भगवान शिव को क्यों करना पड़ा श्रीदामा का वध? | Why Lord Shiva killed Shreedhama?

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भगवान शिव को क्यों करना पड़ा श्रीदामा का वध? | Why Lord Shiva killed Shreedhama?

भगवान शिव को क्यों करना पड़ा श्रीदामा का वध? | Why Lord Shiva killed Shreedhama?

Why Lord Shiva killed Shreedhama


दोस्‍तों जब कभी भी हमारे समक्ष मित्रता की बात आती है तो हमें हमेशा पौराणिक काल के श्रीकृष्‍ण और सुदामा की याद तो आ ही जाती है। लोग सोचते हैं कि कृष्‍ण कैसे दयालु और समानता में विश्‍वास रखने वाले थे जो गरीब सुदामा से मिलने महल के बाहर नंगे पांव चले आये थे।

इसके बाद कैसे उन्‍होंने सुदामा की दरिद्रता दूर की थी। इस कथा से तो हम और आप भली-भांति परिचित हैं। पर हम बात कर रहे हैं श्रीदामा की सुदामा की नहीं।

परंतु क्‍या आप यह जानते हैं कि कैसे श्रीदामा के अपने पापों के कारण भगवान शिव को उसका वध करना पड़ा था? तो दोस्‍तों आज के इस ब्‍लॉग पोस्‍ट में हम आपको बतायेंगे कि आखिर क्‍या थे वे कारण जिनके फलस्‍वरूप श्रीदामा का वध भगवान शिव को करना पड़ा था। आपको बता दें कि सुदामा और श्रीदामा दोनों ही अलग-अलग व्‍यक्ति हैं।  

दोस्‍तों स्‍कंद पुराण के अनुसार गोलोक में श्रीदामा और विराजा नामक एक कन्‍या रहा करती थी। विराजा, श्रीकृष्‍ण से प्रेम करती थी। वहीं दूसरी ओर श्रीदामा जो गौलोक में रहते थे, वे भी विराजा से प्रेम करने लगे। एक दिन की बात है, विराजा, भगवान श्रीकृष्‍ण पर मोहित होकर उनके पास चली गयी।


उसी समय राधा भी वहां आ गयीं और विराजा को वहां देखकर राधा जी क्रोधित हो गयीं। और क्रोध में आकर उन्‍होंने विराजा को श्राप दे दिया कि तुम पृथ्‍वी लोक पर पहुँच जाओगी। इधर जब श्रीदामा को यह पता चला तो उन्होंने राधा जी को श्राप दे दिया।

इसके बाद राधा जी ने भी श्रीदामा जी को श्राप दे दिया कि तुम राक्षस योनि में जन्‍म लोगे। उसके बाद सब अपने अपने निवास को लौट गये।

कुछ समय बाद जब श्रापों के फलित होने का समय आया तो सुदामा ने दानवराज दम्‍भ के घर पर पुत्र के रूप में जन्‍म लिया। इनका नाम शंखचूर्ण रखा गया वहीं विराजा ने धर्मध्‍वज के घर तुलसी के रूप में जन्‍मीं।

जब शंखचूर्ण बड़ा हुआ तो वह एक मुनि से आज्ञा लेकर पुष्‍कर में जाकर ब्रह्मा जी को प्रसन्‍न करने के लिये तपस्‍या करने लगा। फिर कुछ वर्ष पश्‍चात ब्रह्मा जी उसकी तपस्‍या देखकर प्रसन्‍न हुए और उसको दर्शन दिये।

तब ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण से वर मांगने को कहा। तब शंखचूर्ण ने ब्रह्मा जी का बड़ी ही नम्रता से अभिवादन किया और बोला कि हे भगवान! मुझे आप ऐसा वरदान दे दें कि मैं देवताओं के लिये अमर हो जाऊँ। तब ब्रह्मा जी ने कहा तथास्‍तु! ऐसा ही होगा।


और इसके बाद प्रसन्‍न होकर ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को एक दिव्‍य श्रीकृष्‍ण कवच प्रदान किया जो कि सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला था। इसके बाद ब्रह्मा जी ने शंखचूर्ण को आज्ञा दी कि अब तुम बद्री वन को जाओ।

वहां पर तुलसी सकाम भाव से तपस्‍या कर रही है और वहां जाकर तुम उससे विवाह कर लेना। इतना कहकर ब्रह्मा जी अंतर्ध्‍यान हो गये।
इसके पश्‍चात शंखचूर्ण ने उस दिव्य कवच को पहन लिया और तत्‍काल ही बद्रिकाश्रम को चल दिया।

कुछ समय पश्‍चात शंखचूर्ण उसी स्‍थान पर जा पहुँचा जहां धर्मध्‍वज की पुत्री तुलसी गहन तप कर रही थी। सुंदरी तुलसी का रूप अत्‍यंत कामनीय और मनोहर था।

उस सती का रूप देखकर शंखचूर्ण उसके समीप ही ठहर गया और मधुर वाणी में उससे बोला कि हे सुंदरी तुम कौन हो? तुम किसकी पुत्री हो? और तुम यहां वन में चुपचाप बैठकर क्‍या कर रही हो? यह सारा रहस्‍य जरा मुझे समझाओ तो।

शंखचूर्ण के ये मधुर वचन सुनकर तुलसी ने कहा कि मैं धर्मध्वज की तपस्विनी कन्‍या हूँ और यहां वन में गहन तप कर रही हूँ। आप कौन हैं? आप सुखपूर्वक यहां से चले जाईये क्‍योंकि नारी जाति तो ब्रह्मा जी तक को मोह में डाल लेती है। Why Lord Shiva killed Shreedhama


यह सुन कर शंखचूर्ण बोला कि हे सुंदरी क्‍या तुम मुझे नहीं जानती हो? क्‍या कभी भी तुमने मेरा नाम नहीं सुना है? अरे देवताओं में भगदड़ मचाने वाला शंखचूर्ण मैं ही हूँ। पूर्व काल में मैं श्री हरि का पार्षद था और मेरा नाम श्रीदामा था।

इस समय तो मैं राधाजी के श्राप के कारण दानव शंखचूर्ण के रूप में जनमा हूँ। ये सभी बातें मुझे ज्ञात हैं क्‍योंकि श्रीकृष्‍ण की कृपा से मुझे अपने पूर्व जन्‍म का स्‍मरण बना हुआ है। परमपिता ब्रह्मा जी की आज्ञा के फलस्‍वरूप ही मैं यहां पर तुमसे विवाह करने के लिये आया हूँ।

जब दानवराज ने तुलसी से ऐसे प्रेमपूर्वक वचन बोले तो वह बेहद प्रसन्‍न हुईं और बोलीं कि हे भद्र पुरुष आज तो आपने मुझे अपने सात्विक वचनों से पराजित कर दिया है। फिर तुलसी अपना ज्ञान शंखचूर्ण के सामने प्रस्‍तुत करने लगीं।

और तभी वहां पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और शंखचूर्ण से बोले कि तुम यहां तुलसी के साथ व्‍यर्थ ही वाद-वि‍वाद कर रहे हो। तुम गंधर्व विवाह की रस्‍मों द्वारा तुलसी से विवाह करो और रत्‍ना नारी को अपना बना लो।


चूँकि तुम दोनों ही निपुण हो तो ऐसी दशा में निपुण का निपुण के साथ समागम निपुण ही होगा।

तब ब्रह्मा जी ने तुलसी जी से कहा कि हे सती साध्‍वी तुम इसकी परीक्षा क्‍यों ले रही हो? यह तो देवताओं और असुरों का मान मर्दन करने वाला है। सुंदरी तुम तो इसके साथ अनेकों काल तक राज करोगी।

इतना ही नहीं, जब इसके शरीर का अंत हो जायेगा तो यह पुन: गौलोक में श्रीकृष्‍ण को ही प्राप्‍त हो जायेगा। और इसकी मृत्‍यु हो जाने के पश्‍चात तुम भी बैकुण्‍ठ में चतुर्भुज भगवान को ही प्राप्‍त हो जाओगी। इतना कहकर ब्रह्मा जी अपने धाम को चले गये।

फिर इसके बाद शंखचूर्ण ने गंधर्व विवाह द्वारा तुलसी का पाणिग्रहण किया। तत्‍पश्‍चात तुलसी के साथ विवाह करके वह अपने पिता के स्‍थान को चला गया और मनोरम भाव में उस रमणी के साथ विहार करने लगा।

इसके कुछ समय बाद असुरों के गुरू शुक्राचार्य की अनुमति से शंखचूर्ण को असुरों का राजा घोषित कर दिया गया। इसके तुरंत बाद ही शंखचूर्ण ने देवताओं पर आक्रमण शुरू कर दिया। ब्रह्मा जी से मिले वरदान के कारण कोई भी देवता उसके समक्ष टिक नहीं सका और रणभूमि से भागने को मजबूर होना पड़ा। Why Lord Shiva killed Shreedhama


इसके बाद देवी भद्रकाली रणभूमि में शंखचूर्ण से लड़ने के लिये पधारीं और बहुत लंबे समय तक दोनों के बीच युद्ध हुआ। तभी एक आकाशवाणी हुई कि हे देवी तुम शंखचूर्ण को पराजित नहीं कर सकती हो क्‍योंकि यह अजेय है।

जब तक इसके शरीर पर यह कवच है और इसकी पत्‍नी तुलसी का सतीत्‍व बना हुआ है तब तक इसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।

यह सब सुनकर देवी भद्रकाली भगवान शिवजी के पास पहुँची और उन्हें आकाशवाणी की सभी बातें बताईं। तब भगवान शिव जी, श्रीविष्‍णु जी के पास पहुँचे और उन्‍हें शंखचूर्ण के वध के लिये प्रेरित किया।

तब शिवजी की बातें सुनकर विष्‍णुजी शंखचूर्ण के पास जा पहुँचे परंतु इस बार वे एक ब्राह्मण के वेश में थे। तब वे बोले कि हे दानवराज! इस समय मैं आपके पास एक याचक के रुप में आया हूँ और आप मुझे भिक्षा देने की कृपा करें। यह सुनकर शंखचूर्ण बोला कि हे ब्राह्मण! आपको क्‍या चाहिये?


तब ब्राह्मण रूपी विष्‍णु जी बोले कि पहले आप को मुझे यह वचन देना होगा कि जो कुछ भी मैं आपसे मांगूगा वह आप मुझे दे देंगे। यह सुन कर शंखचूर्ण ने उस विप्र का यह वचन स्‍वीकार कर लिया।

तब उस विप्र रूप में भगवान विष्‍णु जी ने कहा कि मैं तुम्‍हारा कवच चाहता हूँ। यह सुनकर शंखचूर्ण ने वह कवच जो उसे प्राणों के समान प्रिय था, उस विप्र को बिना हिचके दे दिया।

इस प्रकार श्रीहरि ने उस कवच को शंखचूर्ण से ले लिया और इस कवच को पहन कर वे शंखचूर्ण का रूप धारण कर देवी तुलसी के पास जा पहुँचे। वहां पहुँच कर वे देवी तुलसी के साथ बातें करने लगे और कुछ समय के बाद उनके साथ रमण किया।

किंतु कुछ समय पश्‍चात रमण करने पर देवी तुलसी के मन में संदेह होने पर वह शंखचूर्ण रूपी विष्‍णु जी से पूछने लगी कि तुम कौन हो? दुष्‍ट! मुझे शीघ्र बतला कि माया द्वारा मेरा उपभोग करने वाला तू कौन है? तूने मेरा सतित्‍व नष्‍ट किया है अत: मैं तुझे अभी श्राप देती हूँ।


ऐसा सुनकर विष्‍णु जी अपने असली स्‍वरूप में आ गये। उनको देखकर तुलसी जी उन्हें पहचान गयीं। परंतु उनका सतित्‍व नष्‍ट हो जाने के कारण वह कुपित होकर विष्‍णु जी से कहने लगीं कि तुम्‍हारा मन पत्‍थर के सदृश कठोर है।

तुममें लेश मात्र भी दया नहीं। मेरे पति धर्म के भंग हो जाने से निश्‍चय ही मेरे स्‍वामी मारे गये। चूँकि तुम पाषाण सदृश, कठोर और दयारहित हो इसलिये अब तुम मेरे श्राप से पाषाण स्‍वरूप ही हो जाओ।

इतना कहकर शंखचूर्ण की सती साध्‍वी वह पत्‍नी तुलसी फूट-फूटकर रोने लगी। वह शोकाकुल होकर विलाप करने लगी। इतने में वहां भक्‍तवत्‍सल भगवान शंकर प्रकट हो गये।

उन्‍होंने तुलसी को समझाते हुए कहा कि देवी अब तुम द:ख को दूर करने वाली मेरी बातों को सुनो। और श्रीहरि भी स्‍वस्‍थ मन से इसका श्रवण करें। अब तुम दोनों के लिये जो भी सुखकारक होगा वही मैं तुमसे कहूँगा।

देवी तुलसी आपने जिस मनोरथ से तपस्‍या की थी यह उसी तपस्‍या का फल है। तुम्‍हें उसी के अनुरूप ही यह फल प्राप्‍त हुआ है। अब तुम इस शरीर को त्‍याग कर दिव्य देह धारण कर लो। और लक्ष्‍मी के समान श्रीहरि के साथ बैकुण्‍ठ में विहार करती रहो। Why Lord Shiva killed Shreedhama


तुम्‍हारा यह शरीर जिसे तुम छोड़ दोगी वह नदी के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। वह नदी भारतवर्ष में पुण्‍यरूपा गण्‍डकी के नाम से प्रसिद्ध होगी। महादेवी, कुछ समय पश्‍चात मेरे कार्य के प्रभाव से देवपूजा में तुलसी का प्रधान स्‍थान हो जायेगा।

सुंदरी! तुम स्‍वर्गलोक में, मृत्‍युलोक में, तथा पाताल लोक में सदा श्रीहरि के निकट ही निवास करोगी। तुम सभी पुष्‍पों में श्रेष्‍ठ तुलसी का वृक्ष हो जाओगी। भारतवर्ष में श्रीहरि शालिक्राम शिला के रूप में गण्‍डकी नदी के निकट मौजूद रहेंगे।

इस पर चक्र की आकृति होगी और इसका अन्य नाम चक्रनारायण होगा। तुलसी और शालिक्राम का समागम सदैव ही पुण्‍यकारी होगा। जो भी शालिक्राम के ऊपर से तुलसी को हटायेगा तो उसे जन्‍मांतर में स्‍त्री वियोग की प्राप्ति होगी।

जो भी शंख से तुलसी पत्र को हटायेगा वह भी भार्याहीन होगा व सात जन्‍मों तक रोगी बना रहेगा। जो कोई भी व्‍यक्ति शालिग्राम, तुलसी और शंख को एकत्रित करता है वह श्रीहरि को प्‍यारा होता है।

इसके पश्‍चात शंकर जी तुलसी व श्रीहरि विष्‍णु को आनंदित करके अंतर्ध्‍यान हो गये। इधर शंकर जी के जाने के बाद तुलसी ने अपने शरीर का त्‍याग करके दिव्य रूप धारण कर लिया। इसके बाद विष्‍णु जी तुलसी को अपने साथ लेकर बैकुण्‍ठ को चले गये।

तुलसी के छोड़े हुए शरीर से गण्‍डकी नदी प्रकट हुई। और इधन भगवान विष्‍णु भी शिला के रूप में परिणत हो गये।


तो उम्‍मीद करते हैं कि दोस्‍तों आपको यह कहानी और जानकारी अवश्‍य पसंद आयी होगी। अगर आपके मन में इस कहानी को लेकर या कोई अन्‍य विचार आता है तो नीचे कॉमेण्‍ट सेक्‍शन में अवश्‍य बतायें। व इस लेख को अपने सभी मित्रों के साथ शेयर अवश्‍य करें। धन्‍यवाद!

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