माता अंजनी हनुमान जी पर क्‍यों क्रोधित हुईं? || Mata Anjana Hanuman Par Krodhit Kyo Hui? || Why Anjana got angry at Hanuman?

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माता अंजनी (Mata Anjana) हनुमान जी पर क्‍यों क्रोधित हुईं?  Why Anjana got angry at Hanuman? Mata Anjana Hanuman Par Krodhit Kyo Hui?

माता अंजनी (Mata Anjana) हनुमान जी पर क्‍यों क्रोधित हुईं?  Why Anjana got angry at Hanuman? Mata Anjana Hanuman Par Krodhit Kyo Hui?

Anjana Hanuman Par Krodhit Kyo Hui


रामायण में हनुमान जी के पात्र से तो हम सभी भली-भांति परिचित हैं। संपूर्ण रावण सेना पर वे कहर बनकर टूट पड़े थे। रामायण में हनुमान जी के महान कार्यों का वर्णन मिलता है। परंतु कभी आपने यह सोचा है कि महाबली चिरंजीवी हनुमान जी की माता अंजना (Mata Anjana) उन पर भयानक रूप से क्रोधित क्‍यों हुई थीं? चलिये आज इस बारे मे भी जान लेते हैं। Anjana Hanuman Par Krodhit Kyo Hui ?

तो बात तब की है जब लंकेश रावण के अंत के बाद भगवान श्रीराम ने हनुमान से पूछा कि उनकी अनगिनत निस्‍वार्थ सेवाओं के लिए उन्हें कैसे धन्यवाद दिया जाए। यह सुन पहले तो हनुमान जी सोच में पड़ गये पर बाद मे उन्‍होंने उत्तर दिया कि हे मेरे प्रभु श्रीराम जी (Shree Ram), आप तो  मुझे बस अपनी सेवा में ही अपने जीवन के बाकी बचे हुए दिन बिताने का अवसर देने की कृपा करें।”

राम जी (Shree Ram) ने यह अनुरोध बड़े खुश होकर स्वीकार कर लिया। तथा कुछ समय पश्‍चात हनुमान जी भी रथ पर सवार हो गए। इसी रथ से राम और उनके दल को वापस अपने मूल गंतव्‍य स्‍थान अयोध्या नगरी को जाना था।


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और इत्‍तेफाक की बात यह भी थी कि उसी  रास्ते के बीच में हनुमान जी की माता का स्‍थान भी था। अत हनुमान जी ने अपनी माँ अंजना (Mata Anjana) के पास जाने का विचार किया। यह बात उन्‍होंने अपने प्रभु श्रीराम जी (Shree Ram) से भी पूछी तो राम जी ने उन्‍हें इसकी आज्ञा दे दी।

माता अंजना पास ही एक पहाड़ पर रहती थी। राम और उनके दल के अन्य सभी सदस्य भी चिरंजीवी वीर हनुमान जी की माँ से मिलने के लिए उत्सुक थे। और यह सोच विचार करने के बाद रथ को उनके आवास की ओर मोड़ दिया गया।

जैसे ही हनुमान जी अपनी माता अंजनी (Mata Anjana) से मिले तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वे अपने लाल को देखकर अत्‍यंत प्रसन्‍न हुईं। माता ने अपने पुत्र को भारी खुशी से अपने गले लगा लिया। हनुमान जी ने भी माता का चरण स्‍पर्श कर हाथ जोड़कर प्रणाम कर अभिवादन किया।

वहां उपस्थित अन्य सभी लोग भी हनुमान की माँ को श्रद्धा से नमन करते हैं। माता अंजना ने हनुमान जी से राम-रावण युद्ध के बारे में विस्‍तार से बताने को कहा। यह सुनकर हनुमान जी ने युद्ध के मैदान में रावण की मृत्यु के साथ समाप्त होने वाली घटनाओं का क्रमानुसार वर्णन उनसे किया।



पर जो बात हमें सबसे ज्‍यादा चकित कर सकती है वह यह है कि हनुमान जी की बातों को सुनकर उनकी माँ खुश तो नहीं हुई बल्कि वह क्रोधित हो गई और क्रोध में आकर उन्‍होंने हनुमान को संबोधित करते हुए कहा –

“पुत्र, मेरा तुमको जन्म देना व्यर्थ सिद्ध हुआ है। मेरे दूध के साथ आपको पालने पोसने और खिलाने से भी कोई लाभ नहीं हुआ है।”

यह कड़वे व अजीब शब्दों को सुनकर उस सभा मे उपस्थित सभी लोग हतप्रभ होकर दहशत में आ गए। हनुमान जी (Hanuman) ने भी निःशब्द भाव से अपनी माता को देखा।

माता अंजना (Mata Anjana) क्रोध को साथ आगे बोलीं-(Hanuman)

“हे हनुमान, तुम अपनी ताकत और वीरता पर शर्म करो। क्या तुम्‍हारे पास रावण के संपूर्ण शहर को स्‍वयं अपने बूते पर उखाड़ने की पर्याप्त शक्ति नहीं थी? क्या तुम दशानन लंकेश राक्षस और उसकी सेना को खुद खत्म नहीं कर सकते थे?  यदि आप ऐसा करने में सक्षम नहीं थे तो युद्ध में भाग लेने से बेहतर तो यही होता कि आप कम से कम खुद को उससे लड़ने में निपुण बनाते।


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मुझे सत्य में इस बात का अफसोस है कि तुम्‍हारे जीवित रहते हुए भी भगवान श्रीराम को अशांत सागर के ऊपर पत्थरों के खतरनाक पुल का निर्माण करना पड़ा था। क्‍या तुममें इतना सामर्थ्‍य नहीं था कि तुम खुद उन्‍हे लंका पहुँचा देते। वे बड़ी मुश्किल से लंका पहुँचे और राक्षसों की विशाल सेना से लड़े भी।

तुम्‍हारे रहते हुए भी भगवान श्रीराम को अपनी प्रिय सीता को पुनः प्राप्त करने के लिए एक विशाल युद्ध का सामना करना पड़ा। आज तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे  मेरे स्तन ने आपको जो पोषण दिया है, वह निष्फल साबित हुआ है।

अब तुम मेरे सामने से चले जाओ और मुझे कभी अपना मुख मत दिखाना।”

वह स्पष्ट रूप से यह कहना चाह रही थीं कि जब हनुमान (Hanuman) को लंका शहर में सीता की खोज करने के लिए भेजा गया था तो केवल उन्होंने माता सीता के रावण की कैद में होने की पुष्टि की थी। माता अंजना का कहना था कि हनुमान, सीता जी को बचाने के लिए एक औपचारिक लड़ाई शुरू कर सकते थे और रावण को पराजित कर सकते थे।


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भले ही हनुमान जी ने अपनी संक्षिप्त यात्रा के दौरान पूरे लंका शहर को जला दिया और वे इसमें कामयाब भी रहे पर फिर भी श्रीराम को युद्ध लड़ने के लिये कष्‍ट उठाना पड़ा।

अंजना की झुंझलाहट कि भले ही हनुमान (Hanuman) सीता को स्वयं वापस लाने में सर्वोच्च रूप से सक्षम थे पर फिर भी  उन्होंने ऐसा नहीं किया और इसी कारण रामजी को यह कार्य पूरा करने के लिए बाद में बहुत प्रयास करना पड़ा।

यही कारण था कि वह क्रोध से थरथरा रही थीं। बाद मे हाथ जोड़कर हनुमान ने उन्हें संबोधित किया:

“हे मेरी माता अंजना,  मैने इस पूरे प्रकरण मे  किसी भी तरह से आपके दुग्‍ध के पवित्र मूल्य पर कोई समझौता नहीं किया है। मैं तो बस भगवान श्रीराम का एक सेवक हूं जो बस भगवान के दिये गये आदेशों का पालन करता है।

उस यात्रा के दौरान मुझे केवल सीता की खोज करने और रावण को न मारने का निर्देश दिया गया था।”

वास्तव में, हनुमान ने रावण की कैद मे सीताजी से यह पूछा भी था कि क्या वह उसी क्षण उनके द्वारा बचाया जाना पसंद करेंगी? सीता जी ने उनसे मना कर दिया और कहा भी था कि उन्‍हें मुक्त करना उसके पति का कर्तव्य है और श्रीराम को खुद उन्‍हें वहां से वापस ले जाना होगा।


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इस पूरे प्रकरण के बारे मे जब पूरी सभा सहित श्रीराम जी ने हनुमान के संस्करण की पुष्टि की तब जाकर माता अंजना का क्रोध शांत हुआ। पर सच जानने के बाद वे व्‍याकुल हो उठीं कि क्रोध में आकर उन्‍होंने अपने पुत्र को कितना भला बुरा कह दिया। फिर बाद में माता अंजना ने हनुमान जी से प्यार से बात की और कहा –

“प्रिय पुत्र, मैं यह सब सच्‍चाई नहीं जानती थी। परंतु अब जब मैं यह ज्ञात कर चुकी हूँ तो मुझे अब तसल्ली होती है कि मेरे दूध में प्रचुर मात्रा में फल हैं। और मेरा पुत्र महान है जिसने कर्तव्‍य पालन कर भगवान श्रीराम की सेवा व सहायता की।”


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