सूर्पणखा का क्या हुआ? || Ramayan Me Surpanakha Ka Kya Hua?

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भगवान राम के लंका विजय के बाद सूर्पणखा का क्या हुआ? Ramayan Me Surpanakha Ka Kya Hua?

भगवान राम ( Lord Rama) के लंका विजय के बाद सूर्पणखा का क्या हुआ? Ramayan Me Surpanakha Ka Kya Hua?  उसने अपना जीवन कहाँ और कैसे व्यतीत किया?

Ramayan Me Surpanakha Ka Kya Hua


क्या आपके मन में कभी यह ख्‍याल आया है कि रामायण के भगवान राम और लंकापति रावण के बीच हुए भीषण युद्ध की मुख्‍य जड़ यानि कि सूर्पनखा का उस युद्ध के समाप्‍त होने के बाद क्‍या होता है?

वैसे तो शूर्पणखा का वास्तविक नाम मीनाक्षी था। उसे अपने नाखूनों को बहुत बड़ा रखने का शौक था। अत:  उसके नाखून बड़े होने के कारण उस का शूर्पणखा उपनाम हो गया था। सुर्पनखा के पिता का नाम विश्रवा ऋषि और माता का नाम कैकसी था। यह कालकेय के पुत्र विद्युज्जह की पत्नी भी थी।

सूर्पनखा (Soorpnakha) के तीन भाई थे। (Soorpnakha’s three brother Ravan, Kumbhkaran and Vivbhishan) )रावण,कुम्भकर्ण और विभीषण। पूर्व जन्म में सूर्पणखा इन्द्रलोक की नयनतारा नामक अप्सरा थी। उर्वशी, मेनका, पुंजिकस्थला और रम्भा आदि प्रमुख अप्सराओं में इसकी गिनती थी।


एक बार की बात है,  नयनतारा इन्द्र (Indra) की सभा में नृत्य कर रही थी। नयनतारा भ्रू भंगिमाओं से अर्थात आंखों से इशारा भी कर रही थी। इस बात पर इन्द्र देव रीझ गए। और तब से ही नयनतारा इन्द्र की प्रेयसी बन गई।

उसी समय पृथ्वी पर वज्रा नामक ऋषि (Vajra Rishi) घोर तपस्या में लीन थे। अब हर बार की तरह इंद्र (Indra) को अपने सिंहासन की चिंता सताने लगी। तब इंद्र ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए नयनतारा को पृथ्वी पर भेजा।



नयनतारा (Nayantara Apsara) अप्‍सरा ऋषि की तपस्‍या भंग करने में सफल तो हो गयी परंतु तपस्या भंग होने पर ऋषि ने उसे राक्षसी होने का श्राप दे दिया। अब तो नयनतारा बस ऋषि से क्षमा याचना करने लगी।

ऋषि ने अप्‍सरा नयनतारा से कहा , ” जा, तू राक्षसी बन जा और उसी रुप में ही प्रभु के दर्शन करेगी “। और ऋषि के श्राप के फलस्‍वरूप वह अब सूर्पनखा नामक राक्षसी बन गयी।

परन्तु त्रेतायुग में एक समय ऐसा भी आया जब उसने राम जी ( Lord Rama) को देखा तो उनके रुप पर मोहित हो गई । और प्रभु श्रीराम ( Lord Rama) को देखकर उसने वैराग्य रुपी लक्ष्मण व भक्ति रूपी सीता की अवहेलना भी की। वह तो बस मर्यादा पुरूषोत्‍तम श्री राम जी को पति रूप में हर हाल में पाना चाहती थी। और अंत में यही  इच्छा उसने व्यक्त भी की।


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जब राम जी ने मना कर दिया तो वह लक्ष्‍मण जी (Lord Laxman) के पास गयी और उनके मना करने पर भी जब न मानी तो लक्ष्मण जी ने क्रोधित होकर सूर्पणखा के नाक कान काट लिए।

जब यह घटना घटी तो उसके ज्ञान नेत्र खुल गए। वह प्रभु कार्य (विनाशाय च दुष्कृताम) में संलग्न हो गयी। कहते हैं कि रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद आदि राक्षसों का विनाश करवाना सूर्पनखा की ही लक्ष्‍य था। इसके बाद वह प्रभु भक्ति के लिए पुष्कर जी में आकर जल में खड़ी हो भगवान शिव की आराधना में जुट गई।

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