रामायण और महाभारत के कॉमन पात्र || Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character || Common Characters In Mahabharata And Ramayana

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रामायण और महाभारत के कॉमन पात्र || Common Characters In Mahabharata And Ramayana || Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character

रामायण और महाभारत के कॉमन पात्र || Common Characters In Mahabharata And Ramayana || Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character

Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character


वैसे तो महाभारत और रामायण में कई पात्र ऐसे हैं जो कि दोनों ही घटनाओं पर उपस्थित थे। ये लोग ऐसे हैं कि अभी भी जीवित ही होंगे।

मार्कण्डेय, बलि, परशुराम, विभीषण, हनुमान, व्यास, अश्वत्थामा एवं कृपाचार्य आदि पात्रों में से कुछ ही आप को पता होंगे। ये सभी अष्‍टचिरंजीवी कहे जाते हैं।

कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में जरूर लिखियेगा कि आपको कितने पात्रों के बारे में पता था।

चिरंजीवी का मतलब क्‍या होता है?           

चिरंजीवी मतलब सदा के लिए जीने वाला नही होता। इसका मतलब कल्प (1000 महायुग या ब्रह्माजी का आधा दिन) के अंत तक जीवित रहने वाले। किन्तु कल्प का समय इतना अधिक होता है (4320000000 वर्ष) कि हम इन्हें अमर कहने लगते हैं।

कल्पान्त में होने वाले प्रलय में सबका अंत होता है और ब्रह्मा जी नई सृष्टि की रचना करते हैं।

(व्यास, कृप एवं अश्वत्थामा), जो कलियुग तक जीवित हैं उन्हें भी नही जोड़ रहा। मनु एवं सप्तर्षियों को भी नही जोड़ रहा क्योंकि इनकी आयु देवताओं से भी लंबी है। बस भीष्म के संदर्भ में सप्तर्षियों का वर्णन मात्र है। देवर्षि नारद, बृहस्पति और शुक्राचार्य को भी नही जोड़ रहा हूँ।

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तो चलिए अब आरम्भ करते हैं।

हनुमान:

हनुमान जी की शुरूआत त्रेता युग से होती है। त्रेतायुग में तो इनके अनेको वीरता के किस्‍से और सच्‍ची कहानियों से आप परिचित ही हैं। इनकी प्रशंसा से पूरा रामायण भरा है।

द्वापरयुग की बात करे तो यहां भी वे भीम और अर्जुन का घमंड तोड़ते नजर आते हैं। श्रीकृष्ण भी इनके द्वारा ही बलराम, गरुड़, सुदर्शन चक्र और सत्यभामा का अभिमान भंग करवाते हैं। कलियुग में इनके तुलसीदास को दर्शन देने का वर्णन है।

परशुराम:

परशुराम जी को कौन नहीं जानता? ये वही व्यक्ति हैं जो शिवधनुष के टूटने पर श्रीराम पर अत्‍यंत क्रोधित हुए थे। ये भी त्रेता युग के ही व्यक्ति हैं। त्रेता में ही माता सीता के स्वयंवर में उनकी भेंट श्रीराम से होती है।

द्वापरयुग में वे भीष्म से युद्ध करते हैं। और तो और भगवान श्रीकृष्ण को भी सुदर्शन चक्र परशुराम से ही प्राप्‍त होता है।

ऐसा कहा जाता है कि कलियुग में ये भगवान कल्कि के गुरु बनेंगे।

महर्षि लोमश:

महर्षि लोमश सतयुग के व्यक्ति हैं। सतयुग में इन्‍होंने भगवान शिव से अमरता का वरदान प्राप्‍त किया। त्रेतायुग में इन्‍होंने दशरथ को उपदेश दिया।

त्रेतायुग के समय के दौरान ही काकभुशुण्डि को इन्‍होंने क्रोधित होकर श्राप दे दिया था। द्वापर युग में इन्‍होंने युधिष्ठिर सहित सभी पांडवों को इन्द्रप्रस्थ में आकर आशीर्वाद दिया।

महाभारत युद्ध के पश्चात शर शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से भी यह मिलते हैं। ये सहस्त्रों कल्पों तक जीने वाले व्यक्ति हैं। चाहे आप इसे इनका वरदान समझें या श्राप।


Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character


जाम्बवन्त:

जाम्बवन्त भी सतयुग के व्यक्ति हैं। सतयुग के समय हुए समुद्र मंथन में पूरी पृथ्वी की सात परिक्रमा इन्‍होंने कर दी थी। इसके बाद ये त्रेतायुग में श्रीराम के सहयोगी बने।

द्वापरयुग में इनका श्रीकृष्ण से युद्ध हुआ। अन्‍त में इन्‍होंने अपनी पुत्री जाम्बवन्ती का विवाह श्रीकृष्‍ण के साथ किया।

गरुड़:

गरूड़देव सतयुग के व्यक्ति हैं। ये सतयुग में भगवान विष्णु के वाहन बने थे। त्रेतायुग में श्री राम लक्ष्मण को इन्‍होंने नागपाश से मुक्त किया था। त्रेतायुग में ही काकभुशुण्डि से इनकी भेंट हुई। द्वापर में हनुमान जी से ये जा टकराये और हनुमान जी से पराजित होकर लज्जित हुए।

विभीषण:

विभीषण भी त्रेतायुग के ही व्यक्ति हैं। ये लंकेश रावण के छोटे भाई और श्रीराम के परम भक्त थे। लंका के युद्ध मे इनकी अत्‍यंत महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनके कारण ही रावण का अंत संभव हो सका।

द्वापरयुग में पांडवों में से एक सहदेव का इनसे मिलने का वर्णन आता है। जब सहदेव दिग्विजय हेतु दक्षिण दिशा में जाते हैं और  विभीषण से स्वीकृति प्राप्त करते हैं।

बाणासुर:

बाणासुर भी त्रेतायुग के व्यक्ति हैं। ये दैत्यराज बलि के सबसे बड़े पुत्र और एक महान शिवभक्त भी थे। त्रेतायुग में रावण के परम मित्रों में से एक बने।

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जब सीता माता का स्वयंवर हो रहा था तो ये भी उस स्‍वयंवर को देखने को आये थे। द्वापरयुग में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को इन्‍होंने बंदी बनाया था और इसी कारण से इनका श्रीकृष्‍ण से युद्ध भी हुआ।

और सबसे विचित्र बात तो यह है कि उस युद्ध मे भगवान शंकर भी बाणासुर की ओर से लड़े थे। इसी कारण से भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शंकर एक दूसरे के सामने थे और दोनों में घमासान युद्ध हुआ था।

महर्षि दुर्वासा:

महर्षि दुर्वासा भी सतयुग के ही व्यक्ति हैं। दुर्वासा जी महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र हैं। ये चंद्र एवं दतात्रेय के छोटे भाई भी हैं। वही दतात्रेय जी जो कि महायोगी मछंदर नाथ के गुरू थे।

अपने स्‍वभाव से बड़े भयानक क्रोधी भी हैं। सतयुग में इन्होंने देवराज इंद्र को श्राप दे दिया। त्रेतायुग में ये मर्यादा पुरूषोत्‍तम भगवान श्रीराम से मिले। द्वापर में दुर्योधन से मिलकर फिर युधिष्ठिर और अन्य पांडवों से मिले।

वासुकि:

ये सतयुग के नाग सम्राट हैं। रामायण में भी इनका वर्णन है। द्वापर में भीम को नागलोक में दर्शन दिए।

मय दानव:

मयदानव त्रेतायुग से संबंधित व्यक्ति हैं। त्रेतायुग में ये मंदोदरी के पिता, रावण के श्वसुर थे। द्वापर युग इन्‍होंने भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका और पांडवों के इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया।

Ramayana Aur Mahabharata ke Common Character


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तक्षक:

तक्षक, वासुकि के समकालीन थे। महर्षि कश्यप के 1000 पुत्रों में से एक थे ये। तक्षक, को इंद्र के परम मित्र में से एक कहा जाता है। द्वापर में खांडवप्रस्थ की आग से बच निकले। कलियुग में परीक्षित को काटा और फिर जनमेजय के सर्पयज्ञ से बचे।

रेवती:

रेवती सतयुग की कन्या हैं। इनके पिता ककुद्मी सतयुग में इन्हें लेकर योग्य वर की खोज में ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्मदेव ने कहा वापस पृथ्वी पर जाइये, इस कन्या का वर वही मिलेगा। जितने समय यहां रुके, पृथ्वी पर दो युग बीत गए। वे वापस पृथ्वी पर आए तो द्वापर आ चुका था। ब्रह्माजी की आज्ञानुसार रेवती का विवाह बलराम से किया।

नहुष:

इनका संबंध भी सतयुग से ही है। नहुष जी,  पुरूरवा के पौत्र और ययाति के पिता हैं। इंद्र के पद को प्राप्त किया पर सप्तर्षि द्वारा श्राप मिलने पर अजगर के रूप में परिणत हो गए। द्वापर युग में इन्होंने महाबलशाली भीम को जकड़ा और युधिष्ठिर द्वारा उनके प्रश्नों के सही उत्तर देने पर ही उन्हें छोड़ा।

महर्षि अगस्त्य:

महर्षि अगस्त्य सतयुग के ऋषि हैं। त्रेतायुग में श्रीराम को इन्‍होंने कई दिव्यास्त्र दिए। द्वापर युग में पितामह भीष्म से उनके अंतिम समय मे मिलने आये।

काकभुशुण्डि:

ये महान शिव और राम भक्त हैं। लोमेश ऋषि के शाप के कारण इन्‍हें कौवे का रूप मिला। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि इन्होंने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत होते हुए देखा है।

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सप्तर्षि:

सातों ब्रह्मपुत्र – अंगिरा, पुलह, पुलत्स्य, क्रतु, अत्रि, मरीचि एवं वशिष्ठ। सभी सतयुग के व्यक्ति। त्रेता में वशिष्ठ तो श्रीराम के कुलगुरु हुए। कुछ श्रीराम से वनवास के दौरान मिले।  द्वापरयुग में सातों सप्तर्षि अंत समय मे भीष्म से मिलने आये और उन्हें उपदेश दिया।

व्यास, कृप एवं अश्वत्थामा: ये तीनों अभी तक जीवित हैं और चिरंजीवी हैं।


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