिला अपनी छाती पर रख ली। दोनों ही प्राणियों को भा दुख हुआ पर होनी के आगे किसी का बस नहीं चला।

अब मछंदर नाथ जी तीर्थ यात्रा करते हुए सप्‍त जा पहुंचे। उन्होंने पूरे भक्ति भाव से देवी के दर्शन किये और हाथ जोड़कर विनत की कि हे माता-

सावर मंत्रविद्या पूरी तरह मेरी बुद्धि में बैठ गई है। अब उसी को कविता में रचने का मेरा विचार है। ऐसा करने जनता को समझाने में बड़ी ही आसानी होगी।

और यह भी एक सत्‍य बात है कि जब तक मातेश्‍वरी की कृपा न होगी तब तक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। अत: उन्‍होंने वहां देवी का अनुष्‍ठान किया।


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कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में लिखें जय बाबा मछेन्द्रनाथ जी की।

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