पुराने जमाने में राजा महाराजा इतनी सारी बीवियों को कैसे संतुष्ट करते थे? Raja Biwiyo ko kaise santusht karte the? 

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पुराने जमाने में राजा महाराजाओं इतनी सारी बीवियों को किस तरीके से संतुष्ट कर पाते थे? Raja Biwiyo ko kaise santusht karte the? 

पुराने जमाने में राजा महाराजा इतनी सारी बीवियों को कैसे संतुष्ट करते थे? Raja Biwiyo ko kaise santusht karte the? 

अगर इस कलयुगी पुरुष में स्त्री की संतुष्टि के प्रति जागरूकता व इच्छा होती, तो आज यह धरती स्वर्ग समान होती।

Raja Biwiyo ko kaise santusht karte the? 
Raja Biwiyo ko kaise santusht karte the?

सभ्यता की ओर बढ़ते कदमों ने नैसर्गिक रूप से पुरुष के तुलनात्मक रूप से बलशाली होने के कारण एक पुरुष प्रधान समाज को जन्म तो दे दिया।

लेकिन वही पुरूष यथासंभव अपनी सारी जिम्मेदारियां पूरी करता हुआ केवल एक इसी जिम्मेदारी को पूरी करने में चूक गया।

स्त्री की संतुष्टि को लेकर वह कभी भी विचारशील नहीं हुआ। बस अपनी आग को शांत करने तक ही सीमित रहा।

अगर उसे स्त्री के इस सुख का थोड़ा सा भी धयान होता, तो अकेली स्त्री ही नहीं पुरुष बच्चे बूढ़ों सहित सारा समाज ही सुखी होता। वह समझ ही नहीं पाया स्त्री की संतुष्टि का सही अर्थ क्या है।

जरूरत तो थी उसकी झील सी गहरी आंखों के जरिए उसके दिल में दस्तक देते हुए भीतर उतरने की। लेकिन वह मूर्ख नादान तो मुलायम चमड़ी के स्पर्श से ही बेहोश होता रहा।



और पागलों की तरह अपने वीर्य की दो बूँद इधर टपकाने में और दो उधर टपकाने में ही अपनी बहादुरी, संतुष्टि व जीवन का अंतिम लक्ष्य समझता रहा।

विडम्बना यह कि खुद तो हमेशा असंतुष्ट ही रहा और स्त्री अपने आप को संभालती चली गई समाज को गतिशील रखने के लिए।

रही बात तथाकथित राजा महाराजाओं की तो कभी समय मिलने पर पंजाब की आजादी से पहले की रियासत पटियाला शहर के राजा भूपेन्द्र सिंह का इतिहास गूगल में पढ़ कर देखिये लेना।

आप खुद ही देखना कि कितना तो उसने अपनी रानियों को संतुष्ट किया और कितना वो खुद संतुष्ट हुआ। अपनी आदतों के चलते वह 41 वर्ष की उम्र में इसी संतुष्टि को प्राप्त करते हुए कुत्ते की मौत मरा।


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