क्‍या होता है जब राजा विक्रमादित्‍य का सामना होता है गोरखनाथ से? Vikramaditya and Gorakhnath baba

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क्‍या होता है जब राजा विक्रमादित्‍य का सामना होता है गोरखनाथ से? Vikramaditya and Gorakhnath baba

क्‍या होता है जब राजा विक्रमादित्‍य का सामना होता है गोरखनाथ से? Vikramaditya and Gorakhnath baba

Vikramaditya and Gorakhnath baba


कभी आपने सोचा है कि योगी भर्थरी के बड़े भाई का जब गुरू गोरखनाथ से सामना होता है तो क्‍या हुआ होगा। चलिये आज इस बारे में भी जान लिया जाये।

एक घनघोर जंगल में एक बरगद के नीचे गोरखनाथ बैठे थे। तभी भारत सम्राट नवयुवक महाराज विक्रमादित्‍य एक काले हिरन के पीछे घोड़ा दौड़ाते हुए उधर आ निकले और महाराज योगी के पीछे खड़े होकर खुद मस्‍ती की बातें सुनाने लगे।

गोरखनाथ- दुआ मांग, दुआ कर, दुआ से जमीन तक फट जाती है। आसमान तक उड़ जाता है। जिस काम को कोई नहीं कर सकता है उसको दुआ कर सकती है।

विक्रमादित्‍य— कोई दिव्य महात्‍मा दिखयी देता है।

गोरखनाथ- अगर तू इसे देख्‍ देगा तो उसके परदे में परदा ही क्‍या रह जायेगा। विचित्र पर्दा तो इसलिये बनाया गया है कि इसको कोई न देखे।

विक्रमादित्‍य— कोई तत्‍वाज्ञानी जान पड़ता है।



गोरखनाथ- सब जगत परमात्‍मा में है। परमात्‍मा मुझ में है तो महात्‍मा बड़ा हुआ न परमात्‍मा से।

विक्रमादित्‍य— अब की दफा दूरी की मसकी, जीवात्‍मा और महात्‍मा दोनों ही परमात्‍मा के भीतर रहते हैं।

गोरखनाथ- शक्ति की उपासना करने वाले रावण बन जाते हैं। और शिव की उपासना करने वाले राम बन जाते है।

विक्रमादित्‍य— इस हिसाब से मैं एक रावण हूँ क्‍योंकि राजा होता है शक्ति का उपासक।

गोरखनाथ- इस विशाल भूगोल में स्त्रियां है। उनकी इच्‍छा है कि जमीन मर जो रहे सो एक स्‍त्री बन कर।

विक्रमादित्‍य— यह बाते कुछ समझ में नहीं आ रहीं।

गोरखनाथ- इस विशाल भूगोल में सभी पागल ही पागल रहते हैं। अगर कोई होश में आने लगता है तो उसे पागल कहने लगते हैं क्योंकि वे खुद पागल है।

विक्रमादित्‍य— सभी पागल है अब की  फिर इसने धंकद भरी कि विचार करते-करते यह आदमी पागल हो गया है।

गोरखनाथ- जमीन कहती है कि मैं बड़ी और आसमान कहता है कि मैं बड़ा, औरत कहती है कि मैं बड़ी व मर्द कहता है कि मैं बड़ा। बड़ी है भूल जो कि दोनों को अहमक बनाये हुए है।


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विक्रमादित्‍य— तुमने इधर कोई काला हिरन देखा है?

गोरखनाथ- मैं यहां नहीं रहूंगा जहां सब पगल ही पागल हैं। नहीं तो औरतों के इस शहर में मेरा निवास नहीं राह सकता।

विक्रमादित्‍य— क्‍यों जी तुम कौन हो जो मेरी बात नहीं सुनते?

गोरखनाथ- आप की प्रकाशित विधान नामक नाट्य पुस्‍तक में दो भाग है। एक दुखान्‍त नाटक और दूसरा सुखान्‍त नाटक। दुखान्‍त नाटक पहले खेला गया और सुखान्‍त बाद में खेला गया। ऐसा न हो कि आप सुखन्‍त का समय भूल जाये।‍ आप में भले कोई अवगुण न हो परंतु भूल का अवगुण तो है ही।

विक्रमादित्‍य— क्‍यों जी यहां से कोई गांव नजदीक है?

गोरखनाथ- यह धरती का देश बहुत बड़ा है। यह विशाल धरती का देश पानी के देश के बीचोबीच सो रहा है और पानी का देश आग के देश में हिलोर मार रहा है।

विक्रमादित्‍य— मैं तुमसे आगरे की बात पूछता हूँ आगरे की बात और मुझे तुम खबर देते हो दिल्‍ली की।

इतने में गोरखनाथ जी का वह काला हिरन वही आ पहुँचा जिसके पीछे परेशान हो रहे थे विक्रमादित्‍य। महाराज ने एक तीर चला दिया और हिरन मर कर वहीं योगी गोरखनाथ जी की गोदी में गिर पड़ा। हिरन को मरा हुआ देख गोरख ने महाराजा से कहा

गोरखनाथ- तुम हौन हो?


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विक्रमादित्‍य— भारत के उदय अस्‍त का मैं राजा हूँ।

गोरखनाथ- भारत का उदय जब होगा तब होगा परंतु तुम्‍हारा अस्‍त तो आज हो जायेगा।

विक्रमादित्‍य— क्‍यों?

गोरखनाथ- इस निरपराध और पालतू हिरन को क्‍यों मारा?

विक्रमादित्‍य— मैं राजा हूँ जिसको चाहूँ मार सकता हूँ।

गोरखनाथ- मैं नहीं मानता हूँ कि तुम राजा हो। तुम शूर नहीं क्रूर हो।

विक्रमादित्‍य— तुम्‍हारे न मानने से क्‍या होता है?

गोरखनाथ- हमारे न मानने से तुम राजा रह सकते हो?

विक्रमादित्‍य— अच्‍छा

गोरखनाथ- और नहीं तो

विक्रमादित्‍य— तुम क्‍या करोगे मेरा?

गोरखनाथ- जो तुमने हिरन का किया।

विक्रमादित्‍य— तुम्‍हारे पास कोई हथियार तो है ही नहीं मुझे मारोगे कैसे?

गोरखनाथ- हथियार से हिजड़े मारा करते हैं। हमारी दुआ ही हमारी तलवार है। दुआ से जमीन तक फट जाती है। तुम तो चीज ही क्‍या हो।

विक्रमादित्‍य— क्‍या मैंने कोई अपराध किया है?

गोरखनाथ- बड़़ा भारी


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विक्रमादित्‍य— क्‍या?

गोरखनाथ- मार वही सकता है जिसके पास जीवित करने की शक्ति हो।

विक्रमादित्‍य— मर कर कोई जीवित नहीं होता है। यह प्रकृति के नियमों के विरूद्ध है।

गोरखनाथ- प्रकृति के नियमों को क्‍या तुम जानोगे। प्रकृति का नाम ही सुना है या उसे देखा भी है? विष खाने से आदमी मी जाता है परंतु शंकर जी विष खाकर अमर हो गये।

विक्रमादित्‍य— मुझे फुरसत नहीं, हिरन को लेकर लाजधानी लौटना है।

गोरखनाथ- हिरन को लेकर? हिरन को छोड़कर ही राजधानी तो मैं जानू। बिना इसे जीवित किये बिना तुम नहीं जा सकते। राजधानी में नही जाओगे तो कुर्बानी में जरूर जाओगे। अब या तो इसे जीवित करो या फिर मरने को तैयार हो जाओ।

विक्रमादित्‍य— तुम कौन हो?

गोरखनाथ- जनता को बनाने और बिगाड़ने का कार्य राजा करते हैं। हम योगी तो राजाओं को बनाने और बिगाड़ने का खेल खेलते हैं।

विक्रमादित्‍य— क्‍या तुम इस हिरन को जीवित कर सकते हो?

गोरखनाथ- यदि जीवित कर दें तो?



विक्रमादित्‍य— तो भारत का सम्राट तुम्‍हारा गुलाम जो जावेगा।

गोरखनाथ- कंचन, कामिनी और कीर्ति की आपातकालीन त्रिमूर्ति राजपाट को छोड़कर नम्रता, ब्रह्मचर्य और त्‍याग की आपात भयावनी त्रिमूर्ति भक्तिमार्ग में आ जाओगे।

विक्रमादित्‍य— जरूर आ जाऊँगा।

अमर विद्या और प्राणकला के आचार्य गोरखनाथ ने उसी समय मरे हुए हिरन को जीवन दे दिया।

गोरखनाथ- राजा विक्रमादित्‍य अब बताओ राजा बड़ा या योगी?

विक्रमादित्‍य— राजा केवल मार सकता है परंतु योगी मारने और जिवाने दोनों का काम करता है। अब आप मुझे अपना शिष्‍य बना लें।

गोरखनाथ- नहीं राजा अभी तुम्‍हें देश-विदेशकी देखभाल करनी है। परोपकार कर अपना जीवन उच्‍च बनाओ। ऐसे कार्य करो कि तुम्‍हारा नाम अमर हो जाये। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्‍हारे साथ है।


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